“यह मुआवज़ा किसी को ना मिले”
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राष्ट्रीय परिदृश्य

“यह मुआवज़ा किसी को ना मिले”

अगर किसी की आँखे कमज़ोर हो तो चश्मा लगा कर दुनिया को वह साफ़ साफ़ देख सकता है। लेकिन किसी चश्मे में इतनी ताक़त भी हो सकती है क्या जो एक बाप को उसके दो जवान बेटे मो . आमिर और मो. हाशिम की मय्यत तक ले जाये ?

यह चश्मा मुस्तफाबाद दिल्ली में रहने वाले 60 वर्षीय बाबू खान का है, बाबू खान अपने बेटों की हत्या पर लिखी FIR की कॉपी निकाल रहे हैं। लगातार खांसी के शिकार बाबू खान की ज़िंदगी ठीक 6 साल पहले 26 फरवरी 2020 को पूरी तरह से बदल गयी।

यह मौतें न सिर्फ उत्तर पूर्वी दिल्ली और देश में ही नहीं बल्कि दुनिया भर में चर्चा में आयी थी, जिसके ज़ख्म आज तक हरे हैं, कम से कम उनके परिवार वालों के लिए तो बिलकुल हैं।

उनके पास 26 फरवरी को दंगा शांत हो जाने के बाद गरिमा गार्डन से अपनी बाइक पर निकले बेटे के आये फ़ोन से ज़िंदगी बदल गयी। जिसमे उसने कहा था "हम बस 5 मिनट में आ रहे हैं" वो उनका आखिरी फोन था, अब 6 साल बाद भी वो पांच मिनट पूरे नहीं हो सके हैं।

तब से अब तक सब कुछ बदल गया है

पिछले एक साल से बीमार और तंगहाली का शिकार बाबू खान अपने बुढ़ापे की तरफ हैं, लेकिन उनके इन कमज़ोर कंधों पर अपने मृत बेटे आमिर की तीन बेटियों की ज़िम्मेदारी है, जिनकी उम्र 9 साल, 7 साल और साढ़े 4 साल है। तीसरी बेटी अपने बाप के इस दुनिया से जाने के 5 महीने बाद, सिर पर बिना बाप का साया लिए पैदा हुई।

बाबू खान बताते हैं कि "आमिर की तीनों बेटियां स्कूल में पढ़ रही हैं, एक प्राइवेट में पढ़ रही है, क्यूंकि यहाँ के सरकारी स्कूल के हालात अच्छे नहीं है। लेकिन पेट भर रोटी खाने के लिए भी मिलना बड़ी बात है, इसलिए सिर्फ एक को प्राइवेट स्कूल में पढ़ा पा रहा हूँ।

मेरा बेटा अगर होता तो तीनों को प्राइवेट में पढ़ाता" यह कह कर उनकी आँखें नम हो गयी। लेकिन क्या उनके रो देने को उनका परिवार सहन कर सकता था? इसलिए उन्होंने खुद को दिलासा दिया और चुप हो गए।

मो. आमिर (28 वर्ष) की पत्नी घर ही में कढ़ाई और तुरपाई का छोटा मोटा काम करती है, ताकि अपनी बेटियों के लिए थोड़ा बहुत कुछ कर सकें। लेकिन 150 या 200 रूपये कमाकर वो कितना और क्या कर पाती होंगीं यह सोचना और जानना सभी के लिए बहुत ज़्यादा ज़रूरी है।

समय ने आगे बढ़ा दिया है, लेकिन रुका है सब कुछ

अपने जवान बेटों का दुःख दिल में लिए यह पिता उस दिन को याद करते हैं और कहते हैं कि "जिन लोगों ने मेरे दो बच्चों को मारा मुझे उनका नाम नहीं पता, लेकिन उनके दिलों में कितना ज़हर होगा यह मुझे अपने बेटों की लाश देख कर ज़रूर पता चल गया था" मो. आमिर और मो हाशिम दोनों ही की हत्या की FIR में अज्ञात का ज़िक्र है।


अपने 25 ग़ज़ के जर्जर मकान में बैठे बाबू खान कहते हैं कि वो आगे बढ़ गए हैं, उम्र भी बढ़ गयी है, ज़िम्मेदारी भी कैसे न कैसे पूरी हो जाएगी लेकिन हर दिन और रात एक बार ज़रूर मुझे वो वक़्त याद आ जाता है।

यह बात करते हुए मो. आमिर की मंझली बेटी नन्हे क़दमों से अपने दादा के पास आ जाती है, उसके दादा मेरी तरफ देख कर कहते हैं कि इन फूल जैसी बच्चियों के चेहरे देख कर मुझे अपना बच्चा याद आ जाता है।

मुआवज़ा या ज़ख्म पर मरहम

मुआवज़े में मिली रकम पर बाबू खान बोलते है कि "हां हमें दोनों बेटों की मौत का मुआवज़ा मिला, और भी संस्थाओं ने मदद की हमारी, लेकिन मैं दुआ करता हूँ जी यह मुआवज़ा दुनिया में किसी भी बाप को नहीं मिले, मेरा अगर कोई दुश्मन भी हो तो उसे भी नहीं मिले।"

यह दावा बिलकुल सही भी है कि आखिर किसी के घर में हुई मौत पर कितनी रकम दे कर मरहम रखा जा सकता है? क्या इस पर दुनिया की किसी अदालत या संसद में कोई चर्चा अभी तक हुई है? लेकिन सवाल यह है कि किसी गरीब की मौत पर चर्चा और विमर्श आखिर होगा ही क्यों?

और आखिर में........

अभी तक कच्ची बनी सड़क वाली गली में मुस्तफाबाद में एक छोटे से तीन मंज़िल के घर में अपनी दो बेटियों की शादी कर चुके बाबू खान, अपने परिवार के साथ रहते हैं। उनके 5 बेटे थे, जिनमे से दो दंगों में मारे गए।

अपने बड़े भाई जिनकी मृत्यु हो गयी उनकी 3 बेटी, अपने बेटे की 3 बेटी और अभी शादी के लायक एक और बेटी के ज़िम्मेदार हैं। यह इत्तेफ़ाक़ कहें की उन पर तीन गुना ज़िम्मेदारी है, जिसे वो छुपाते नहीं है बस सब्र के साथ निभा रहे हैं।

पिछले 1 साल से बंद पड़ी अपनी सिलाई मशीन को दिखाते हुए यह पिता, अपनी बीमारी, परेशानी, बेरोज़गारी और दुःख को साझा कर रहे हैं। उनका काम पिछले एक साल से बंद है, जिससे वो ज़्यादा परेशान है।

इनके दुःख को कोई नहीं समझ सकता है , क्यूंकि यह किसी पर बीता नहीं है, दो जवान बेटे खो देने वाला बूढ़े बाप, बाबू खान की किसी से कोई शिकायत नहीं है। वो बस सब्र करते हैं और अपने खुदा को याद करते हैं।

असद शेख


असद शेख

स्वतंत्र पत्रकार, नई दिल्ली

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