"लिव इन रिलेशनशिप"
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इस्लाम दर्शन

"लिव इन रिलेशनशिप"

महिला का पूर्णरुप से नुकसान

बच्चे के जन्म और पालन पोषण पर आधारित महिला का व्यक्तित्व पुरुष से कई गुना अधिक बढ़कर होता है। पुरुष का काम केवल यौन संबध तक सीमित होता है। इस संबध को स्थापित कर वह अलग हो जाता है, आगे के तमाम स्तर महिला को अकेले अंजाम देने पड़ते हैं। वह नौ महीने बच्चे को अपने पेट में रखती है और अपने रक्त से उसका पोषण करती है। जन्म के बाद दो साल तक निरंतर उसे अपना दूध पिलाती है। बच्चा कमज़ोर और असहाय पैदा होता है और भरपूर सेवा का मोहताज होता है, वह अपना आराम एवं शांति त्याग कर जी जान से उसकी परवरिश में लगी रहती है। उसे यह सेवा लंबे समय तक देनी पड़ती है। विवाह के अनुबंध के परिणामस्वरुप पुरुष एवं महिला का बच्चे से संबध स्थापित रहता है। वह महिला को हर संभव सहायता एवं सहयोग उपलब्ध कराता है, उसका संरक्षण करता है, उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, उसके संरक्षण में महिला शांति एवं सुखमय वातावरण और सहानुभूति एवं प्रेम के वातावरण में अपने कर्तव्यों को पूरा करती है। दोनों मिलकर बच्चे की शारीरिक, मानसिक एवं व्यवहारिक तरबियत करते हैं। यदि विवाह की मज़बूत डोर ना हो तो पुरुष इस ज़िम्मेदारी को कभी स्वीकार नहीं कर सकता और यदि वह इससे मना कर दे तो किसी भी प्रकार से उसे बाध्य नहीं किया जा सकता। इस स्थिति में महिला का पूर्णरुप से नुकसान है। पुरुष तो चंद घड़ियां उसके साथ गुज़ारने के बाद अलग हो जाएगा और महिला सारी समस्याएं और परेशानियां अकेले झेलने के लिए मजबूर हो जाएगी। सामाजिक वैज्ञानिकों ने इस अन्याय और शोषण को महसूस किया है और इस पर अपनी अंसतुष्टि का इज़हार किया है। डॉक्टर पारुल शर्मा ने Live in Relationship के संबध में राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय परिस्थिति का निरीक्षण करने के बाद अंत में अपना मत इन शब्दों में साझा किया हैः

यह एक चिंताजनक स्थिति है। लोग अब बड़ी संख्या में Live in Relationship की ओर आकर्षित हो रहे हैं और विभिन्न कारणों से इसको सामाजिक स्वीकारता मिल रही है लेकिन युवा पीढ़ी, विशेष रुप से पुरुष इस रिश्ते को गंभीरता से नहीं लेते और जीवन के सुखमय पलों के आने से पूर्व ही अपनी सहयोगी से बेवफाई कर बैठते हैं और उससे अलग हो जाते हैं। इसका परिणाम मायूसी, गुस्सा और मानसिक दबाव के रुप में ज़ाहिर होता है और स्थिति कभी कभी आत्महत्या तक पहुंच जाती है।

बंधन मुक्त समाज के गंभीर परिणाम

विवाह एक मज़बूत बंधन है, जो पुरुष, महिला, बच्चों और परिवार के दूसरे सदस्यों को एक दूसरे से जोड़े रखता है। उनके बीच प्रेम, सहानुभूति, दया, समर्पण, सहयोग एवं सहायता की भावना को परवान चढ़ाता है। उन्हें एक दूसरे की सहायता करने, उनकी आवश्यकताओं को पूरा करने और एक दूसरे के काम आने के लिए उभारता है। यह बंधन ना हो तो सदस्य स्वार्थी, निजी लाभ और मतलब के लिए एक दूसरे के निकट आते हैं और अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति होते ही एक दूसरे से अलग हो जाते हैं। हर एक को केवल अपना स्वार्थ अधिक प्रिय होता है और दूसरे का प्रयोग करते हुए उन्हें ज़रा सी भी शर्म नहीं आती। 

इस परिस्थिति से सबसे अधिक प्रभावित बच्चे होते हैं जो बंधन मुक्त यौन संबध के परिणामस्वरुप जन्म लेते हैं। उनकी सही रुप से परवरिश नहीं होती है, अच्छे संस्कार, उच्च व्यवहार और सही रुप से व्यक्तित्व के विकास से वंचित रह जाते हैं, घर की शांति और परिवार का शांतिपूर्ण वातावरण उन्हें नहीं मिल पाता, इस आधार पर समाज में बिगाड़, अश्लीलता फैलाने का कारण बनते हैं। अतः बंधन मुक्त समाज के परिणामस्वरुप सभ्यता बिखरने लगती है, लोगों के जीवन में कठिनाईयां उत्पन्न होने लगती हैं और पूरा समाज टूट फूट का शिकार हो जाता है। आज पूरे विश्व में और विशेषरुप से पाश्चात्य समाज में हम इसका प्रतिरुप अपनी आंखों से देख रहे हैं।

गैर तार्किक लाभ

पारिवारिक व्यवस्था का विरोध करने वाले और बिना विवाह के यौन संबध स्थापित करने का समर्थन करने वाले इसके जो लाभ गिनाते हैं वह गैर तार्किक और काल्पनिक हैं, उनका वास्तविकता एवं तर्क से दूर दूर तक कोई संबध नहीं है। लेकिन यदि उन्हें स्वीकार भी कर लिया जाए तो सभ्यता पर उसके जो दूर अंदेशी एवं भयानक प्रभाव पड़ते हैं वह बड़े चिंताजनक एवं मंथन योग्य हैं। इसलिए समझदारी की मांग है कि इसका विरोध किया जाए और इस चलन को समाप्त करने की राह निकाली जाए।

इसका सबसे बड़ा लाभ यह गिनाया जाता है कि विवाह से पूर्व एक साथ रहने से एक दूसरे को समझने में सहायता होती है। इसलिए यदि कुछ समय एक साथ व्यतीत कर विवाह किया जाएगा तो उस रिश्ते में समझदारी रहेगी, लेकिन यह बात वास्तविकता से कोसों दूर है। National Centre for Health Statistics ने बारह हज़ार पांच सौ इकहत्तर (12,571) व्यक्तियों पर अध्ययन किया, इसका परिणाम यह निकला कि जो पुरुष एवं महिला इस आशा से एक साथ रहे कि भविष्य में विवाह कर लेंगे, या रिश्ता पक्का हो जाने के बाद विवाह से पूर्व उन्होंने कुछ समय एक साथ व्यतीत किया, उनमें अलगाव की संभावना उतनी ही पायी गई जितनी विवाह पश्चात साथ जीवन यापन करने वाले दंपत्तियों की थी।

इस्लाम का दृष्टिकोण

इस्लाम पारिवारिक व्यवस्था का समर्थन करता है, इसलिए वह उसे स्थापित करने की विभिन्न प्रक्रिया धारण करता है और उसे कमज़ोर करने वाली सभी संभावनाओं को समाप्त करने का भरपूर प्रयास करता है। नीचे इस्लाम के इसी दृष्टिकोण का वर्णन किया जा रहा हैः-

परिवार ईश्वर की कृपा है

इस्लाम परिवार को एक सामाजिक आवश्यकता ही नहीं करार देता, बल्कि उसका एक दीनी तकाज़े से उल्लेख करता है। कुरआन में कहा गया है कि ईश्वर ने अपने ईशदूत भेजे हैं उन्होंने पारिवारिक जीवन यापन किया है और उसके तकाज़े पूरे किए हैं। अल्लाह तआला का इरशाद हैः

तुम से पहले भी हम बहुत से रसूल भेज चुके हैं और उनको हम ने बीवी बच्चों वाला ही बनाया था। -(अल रअदः38)

वह पत्नी और संतानों को व्यक्ति के लिए आंखों की ठंडक करार देता है। इसीलिए अल्लाह के नेक बंदों के द्वारा ये दुआ करने की तलकीन की गई हैः

ऐ हमारे रब! हमें अपनी पत्नियों एवं अपनी संतानों से आंखों की ठंडक दे और हमको परहेज़गारों का इमाम बना। - (अल फुरकानः 74)

संपन्न परिवार, जिसमें पत्नी, लड़के लड़कियां, पोते पोतियां, नवासे नवासियां एवं दूसरे रिश्तेदार हों और व्यक्ति उनके बीच रहकर प्रसन्नता एवं प्रेम, शांति एवं सुकून और इत्मीनान व खुशी महसूस करे, ईश्वर की बड़ी कृपा है जिस पर उसका जितना शुक्र अदा किया जाए कम है। कुरआन कहता हैः

और वह ईश्वर ही है जिस ने तुम्हारे लिए तुम्हारी हम जिन्स बीवियां बनाईं और उसी ने उन बीवियों से तुम्हें बेटे पोते प्रदान किए और अच्छी अच्छी चीज़ें तुम्हें खाने को दीं। फिर क्या यह लोग (यह सबकुछ देखते और जानते हुए भी) बातिल को मानते हैं और ईश्वर की नेमतों की नाशुक्री करते हैं। - (अल नहलः 72)

विवाह यौन संबधों का एकमात्र वैध तरीका

इस्लाम ने पुरुष एवं महिला के वैध और सुरक्षित संबध के लिए विवाह को आवश्यक करार दिया है। वह ना तो रहबानियत का समर्थन करता है और ना यौन तृप्ति की खुली छूट देता है। उसके निकट विवाह के द्वारा एक ठोस परिवार अस्तित्व में आता है, जिसके तमाम सदस्यों में कर्तव्य बोध पाया जाता है और वह अपने कर्तव्य एवं दूसरों के अधिकारों से गफलत नहीं बरतते। इसलिए वह विवाह का सुझाव देता है और सदस्य, परिवार एवं समाज को साफतौर पर इसे अपनाने का आदेश देता हैः

तुम में से जो लोग बिना विवाह के हों उनके निकाह कर दो.. - (अल नूरः32)

एक बार रसूल सल्ल ने कड़े शब्दों में कहाः

जो व्यक्ति निकाह करने योग्य हो, फिर भी निकाह ना करे, वह हम में से नहीं।

इस्लाम यौन संबध की पूर्ति के लिए विवाह के बंधन में बांधता है और विवाह से हटकर किसी भी प्रकार का संबध रखने से कड़ाई से मना करता है। वह पुरुष एवं महिलाओं पर कड़ी पाबंदी लागू करता है ताकि विवाह के अलावा वह आपस में किसी भी प्रकार का यौन संबध ना रखें। कुरआन में हैः

इस प्रकार तुम (पुरुष) उन (महिलाओं) से बाकायदा निकाह करो। यह नहीं कि ऐलानिया ज़िना करो, या पोशीदा बदकारी करो।- (अल मायदाः 05)

वह महिलाएं पाक दामन हों, ना कि ऐलानिया बदकारी करने वालियां, ना खुफिया आशनाई करने वालियां। -  (अल निसाः 25)

इन आयात में उल्लेखित तीनों शब्द मंथन योग्य हैं। हुस्न का अर्थ सुरक्षित होने के हैं, हिस्न किला को कहते हैं, जो दुश्मनों से सुरक्षा का ज़रिया होता है। इहसान पाक दामन रहने और बदकारी से सुरक्षित होने के अर्थ में आता है। अर्थात विवाह की हैसियत एक सुरक्षित किले की होती है, जिसके अंदर आकर व्यक्ति शैतान के आक्रमण से सुरक्षित हो जाता है। इसी अर्थ में पुरुषों के लिए मोहसिनिन एवं महिलाओं के लिए मोहसिनात का प्रयोग होता है। सफह का अर्थ कोई गंदी चीज़ (जैसे खून, पानी आंसू, या मिनी इत्यादि) बहाने के हैं। मुसाफत्तह बिना विवाह के किसी पुरुष या महिला के एक साथ रहने को कहते हैं। खदन (बहुवचन इखदान) का अर्थ दोस्त के हैं। मुसाफिहिन/मुसाफिहात उन पुरुष एवं महिलाओं को कहते हैं जो घोषित बदकारी का अपराध करें और मुत्तखिज़ी अखदान/ मुत्तखिज़ात अखदान उन्हें कहते हैं जो खुफिया रुप से इस कार्य में लिप्त हों। एक अंतर यह बयान किया गया है कि मुसाफिहात में बहुत से सदस्यों से बदकारी का तात्पर्य लिया गया है और इत्तिखाज़ खदन (दोस्त रखना) यह है कि कोई पुरुष या महिला किसी एक सदस्य के साथ अवैध संबध रखे।

इमाम राज़ी रह फरमाते हैः

अधिकत्तर मुफस्सिरीन ने कहा हैः मुसाफित्तह उस महिला को कहते हैं जो घोषित रुप से स्वयं को बदकारी के लिए पेश करे कि जो पुरुष भी चाहे आकर उससे यौन संबध स्थापित कर ले और मुत्तखिज़ह अलखदन वह महिला है जो किसी एक ही सदस्य से अवैध संबध स्थापित करे। जाहिलियत के दौर में दोनों किस्मों के बीच अंतर किया जाता था। वे बहुत से पुरुषों से बदकारी करने वाली महिला को तो ज़ानिया मानते थे, लेकिन किसी एक पुरुष से यौन संबध स्थापित रखने वाली महिला को ज़ानिया नहीं मानते थे। चूं कि यह अंतर उनके बीच सम्मानजनक समझा जाता था इसलिए ईश्वर ने बदकारी की इन दोनों किस्मों का अलग अलग उल्लेख कर दोनों को हराम करार दिया है।

ज़िना की हुरमत

मानव पीढ़ी के अस्तित्व एवं सभ्ययता के विकास के लिए आवश्यक है कि पुरुष एवं महिला का उचित संबध कानून की सीमा के अंतर्गत एवं विश्वसनीय संपर्क तक सीमित हो। इसीलिए इस्लाम रेप को इस दृष्टि से देखता है कि यह वह हरकत है जिसकी यदि आज़ादी दे दी जाए तो एक ओर मानवीय समाज का अस्तित्व बनाए रखना मुश्किल हो जाए एवं दूसरी सभ्यता की जड़ कट जाए। इसी आधार पर वह उसे सख्त घिनौना एवं गलत कार्य करार देता है और उससे दूर रहने का आदेश देता है। 

और ज़िना के निकट ना जाओ। अवश्य वह बड़ी बेशर्मी का काम और बुरा रास्ता है। (अलसराहः32)

इस आयत में कहा गया है कि ज़िना के निकट ना जाओ। इस में बड़ी बलागत पायी जाती है। ऐसा प्रतीत होता है कि कहा जा रहा है कि ना केवल यह कि ज़िना का कार्य ना करो बल्कि उन तमाम संभावना से भी दूर रहो जो इसके समीप ले जाने वाली हो।

इस्लाम ज़िना को एक संगीन सामाजिक अपराध करार देता है और उसको करने वालों के लिए कड़ी सज़ा पेश करता हैः

ज़ानिया महिला और ज़ानी पुरुष दोनों में से हर एक को सौ कोड़े मारो -  (अल नूरः2)

बिना विवाह के आपसी सहमति से भी यौन संबध स्थापित करने की अनुमति नहीं

पश्चिमी देशों के कानून, जिन्हें अब विश्व के अधिकत्तर देशों ने स्वीकार कर लिया है और वैश्विक राय का भी इन पर लगभग समर्थन हो गया है, इनके अनुसार यदि बिना विवाह के यौन संबध दोनों पक्षों की सहमति से स्थापित किया जाए तो वह अपराध नहीं है। उसे जो चीज़ अपराध बनाती है वह जबर एवं ज़ोर ज़बरदस्ती है। 2012 के अंत में हिंदुस्तान की राजधानी दिल्ली में एक छात्रा के साथ सामूहिक दरिंदगी की घटना पेश आयी। इस पर पूरे देश में बहुत ज़बरदस्त विरोध प्रदर्शन हुए और समाज के सभी वर्गों ने इस घटना की कड़ी निंदा की, विशेष रुप से नारीवादी संगठनों और कॉलेज एवं विश्वविद्यालय के छात्र संगठनों ने आसमान सिर पर उठा लिया। इस दौरान में लड़कियों के हाथों में ऐसे प्ले कार्ड्स देखे गए जिन पर लिखा हुआ थाः तुम मेरी सहमति के बिन मुझे हाथ भी नहीं लगा सकते। अर्थात किसी लड़के का किसी लड़की से अवैध रिश्ते के बिना उससे यौन संबध स्थापित करना अपराध नहीं है, बल्कि अपराध यह है कि उस काम के लिए उसकी सहमति क्यों नहीं प्राप्त की गई और उसके साथ ज़बरदस्ती क्यों की गई।

इस्लाम की दृष्टि में जितना सख्त अपराध ज़िना बिल जबर है उतना ही कठोर अपराध आपसी सहमति से बनाए गए संबध भी है। दोनों में कोई अंतर नहीं है। जो लोग विवाह के बिना यौन संबध स्थापित करते हैं वह ईश्वरीय कानून से खिलवाड़ करते हैं और सभ्यता की व्यवस्था में बिगाड़ पैदा करने का कारण बनते हैं, इसलिए वह भी सज़ा के मुस्तहक हैं।

परिवार के निर्माण के लिए अन्य तदाबीर

इस्लाम ने परिवार की स्थापना के लिए और भी बहुत सी तदाबीर इख्तियार की हैं, जिनका पूरी तरह विवरण प्रस्तुत करने का यह मौका नहीं है। उसने पति पत्नी, संतान, माता पिता एवं अन्य रिश्तेदारों के अधिकार बयान किए हैं और सबको पूरा करने का पाबंद किया है। उसने समाज की शुद्धता एवं पवित्रता स्थापित रखने के लिए विभिन्न सावधानियों के आदेश दिए हैं और बदकारी, बेहयाई एवं फवाहिश व मुनकिरात को बढ़ावा देने वालों के लिए कठोर कानून बयान किए हैं। इस्लाम की इन शिक्षा पर अमल किया जाए तो परिवार की संस्था का ठोस निर्माण होगा और पवित्र सभ्यता के वर्चस्व के लिए अपना योगदान भलि भांति अंजाम दे सकेगा।


रज़िउल इस्लाम नदवी

रिसर्च स्कॉलर व लेखक

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