नेकदिल मर्द और पाकीज़ा ख़ातून
(भाग 1)
मानव कुमार को उदास और गुमसुम बैठा देखकर उनकी पत्नी कम्मो ने पूछा, ’’क्या हो गया मन्नू, आज बहुत उदास-उदास और गुमसुम लग रहे हो’’
मानव कुमार ने कम्मो की तरफ देखा और बहुत ही सर्द लहजे में जबाब दिया, ’" सब्ज़ी वाले मुन्ने खां चल बसे, अरे वही तुम्हारे अब्बाजान जिनसे हम सब्ज़ी ख़रीद कर लाते थे।’’
“अरे वही जिसका लड़का पप्पू अक्सर अपने घर पर सब्ज़ी दे जाता है।”
“किसने बताया?’’ चौंकते हुए कम्मो ने पूछा।
“अभी अभी पप्पू यादव का फोन आया था, उसी ने बताया है, दोपहर में जुमे की नमाज़ के बाद जनाज़ा उठेगा। मुझे जाना पड़ेगा। दोपहर का ख़ाना लौटकर खाएंगे।’’ मानव कुमार ने जबाब दिया। इतने में धर्मलाल गुप्ता जी का कॉल आ गया, ’’मानव कुमार जी, मुन्ने खाँ की मृत्यू की ख़बर सुनी?’’
“हाँ, हाँ अभी पप्पू यादव ने फोन कर बताया है। मैं उसके घर जा रहा हूँ। तुम भी आ जाओ। और दूसरे साथियों को भी बता देना।’’
कह कर मानव कुमार जी ने मोबाईल रखा तो कम्मो बोली, ’’कब किसके साथ क्या हो जाये कुछ नहीं कह सकते।’’
मानव कुमार एक लम्बी साँस खींचते हुए बोले ’’तुम बिलकुल सच बोल रही हो कम्मो, कल शाम को मुन्ने ख़ां ने हम सब को चाय पिलाई थी। खूब हंस हंस कर बातें कर रहा था। ना उस को मालूम था ना हम लोगों को कि वो उस की ज़िंदगी की आखिरी शाम है।’’
कम्मो बोली, ’’अब्बाजान की तारीफ़ तो शहर का हर आदमी करता है।’’
तो मानव प्रसाद जी ने कम्मो की तरफ़ देखते हुये कहा, ’’और सारा शहर उन्हें अब्बाजान कहता है।’’
मानव कुमार की बात पर ज़्यादा ध्यान न देते हुये कम्मो ने अपनी बात जारी रखी, ’’गुप्ता जी की मिसेज बता रहीं थीं कि जब भी गुप्ता जी उनकी दुकान पर सब्ज़ी लेने जाते थे। बिना चाय पिये नहीं आने देते थे। पिछले साल लॉक डाऊन के दौरान जब गुप्ता जी के पिताजी की डेथ हो गयी थी। उनका कोई भी रिश्तेदार अंतिम क्रियाकर्म में नहीं आया था तब अब्बाजान और उनके घर वालों ने ही उनका सारा इंतज़ाम कराया था और उनके कहने पर ही उनकी बिरादरी के लोग इकट्ठे हो गये थे।’’
इस पर मानवप्रसाद जी बोले, ’’अपने यहाँ नहीं, जब राजू अस्पताल में भर्ती था तब मुन्ने ख़ाँ हम लोगों का रोज़ ख़ाना लेकर आते थे। उसकी घर वाली मुन्नी बेगम तक देखने आती थी।’’
मुन्नी बेगम का नाम सुनते ही कम्मो के चेहरे पर भाव बदलने लगे लेकिन छुपाती हुयी बोली, ’’हाँ सच्ची बात है। उसका तो पूरा घर अच्छा है। लेकिन तुम्हें तो मुन्नी बेगम ही सबसे अच्छी लगती है।’’
मानव कुमार कुछ और बोलते कि इतने में घर के बाहर से आवाज़ सुनाई दी,’’कम्मो दीदी घर पर हैं क्या?’’
सुनकर मानव कुमार ने कहा, ’’क़मरुन्निसा आ रही हैं। शायद यही खबर ले कर आयी होंगी।’’
कम्मो ने कहा, ’’आओ कम्मो बाजी, कैसी हो।’’
’’अब क्या बतायें कैसी हूँ. अब्बाजान के मरने की खबर सुनी तो रहा नहीं गया। सुबह सुबह जबसे उनकी मौत की ख़बर सुनी तो तभी से जाने कैसा लग रहा है। अपने आप को रोक नहीं पाई। सोचा कम्मो दीदी को बता दें, वोई पप्पू सब्ज़ी वाले का बाप मुन्ने ख़ाँ, मुन्नी के शौहर।’’ कहती हुई क़मरुन्निसा घर के अंदर दाखिल हुईं।
मानव कुमार की पत्नी का नाम कामना देवी है और सब उन्हें कम्मो दीदी कहते है और उनकी मुस्लिम पड़ोसन का नाम क़मरुन्निसा है, उनको सब कम्मो बाजी कहते हैं। उनकी बात सुनकर कम्मो ने जबाब दिया, ’’सही में बाजी हमें भी सुनकर एक दम झटका सा लगा। बहुत अच्छे इंसान थे। जैसा उनका बेटा अच्छे स्वभाव का है वैसे ही वो भी थे। उनकी घर वाली मुन्नी बेगम भी बहुत अच्छी और मिलनसार औरत हैं, क्यों मन्नू?’’
आखिरी लाइन बोलते हुए कम्मो ने मानव कुमार को व्यंग्य भरी नज़र से देखते हुये कहा।
मानव कुमार ने देखा दोनों उनकी तरफ देखकर रहस्यमयी तरीके से मुस्करा रही थीं। मानव कुमार ने खीझते हुए कहा, ’’वो बेचारी विधवा हो गयी और आप लोगों को मज़ाक सूझ रहा है। वो क्या कहते हैं, किसी की जान चली गयी और आपकी अदा ठहरी।’’
कम्मो ने ताना देते हुए कहा, ’’आप जैसों के होते हुए उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। बल्कि आपके रस्ते का कांटा निकल गया। कम्मो के लहजे में थोड़ी सख़्ती सी आ गयी।
“तो क्या वो मुझे अपना खसम बना लेगी हमें?’’ मानव कुमार ने भी गुस्से में भर कर कहा।
अभी अभी मृतक मुन्ने ख़ां के प्रति जो सहानुभूति की भावना उन लोगों की बातचीत में दिखाई दे रही थी, अचानक हवा हो गयी और उसकी जगह नफरत व तक़रार ने ले ली।
क़मरुन्निसा ने माहौल में नरमी लाने की कोशिश की, ’’अरे आप लोग तो मज़ाक-मज़ाक में लड़ने लगे हैं। मुझे क्या मालूम वर्ना मैं अब्बाजान के मरने की ख़बर ही नहीं सुनाती।’’
कम्मो बोली,’’नहीं कम्मो बहिन आपकी कोई गलती नहीं है। मुझे तो इन्होंने ख़बर पहले ही बता दी थी।’’ उसकी बात को सुनकर मानव कुमार बोले, ’’मुन्ने ख़ाँ के मरने की ख़बर तो सारे शहर में फैली हुई है। उसे सब जानते हैं।’’
कम्मो तुनकती हुई फिर बोली, ’’उसे सब जानते हैं और उसकी मुन्नी को भी सब जानते हैं। मुझे सब पता है आप सब्ज़ी लेने के बहाने उसी से बातें मठोलने जाते हैं और घंटे भर उसकी दूकान पर बैठे रहते हैं।’’
इस पर मानव कुमार ने जबाब दिया, ’’आप तो ख़्वांम ख़्वाह शक करती हो. उसकी दुकान पर अच्छी और ताज़ा सब्जी मिलती है और ईमानदारी से तौलकर सब्ज़ी बिकती है इसालिए सारे शहर के लोग उसी की दुकान पर सब्ज़ी खरीदने जाते हैं। मैं भी इसलिए जाता हूँ। मैंने उसके बेटे को पढ़ाया है, इसलिए वो लोग मुझसे ज़्यादा अपनापन रखते हैं।’’
कम्मो बीच में बात काटती हुई बोली, ’’मैं सब जानती हूँ। आप मुन्नी पर डोरे डालने के लिए उसके लड़के को फ्री में ट्यूशन पढ़ाते हैं, आप पक्के लव जिहादी हैं। आपको शुरू से मुसलमान औरतें अच्छी लगती हैं।’’
“और आपको मुस्लिम मर्द अच्छे लगते हैं।’’ कहते हुए मानव कुमार उठे और अपनी छड़ी उठा कर कमरे से बाहर निकल गए। कम्मो उन्हें गुस्से से जाता देखती रहीं।
मानव कुमार जी के इस तरह रूठकर चले जाने पर क़मरुन्निसा ने कहा, ’’आप लोग तो आपस में ही लड़ने लगे। लगता है मेरा आना आप लोगों को अच्छा नहीं लगा, मैं चलती हूँ।’’
वो उठने लगी तो कम्मो ने हाथ पकड़ कर बैठाते हुए मिन्नत भरे लहजे में कहा, ’’नहीं नहीं, कम्मो बाजी आप तो बैठो।’’ और क़मरुन्निसा को बड़े प्यार से फिर कुर्सी पर बैठा दिया और आवाज़ लगाई, ’’अरे बहु! कम्मो बाजी आयी हैं। इनके लिए और मेरे लिए चाय तो बना लाओ. कुछ नाश्ता भी ले आना।’’
क़मरुन्निसा बोली, ’’रहने दो कम्मो दीदी। भाई साहब तो बगैर चाय पिए चले गए।’’ तो कम्मो ने कहा, ’’उन्होंने तो सुबह से तीन तीन चाय पी ली हैं। मैंने अभी पूजा समाप्त की है। नाश्ता करने ही वाली थी कि आप आ गयीं।’’
क़मरुन्निसा बोली, ’’कम्मो दीदी आप बुरा मत मानना। मैं समझती थी आप लोग और दूसरे हिन्दुओं से अलग अलग हटकर हैं। लेकिन आप भी आज हिन्दू-मुसलमान करने लगीं।
कम्मो सफाई देती हुई बोली, ’’नहीं नहीं ऐसी बात नहीं है. वो तो हम लोग हंसी दिल्लगी कर रहे थे।’’ कम्मो को हंसी आ गयी, वो देर तक खिलखिला कर हंसती रहीं।
क़मरुन्निसा भी उसको देखकर हंसने लगीं। इतने में कम्मो की बहु सुधा चाय नाश्ता लेकर आ गयी। चाय पीने के बाद जब क़मरून्निसा जाने लगीं तो कम्मो ने कहा, ’’जब आप अब्बाजान के यहाँ जाओे तो मुझे बुला लेना।’’ फिर बहू से बोली, ’’पन्द्रह बीस चाय बनाकर थरमस में रख दो और राजू को फोन कर दो कि वो मुन्ने खाँ के घर पर दे आये। दो बिस्कुट के पैकेट भी रख देना। रिश्तेदार वगैरह आये होंगे। किसी ने नाश्ता नहीं किया होगा।’’
क़मरून्निसा उनकी बात सुनकर जाते जाते रूक गयी और बोली, ’’आप लोगों के दिल में कितनी इंसानियत है। एक मामूली सब्ज़ी वाले के लिये आप लोग इतने दुखी हो रहे। उसके बच्चों और रिश्तेदारों की इतनी फ़िक्र कर रहे। हमने सुना है कि अब्बाजान के सगे भाई बहन उनके यहाँ नहीं आते-जाते हैं लेकिन आप लोग दूसरे मज़हब के होते हुये भी उनका इतना ख़्याल रख रहे हैं।’’
इस पर बहू ने जबाब दिया, ’’उनके घर वाले भी तो इंसान हैं। इंसानियत का रिश्ता सबसे बड़ा रिश्ता है।’’
“बहू तुम ठीक कह रही हो। कम्मो दीदी आप एक बजे तैयार रहना।’’ कहते हुये क़मरून्निसा अपने घर को चली गयी।
जारी
ज़हीर ललितपुरी (साहित्यकार)
ललितपुर, उत्तर प्रदेश