ईरानी क्रांति का बौद्धिक वास्तुकार: अली शरिअती
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इतिहास

ईरानी क्रांति का बौद्धिक वास्तुकार: अली शरिअती


इतिहास में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो किसी देश पर हुकूमत नहीं करते, लेकिन फिर भी लोगों की सोच पर असर डालते हैं। कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके हाथ में सरकार नहीं होती, लेकिन उनके शब्द लोगों के दिल और दिमाग़ दोनों को हिला देते हैं। ईरान के इतिहास में डॉ. अली शरिअती ऐसे ही इंसान थे।

वो तो पारंपरिक मौलवी थे, किसी राजनीतिक पार्टी के नेता, और ही सत्ता के करीब रहने वाले बुद्धिजीवी। फिर भी उनकी आवाज़ इतनी ताक़तवर थी कि शाह का तानाशाही शासन भी उनसे डरता था, और धार्मिक कट्टरपंथ भी उनसे असहज महसूस करता था। क्योंकि अली शरिअती सवाल करना सिखाते थे। और सवाल सत्ता को सबसे ज़्यादा डराता है।

अली शरिअती का जन्म 1933 में ईरान के खुरासान इलाके में हुआ। उनका परिवार पढ़ा-लिखा था, उनके पिता मोहम्मद तक़ी शरिअती एक धार्मिक सुधारक थे, उनपर सबसे गहरा असर उनके पिता का था पिता ने उन्हें यह सिखाया कि धर्म सिर्फ़ विरासत में मिलने वाली चीज़ नहीं है। बल्कि धर्म को समझना पड़ता है, धर्म पर सोचना पड़ता है, धर्म को चुनना पड़ता है। पिता की दी गई इन्हीं सोच ने अली शरिअती की पूरी ज़िंदगी की दिशा तय कर दी।

जब अली शरिअती जवान हो रहे थे, उस समय ईरान बाहर से आज़ाद दिखता था। वह औपचारिक रूप से किसी देश का उपनिवेश नहीं था। लेकिन अंदर से वह पूरी तरह आज़ाद भी नहीं था।

तेल ईरान का था, लेकिन फ़ायदा पश्चिम की तेल कंपनियों को होता था। संसाधन ईरान के थे फायदा पश्चिम को हो रहा था, बादशाह ईरान का था, लेकिन हुकूमत अमेरिका और ब्रिटेन के इशारों पर चलती थी क्योंकि शाह अमेरिका का पिट्ठू था।

1953 में जब प्रधानमंत्री मोसद्देक़ ने तेल का राष्ट्रीयकरण करने की कोशिश की, तो अमेरिका और ब्रिटेन ने तख़्तापलट करवा दिया। शाह जो वेस्ट का पिट्ठू था, उसे ईरान में सबसे ज़्यादा ताक़त हासिल हो गई। जिसके नतीजे में ईरान में खुली तानाशाही शुरू हो गई।

यहीं से अली शरिअती के ज़हन में आया कि यह सत्ता जनता की नहीं है बल्कि वेस्ट की पिट्ठू है। और ऐसी सत्ता के ख़िलाफ़ खड़ा होना ज़रूरी है। अली शरिअती ने राजनीति में हिस्सा लिया। उन्होंने नेशनल फ्रंट और और फिर नेशनल रेज़िस्टेंस मूवमेंट में भाग लिया। लेकिन इस आंदोलन को कुचल दिया गया और शरिअती को जेल में डाल दिया गया।

फिर धीरे-धीरे उन्हें समझ आया कि सिर्फ़ सरकार बदलने से कुछ नहीं बदलता। अगर लोगों की सोच वही रहे, अगर डर वही रहे, अगर अंध विश्वास वही रहे, तो नई सरकार भी आख़िरकार पुरानी जैसी ही बन जाती है। इसलिए शरिअती ने राजनीति से पहले इंसान को बदलने का रास्ता चुना। उन्होंने कहा कि पहले इंसान को खड़ा करो। फिर वो इंसान अपना रास्ता ख़ुद बना लेगा।

1960 के दशक में अली शरिअती पढ़ने के लिए पेरिस गए। यह उनकी ज़िंदगी का बहुत अहम दौर था। पेरिस में उन्होंने देखा कि कैसे पश्चिम खुद को गर्व के साथ सभ्य कहता है लेकिन साथ ही वह दूसरों पर राज भी करना चाहता है। उस समय अल्जीरिया का स्वतंत्रता संग्राम चल रहा थाजिसका असर उनपर हुआ, पेरिस में उन्होंने मार्क्स को पढ़ा। सार्त्र और कामू को पढ़ा। आधुनिक समाजशास्त्र को समझा। फ्रैंकफर्ट स्कूल को समझा, लेकिन उन्होंने किसी एक विचारधारा को फॉलो नहीं किया। बल्कि उन्होंने हर विचारधारा को अपनी ज़मीन से जोड़कर देखा। उनका कहना था कि पश्चिम ज्ञान देता है, लेकिन साथ ही दूसरों की सोच पर कब्ज़ा भी कर लेता है।

ईरान वापसी के बाद शरिअती पर सावाक की निगरानी शुरू हो गई। सावाक ईरान के शाह की खुफिया पुलिस थी, उन्हें विश्वविद्यालय में पढ़ाने से रोका गया। उनके भाषणों पर पाबंदी लगाई दी गई। उन्हें एक दूरदराज़ गाँव के स्कूल में भेज दिया गया, ताकि वो लोगों पर असर डाल सकें। लेकिन वहाँ भी उन्होंने लोगों की सोच बदलना शुरू कर दिया।

अली शरिअती ने एक शब्द इस्तेमाल किया इस्तहमार। इसका मतलब होता है इंसान को बेवकूफ़ बनाकर क़ाबू में रखना। वो सिर्फ़ शारीरिक गुलामी की बात नहीं उठाते थे बल्कि मानसिक गुलामी की बात भी करते थे। उनके मुताबिक़ सबसे खतरनाक गुलामी वह होती है जब इंसान को लगता ही नहीं कि वह गुलाम है।

जब मज़हब ये सिखाने लगे कि सवाल करना गुनाह है। जब मज़हब यह सिखाने लगे कि ज़ुल्म सहना पुण्य है। जब मज़हब सत्ता की ढाल बन जाए। शरिअती कहते थे कि यह धर्म नहीं है। यह इंसान को सुलाने का तरीका है। शरिअती तेहरान के हुसैनीये--इरशाद से जुड़े। तेहरान की हुसैनीये--इरशाद कोई आम जगह नहीं थी। वो एक स्कूल जैसा था, वहां जुमा की शाम को हज़ारों नौजवान आते, वहां शरिअती आसान भाषा में अपने भाषण देते। 

वे इस्लाम को इंसान की ज़िंदगी से जोड़कर समझाते। वे कहते थे कि इस्लाम सिर्फ़ नमाज़ नहीं है। इस्लाम इंसाफ़ भी है। इस्लाम ज़िम्मेदारी भी है। उनके भाषण रिकॉर्ड होते थे। फिर टेप बनते थे। फिर किताबें बनती थीं। और पूरे ईरान में फैल जाती थीं।

उस दौरान शरिअती का एक वाक्य पूरे ईरान में मशहूर हो गया।

अगर किसी तानाशाह के हाथों में नहीं फँसना चाहते हो, तो पढ़ो, पढ़ो और सिर्फ़ पढ़ो।

यह सलाह सरकार को सबसे ज़्यादा डराती थी। क्योंकि पढ़ा हुआ इंसान चुप नहीं रहता। शरिअती का मानना था सिर्फ़ मुसलमानों को आज़ाद करना काफ़ी नहीं, बल्कि इस्लाम को भी प्रतिक्रियावाद (reactionary thinking) की जेल से आज़ाद करना होगा। उनके इंक़लाबी इस्लाम की अवधारणा के कुछ प्रमुख तत्व थे, जिनमें मूल था क़ुरआन और सुन्नत की ओर वापसी, सामाजिक न्याय, स्वतंत्रता, आत्मसम्मान, और सक्रिय ज़िम्मेदारी।

वो एक ऐसे इस्लाम की अवधारणा प्रस्तुत करते थे, जा डर से नहीं चलता था, जो इंसाफ़ से चलता था। ऐसा जो ज़ुल्म के सामने चुप रहे। ऐसा इस्लाम जो इंसान को सोचने से रोके। ऐसा इस्लाम जो इंसान को ज़िम्मेदारी दे।

जैसा के हर क्रांतिकारी के साथ होता आया है, अली शरिअती का भी विरोध हुआ, उनके दो बड़े विरोधी थे। एक विरोधी थी शाह की हुकूमत, जिसमें शाह की ख़ुफ़िया पुलिस सावाक ख़ास तौर से उनके ख़िलाफ़ थी और दूसरे वो रूढ़िवादी धार्मिक लोग थे, जो हर नई सोच और हर नए सवाल से डरते थे। दोनों अलग दिखते थे, लेकिन दोनों का मक़सद एक था, शरिअती को चुप कराना।

रूढ़िवादी आलोचकों का कहना था, शरिअती धार्मिक फ़िक़्ह के विशेषज्ञ नहीं हैं, इसलिए उनकी धार्मिक व्याख्याएँ खतरनाक हो सकती हैं। इसके जवाब में शरिअती कहते थे, वे मौलवी नहीं हैं, बल्कि सिर्फ़ लोगों को जगाने का काम करते हैं, उनका मक़सद फ़तवे देना नहीं, सोच जगाना है।

1970 के दशक में शाह की हुकूमत में हुसैनीये--इरशाद बंद कर दी गई, शरिअती को जेल में डाल दिया गया, 18 महीने तक यातनाएँ दी गईं। 1975 में अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद उन्हें रिहाई मिली, लेकिन फिर उन्हें घर में नज़रबंद कर दिया गया।

बाद में उन्हें देश छोड़ने की इजाज़त मिली। वहां से वो ब्रिटेन चले गए। वहां पहुंचने के कुछ ही हफ्तों बाद वे मृत पाए गए, ऐसा कहा जाता है के शाह की ख़ुफ़िया पुलिस सावाक ने उनकी हत्या कर दी। 18 जून 1977 को जब उनका इंतिक़ाल हुआ उस वक़्त उनकी उम्र  सिर्फ़ 43 साल थी

अली शरिअती की मौत के बाद उनके विचार और फैल गए, 1979 की ईरानी क्रांति की सोच उन्होंने ही तैयार की थी, उनके विचारों को दबाया गया, लेकिन उन्हें मिटाया नहीं जा सका।  आज भी उनकी किताबें पढ़ी जाती हैं। आज भी उनके विचार ज़िंदा हैं।


 मोहम्मद इक़बाल

स्वतंत्र लेखक, बिहार

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