किशोर बच्चे और रमज़ान
किशोरावास्था एक ऐसा दौर है, जिसको विशेषज्ञों ने दबाव का दौर कहा है। इस आयु में बच्चे विभिन्न प्रकार के दबाव से गुज़र रहे होते हैं। शारीरिक परिवर्तन, मानसिक परिवर्तन के साथ अपने विचारों में वज़न व ताकत महसूस करते हैं।
हालांकि वे बच्चे होते हैं, लेकिन उनका दिमाग उन्हें इस प्रकार समझाता है कि वह व्यस्क हो चुके हैं। इस दौर को विशेषज्ञों ने pseudo era अर्थात झूठा व्यस्क का दौर भी कहा है। इस दौर में बच्चा समझता है कि मैं अब व्यस्क हो चुका हूं, सबकुछ समझता हूं यहां तक कि अपने फैसले खुद ले सकता हूं।
हालांकि जब बच्चा 13 वर्ष का होता है तो सही अर्थ में परिवर्तन के दौर की शुरुआत होती है। उसमें अनेकों परिवर्तन शुरु हो जाते हैं। सामान्यतः माता-पिता, अभिभावक की बातों पर कान नहीं धरता। स्वयं पर नियंत्रण खो देता है। अपने दोस्तों की बातें मानने लगता है। उसे एहसास होता है कि अब मैं बच्चा नहीं हूं। मैं हर चीज़ समझ सकता हूं। ऐसे समय में माता-पिता भी बच्चों की हरकतों से परेशान होते हैं। अपने हिसाब से माता-पिता समझते हैं कि बच्चा बिगड़ रहा है।
डॉक्टर गोलमैन के अनुसारः “किशोरावास्था में स्वयं पर नियंत्रण से आशय एक युवक का अपने एहसास, चाहत और व्यवहार को संभालने की कला है। यह एक महत्वपूर्ण समय है जिसमें दिमाग का विकास स्वयं पर नियंत्रण पाने में मुश्किल पैदा कर सकता है, जिसके नतीजे में जल्दबाज़ी के फैसले और सब्र में मुश्किल हो सकती है। इसलिए सही मार्गदर्शन और लगातार प्रयास के द्वारा युवा समय के साथ अपने अंदर मज़बूती और दृढ़ता का टैलेंट हासिल कर सकते हैं।”
किशोर बच्चों का रोज़ाः बच्चों को आत्म नियंत्रण सिखाने का सबसे महत्वपूर्ण समय रमज़ान बन सकता है, अगर माता-पिता अपने बच्चे जो अब व्यस्क हो चुके हैं (आठवीं, नौवीं, दसवी कक्षा में हैं) उन्हें ज़रुर रोज़ा रखवाएं। उन्हें रोज़ा रखने के लिए कहें। इस आयु में स्वयं पर नियंत्रण पाने के लिए दिमाग में prefrontal cortex का विकास ज़रुरी है। उसी की सहायता से बच्चा फैसला ले सकता है और स्वयं पर नियंत्रण करने में भी आसानी महसूस कर सकता है। किशोर आयु में यह लूप तैयार ही नहीं होता बल्कि विकास के चरण से गुज़र रहा होता है जिस कारण बच्चों का स्वंय पर नियंत्रण रखना बड़ों के मुकाबले में ज़्यादा मुश्किल हो जाता है।
इसलिए स्वयं पर काबू ना पाने की प्रक्रिया को बच्चे समझ नहीं पाते हैं जिसके परिणामस्वरुप एंग्ज़ायटी का शिकार हो जाते हैं। यहां उनके लिए ज़रुरी है कि वह बड़ों की बातों को समझें, लेकिन उसके विपरीत वह बड़ों से दूरी बना लेते हैं। अब रोज़े के मैकेनिज़्म को समझें। चूंकि रोज़ा रखने के बाद अल्लाह की तरफ से दी गई हिदायत पर बच्चे को अमल करना ज़रुरी होता है, जैसे वह खाने पीने से रुक जाएं, स्वयं को बुरे कामों से रोके रखें। उस समय जब वे रोज़े की हालत में होते हैं, क्षमता के बावजूद स्वयं पर नियंत्रण करने से आत्म नियंत्रण पैदा होता है, लेकिन माता-पिता पढ़ाई के बोझ की वजह से बच्चों को पढ़ाई के दौरान रोज़े से रोक देते हैं। इस प्रकार माता-पिता आत्म नियंत्रण का एक बेहतरीन अवसर खो देते हैं।
आत्म नियंत्रण की महत्वत्ताः स्वयं पर नियत्रण भावनात्मक क्षमता से संबंधित है। इंसान जितना मज़बूत होगा, उतना ही अपनी भावनाओं पर काबू रख सकेगा। वह ज़िंदगी के संघर्ष में सफलता हासिल करेगा। वह अपनी शैक्षिक समस्याओं पर भी नियंत्रण पा लेगा। स्वयं पर नियंत्रण हासिल करना युवाओ के लिए सकारात्मक परिणाम का कारक बन सकता है, जैसे कि शैक्षिक गतिविधि में सुधार, स्वस्थ्य संबंध, और घातक रवैयों की संभावना से बचाव जैसे आत्महत्या, डिप्रेशन, मायूसी, दूसरों को तकलीफ पहुंचाना, कामुकता आदि में कमी आती है।
आत्म नियंत्रण हासिल करने में आने वाली चुनौतियां - चूंकि इस आयु बच्चों में अपनी आयु के बच्चों से जुड़ाव ज़्यादा होता है, जिसे Peer group culture कहते हैं। उससे बचाने का तरीका बुरी संगत से दूर रखना ही नहीं है, बल्कि बच्चों के बीच रहते हुए खुद को बचाना है जिसे इमोशनल ट्रेनिंग कहते हैं, और यह रोज़ा रखने से ही संभव हो पाती है। बल्कि यूं कह लीजिए कि रोज़ा अल्लाह की ओर से दिया गया एक ऐसा सिस्टम है जो हर व्यक्ति के लिए एक सुनहरा अवसर होता है। जबकि किशोर बच्चों के लिए यह बहुत बड़ा तोहफ़ा है। आत्म नियंत्रण के रास्ते में बड़ी रुकावट अपनी आयु वर्ग के दोस्तों के दबाव, मानसिक तनाव, भावनात्मक उतार-चढ़ाव और नींद की कमी जैसे कारक हैं, जो युवाओं के रवैये को नियंत्रण करने की सलाहियत को कमज़ोर कर देते हैं। अगर रोज़ा रखवाया जाए तो बच्चे अपने दोस्तों के दबाव से बाहर निकल जाते हैं। रोज़े में नींद पूरी करने की संभावना भी बढ़ जाती है। हार्मोन्स परिवर्तन की वजह से मूड स्विंग होते हैं, लेकिन रोज़े के कारण मूड स्विंग में कमी आती है। लड़कियों के लिए और लड़कों के लिए दोनों के हक में यह महीना बेहतरीन साबित होता है।
लड़कियों में शुरुआती उम्र में जंक फूड की वजह से अनियमित पीरियड्स के कारण PCOD की समस्या बढ़ गई है। इस दौरन जब वह रोज़ा रखती है तो विशेषज्ञों के अनुसार डीटॉक्स की यह प्रक्रिया उनकी पीरियड्स साइकिल को बेहतरीन बनाती है। मूड स्विंग, स्वभाव में चिड़चिडेपन के कारण भी बच्चियां परेशान रहती हैं। झुंझलाहट का शिकार होती हैं, इसलिए रोज़े में उन्हें कंट्रोल के कारण इन समस्याओं पर काबू पाना आसान हो जाता है।
इसी प्रकार लड़कों में भी अपनी पावर के इस्तेमाल का इस उम्र में शौक बन जाता है, उन्हें काबू करना आसान नहीं होता, तेज़ ड्राइविंग, लड़कियों की तरफ आकर्षण और अश्लीलता तक पहुंचने की हिम्मत बढ़ जाती है, रुहानियत कमज़ोर पड़ जाती है। बिना किसी वजह के हंगामा करने का मूड होता है। इन सब समस्याओं पर कंट्रोल करना रोज़ा रखने से आसान हो जाता है।
माता-पिता का आदर्श व्यक्तित्वः माता-पिता स्वयं पर नियंत्रण करने का आदर्श उदाहरण पेश करें, जैसे अपनी भावनाओं को संभालना और उचित फैसले करना। बच्चों से सलाह करना, तरावीह के लिए उन्हें साथ ले जाना, बच्चों के ज़रिए रिश्तेदारों, पड़ोसियों और गरीबों में इफ्तारी भिजवाना, सदका व खैरात देने में उन्हें आगे आगे रखना, ज़कात की कीमत निकालने में उनसे हिसाब किताब करवाना और अपने घर के बुज़ुर्ग और गुज़र चुके लोगों का फिदिया देना जैसे कामों में उन्हें शामिल करके उनके किरदार में निखार पैदा किया जा सकता है। इसके अलावा उनसे शरई मुद्दों पर बातचीत करके उनके आत्मविश्वास को बढ़ाया जा सकता है।
इससे वह सीखते हैं कि शरई मुद्दे कैसे रिसर्च के साथ हल किए जाते हैं। इस प्रकार रमज़ान के महीने में उन्ही से अपने खानदान के गरीबों की ज़रुरतें उनकी शिक्षा पर होने वाले खर्च पर बातें करने से वह खानदानी व सामाजिक ढांचे में हिस्सा लेने का तरीका सीखते हैं। आज के समय में मां छोटे बच्चों से भले रोज़े ना रखवाएं लेकिन टीनएज बच्चों को रोज़े की फज़ीलत (महत्वत्ता) से अवश्य परिचित करवा कर रोज़ा रखवाने का प्रयास करें। आजकल माता-पिता पढ़ाई, होमवर्क और एग्ज़ाम की वजह से चाहते हैं कि बच्चा रोज़ा ना रखे। ऐसे में माता-पिता बच्चों की तरबियत का बेहतरीन मौका खो देते हैं। जिस कारण बाद में बच्चों के बगावती रवैये से परेशान होते हैं।
टीनएज बच्चों के लिए रोज़ा रखने के कई शारीरिक, मानसिक व अध्यात्मिक फायदे हो सकते हैं।
अध्यात्मिक लाभ (रुहानी फायदा) – रोज़ा रखने से बच्चों में अल्लाह की इबादत का शौक पैदा होता है और वह दीन से करीब हो जाते हैं। उनका भरोसा मजबूत होता है कि जो हस्ती उन्हें देख रही है, ना दिखाई देने के बावजूद उसके डर से हम छिप कर भी कुछ खाते पीते नहीं हैं।
सहनशीलता (सब्र व शुक्र) – सब्र व शुक्र की आदत पैदा होती है। रोज़ा सब्र व बर्दाश्त सिखाता है और बच्चों को अल्लाह की नेमतों की कद्र करना भी सिखाता है। वह जब विभिन्न गतिविधियों में शामिल होते हैं, अपने गरीब रिश्तेदारों से करीब होते हैं तो जानते हैं कि अल्लाह ने उन्हें कितनी बेहतर हालत में रखा है, इस पर उनके अंदर अल्लाह का शुक्र अदा करने का जज़्बा पैदा होता है।
नेक कामों की आदत - रोज़ा बच्चों में नेक कामों की आदत पैदा करता है, इससे वह अच्छे व्यवहार अपना सकते हैं।
स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद – रोज़ा हाज़मा दुरुस्त रखने में सहायता करता है। बच्चे जंक फूड से सुरक्षित रहते हैं, दिन भर कुछ ना कुछ खाने की आदत से छुटकारा मिलता है, नींद की साइकिल बेहतर बनती है। वज़न नियंत्रित रहता है।
डीटॉक्स (Detox) की प्रक्रिया – रोज़ा शरीर से हानिकारक बैक्टिरिया को बाहर निकालने में मदद करता है। जिससे शरीर को एनर्जी मिलती है, शरीर स्वस्थ्य रहता है तो मानसिक स्वास्थ्य भी ठीक रहता है जिससे बच्चों की पढ़ाई में सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह सभी फायदे रोज़ा रखने से हासिल हो सकते हैं।
डॉक्टर खान मुबश्शरा फ़िरदौस
संपादक, हादिया ई मैग्ज़ीन