व्यस्त जीवन और सुकून का अभाव
इक्कीसवीं सदी की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी ने इंसान से जहाँ आपसी दूरियाँ छीन ली हैं, वहीं उसकी आत्मा का सुकून भी लूट लिया है। आज का मनुष्य देखने में तो तरक़्क़ी की ऊँचाइयों पर खड़ा नज़र आता है। उसके पास आराम और सुविधाओं के वे सभी साधन मौजूद हैं, जिनकी कल्पना पिछली पीढ़ियाँ भी नहीं कर सकती थीं, लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक गहरी पीड़ा छुपी है, जिसे हम मानसिक अशांति कहते हैं। हमने दौड़ना तो सीख लिया है, पर ठहरना जैसे भूल ही गए हैं।
आधुनिक दौर में व्यस्तता को सफलता की पहचान मान लिया गया है। जो व्यक्ति जितना अधिक व्यस्त दिखाई देता है, समाज उसे उतना ही कामयाब समझता है। इसी सामाजिक दबाव और भौतिक प्रतिस्पर्धा ने हमें एक ऐसी मशीनी ज़िंदगी की ओर धकेल दिया है, जहाँ सुबह से रात तक हम केवल लक्ष्य पूरे करने में लगे रहते हैं। हमारी सुबह अलार्म की कर्कश आवाज़ और मोबाइल नोटिफिकेशन से शुरू होती है, और रात थकान से चूर होकर भी नींद की तलाश में बीत जाती है। प्रश्न यह है कि इतना सब कुछ पा लेने के बाद क्या हम सचमुच खुश हैं?
मानसिक सुकून का अभाव अब केवल एक मनोवैज्ञानिक समस्या नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक संकट बन चुका है। इसकी सबसे बड़ी वजह हमारी गलत प्राथमिकताएँ हैं। हमने अपनी खुशियों को पूरी तरह भौतिक वस्तुओं से जोड़ दिया है। नया मोबाइल, बड़ी गाड़ी और आलीशान घर चाहना बुरा नहीं, लेकिन जब ये इच्छाएँ जुनून का रूप ले लेती हैं, तो सुकून विदा हो जाता है। दूसरों से आगे निकलने की दौड़ में हम अपने भीतर के इंसान को बहुत पीछे छोड़ आते हैं।
इस बेचैनी की एक और बड़ी वजह डिजिटल आक्रमण है। सोशल मीडिया की रंगीन दुनिया ने हमें अपनी ज़िंदगी की तुलना दूसरों की दिखावटी खुशियों से करने पर मजबूर कर दिया है। हम दूसरों की मुस्कुराती तस्वीरें देखकर अपनी नेमतों की क़द्र करना भूल जाते हैं। इससे ईर्ष्या, असंतोष और हीनभावना जन्म लेती है, जो हमारे मन को कभी शांत नहीं होने देती। यह लगातार तुलना हमें भीतर से खोखला करती चली जाती है।
सुकून की ओर वापसी के रास्ते
मानसिक शांति की वापसी के लिए हमें अपनी जीवन-शैली पर ईमानदारी से पुनर्विचार करना होगा। सुकून कोई बाज़ार में बिकने वाली वस्तु नहीं, बल्कि यह एक आंतरिक अवस्था है। इसके लिए कुछ बुनियादी बदलाव आवश्यक हैं—
1. संतोष और कृतज्ञता
जो हमारे पास है, उसके लिए आभार का भाव पैदा करना बेचैनी की सबसे कारगर दवा है। जब इंसान कम में खुश रहना सीख लेता है, तो बहुत कुछ अपने आप सरल हो जाता है।
2. प्रकृति से रिश्ता
दिन में कुछ समय मोबाइल और लैपटॉप से दूर रहकर पेड़ों, खुले आकाश, शांत वातावरण और अपनों के साथ समय बिताना मन को नई ऊर्जा देता है। प्रकृति से जुड़ाव इंसान को फिर से इंसान बनाता है।
3. सही प्राथमिकताएँ तय करना
सब कुछ पाने की ज़िद में खुद को थका डालने के बजाय, अपनी सेहत, मानसिक शांति और परिवार के लिए समय निकालना सीखना होगा। याद रखें, सफलता वही है जो सुकून के साथ आए।
4. स्वयं से संवाद
हर दिन कुछ पल अपने लिए निकालें। खामोशी में खुद से बात करना, अपने डर और इच्छाओं को समझना मानसिक बोझ को हल्का करता है।
5. दूसरों से तुलना छोड़ना
हर इंसान की परिस्थितियाँ अलग होती हैं। तुलना के बजाय आत्म-सुधार पर ध्यान देना ही वास्तविक प्रगति है।
निष्कर्ष
आज का सबसे बड़ा सच यही है कि सुविधा बढ़ी है, पर चैन घटा है। यदि हमें सच में एक संतुलित और खुशहाल जीवन चाहिए, तो हमें रुकना, सोचना और अपने भीतर झाँकना सीखना होगा। क्योंकि अंततः वही व्यक्ति सफल है, जिसके पास ना केवल साधन हों, बल्कि दिल का सुकून भी मौजूद हो।
यास्मीन तरन्नुम "कवंल"
जबलपुर मध्य प्रदेश