रमजान : सामाजिक एकता और सद्भावना का महीना
रमजान के महीने का सामाजिक एकता से बहुत ही गहरा संबंध है। यह महीना सिर्फ मुसलमानों के लिए नहीं, बल्कि सभी धर्मों के लोगों के लिए एकता और प्रेम का प्रतीक है। आए समझते हैं रमजान क्या है।
रमजान वह पवित्र महीना है जिसमें अल्लाह की आखरी किताब यानी कुरआन लोहे महफूज़ से आसमाने दुनिया पर नाजिल हुई और दीने इस्लाम कयामत तक के लिए मुकम्मल कर दिया गया। रमजान का खास महत्व इसी वजह से है। इस महीने में नया चाँद दिखने के बाद से रोजे शुरू हो जाते हैं जो कि ईद का चाँद दिखने तक रखे जाते हैं। रोजा एक तरह की इबादत है जैसे नमाज रोज दिन में पाँच बार फर्ज (अनिवार्य) है वैसे ही रोजा साल में एक महीने के लिए फर्ज हैं। रोजा सुबह सादिक यानी सूरज निकलने से एक से डेढ़ घंटे पहले सेहरी (सुबह का खाना) खाने के बाद से शुरू हो कर शाम को सूरज डूबने के तुरंत बाद इफ्तार होने तक चलता है। इस दौरान बंदे अपना ज्यादातर समय नमाज़ पढ़ने और कुरान की तिलावत करने एक दूसरे की मदद करने और नेक काम करने में गुजारते हैं।
अल्लाह तआला ने हमें बनाया और वही जानता है कि हमारे मन और शरीर की क्या आवश्यकताएँ हैं। उसी के हिसाब से हमें जीवनयापन करने के आदेश भी दिए गए हैं।
नमाज़ के बाद दूसरा अनिवार्य कर्तव्य जो हर मुसलमान पर लागू होता है, वह रमज़ान के महीने में रोज़ा रखना है। पवित्र कुरान और हदीस में रोज़े के लिए प्रयुक्त शब्द 'सौम' का अर्थ है "परहेज़ करना" अर्थात स्वयं को रोके रखना है।
रमजान का महीना हमें सिखाता है कि हम सभी एक हैं और एक दूसरे के साथ मिलकर रहना चाहिए। अपने आप को अनुशासित करना चाहिए और बुरी चीजों से परहेज करने के लिए मजबूत बनना चाहिए।
यह महीना हमें सामाजिक एकता, प्रेम, और सहानुभूति की भावना को मजबूत करने का अवसर प्रदान करता है। रमजान सिर्फ रोजे रखने और नमाज अदा करने का समय नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा अवसर है जब हम अपने समाज को एक सूत्र में बांध सकते हैं।
इस महीने में कुरान उतारा गया और रोजे फर्ज किए गए। इसलिए इस महीने में ज्यादा इबादतें होती हैं, जो हमें अल्लाह के करीब लाती हैं और हमारे बीच के बंधन को मजबूत करती हैं साथ ही आपसी भाईचारे को बढ़ाती हैं।
कुरआन में कहा गया है...
"और नमाज कायम करो और ज़कात दो और रुकू करने वालों के साथ रुकू करो" (2:43)
ऐ ईमान वालो! तुम पर रोज़ा रखना फ़र्ज़ किया गया है, जैसा कि तुमसे पहले वालों पर फ़र्ज़ किया गया था, ताकि तुम अल्लाह के प्रति सचेत हो जाओ। (2: 183)
रोज़ा नैतिक उत्थान का एक साधन है, इसका प्रमाण इस तथ्य से मिलता है कि रोज़ा केवल सुबह से शाम तक खाने-पीने और यौन संबंध बनाने पर ही रोक नहीं लगाता, बल्कि चुगली, अपशब्द बोलना, झूठ बोलना आदि जैसे अन्य बुरे कार्यों से दूर रहने को भी प्रेरित करता है। अबू हुरैरा ने अल्लाह के रसूल सल्ल० (उन पर शांति हो) के हवाले से कहा है: यदि कोई झूठ और उससे मिलते-जुलते कार्यों को नहीं छोड़ता, तो अल्लाह को यह आवश्यक नहीं कि वह अपना भोजन और पेय छोड़ दे (सही बुखारी)।
रमज़ान में रोज़ा रखने के कई सामाजिक पहलू हैं जिसमें से एक यह है कि इन दिनों पूरा माहौल इबादत से भर जाता है। रात में एक अतिरिक्त सामूहिक नमाज़, तरावीह, पढ़ी जाती है, जिसमें कुरान का पाठ किया जाता है और मुसलमानों को याद दिलाया जाता है कि रमज़ान के महीने में ही कुरान का अवतरण शुरू हुआ था। इस महीने में सदकात भी अधिक उत्साह और उमंग से दी जाती है। इस प्रकार पूरा मुस्लिम समाज प्रेम से प्रेरित होता है।
अबू हुरैरा रज़ि० ने अल्लाह के रसूल सल्ल० के हवाले से कहा: जब रमज़ान शुरू होता है, तो जन्नत के द्वार खुल जाते हैं, जहन्नम के द्वार बंद हो जाते हैं और शैतान जंजीरों में जकड़ दिए जाते हैं (बुखारी और मुस्लिम)।
इस महीने में रोज़े के दो उद्देश्य है। भोजन और पेय से परहेज़ करना इसलिए ज़रूरी है ताकि व्यक्ति स्वयं यह महसूस कर सके कि गरीब और भूखे लोग क्या महसूस करते हैं; इस प्रकार सामाजिक ज़िम्मेदारी को एक धार्मिक सिद्धांत के रूप में मानव चेतना में स्थापित किया जाता है। रमज़ान के दौरान रोज़े का दूसरा उद्देश्य आत्म-अनुशासन है, जो व्यक्तिगत नैतिकता का एक पहलू है जिस पर सभी इस्लामी शिक्षाओं में ज़ोर दिया गया है। इसके परिणाम में खुशखबरी दी जाती है कि "जो कोई ईमान और इख़्लास के साथ रोजा रखता है, उसके पिछले गुनाह माफ कर दिए जाते हैं" (Bukhari, Hadith 38)
अकसर लोग रमजान के महीने में अपनी ज़कात निकालते हैं क्योंकि यह एक पवित्र महीना है और इसमें नेक काम करने का अज्र बढ़ जाता है। ज़कात और सदका समाज सेवा का माध्यम है।
ज़कात इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक है, जिसका अर्थ है गरीबों और जरूरतमंदों को दान देना। यह एक प्रकार का सामाजिक कर है जो मुसलमानों पर लगाया जाता है, जो उनकी संपत्ति का एक निश्चित हिस्सा होता है।
ज़कात और सदके के द्वारा हम अपने धन का एक हिस्सा गरीबों और जरूरतमंदों की मदद के लिए देते हैं, तो यह न केवल उनकी जरूरतों को पूरा करता है, बल्कि यह हमें समाज में एकता और समानता की भावना को बढ़ावा देने में भी मदद करता है।
"नबी ﷺ सबसे ज़्यादा सखी (उदार) थे, और रमजान में उनकी सखावत और भी बढ़ जाती थी।" (बुखारी और मुस्लिम)
दिन भर के रोजे के बाद इफ़्तार का समय बहुत खास होता है! परिवार और दोस्तों के साथ बैठकर दुआ करना और एक साथ भोजन करना, एक अलग ही खुशी देता है। जब हम एक साथ बैठकर रोजा इफ्तार करते हैं, तो यह न केवल हमारे बीच के बंधन को मजबूत करता है, बल्कि यह हमें समाज के गरीब और जरूरतमंद लोगों के साथ जुड़ने का भी अवसर प्रदान करता है। एक हदीस में है: "जो व्यक्ति किसी रोज़ेदार को इफ्तार कराता है, उसे उस रोज़ेदार के समान सवाब मिलता है, बिना उसके रोज़े के सवाब में कोई कमी किए।" (तिर्मिज़ी)
रमजान की खास इबादतों में तरावीह की नमाज़, कुरआन की तिलावत, दान-दक्षिणा, और इफ्तारी कराना शामिल हैं।
तरावीह की नमाज़ रमजान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह नमाज़ रात में इशा की नमाज़ के बाद पढ़ी जाती है, और इसमें कुरआन को धीरे-धीरे पढ़ा जाता है। इसे जमात के साथ पढ़ना बहुत सवाब का काम है। फ़रमाया गया है "जो कोई ईमान और इख़्लास के साथ नमाज अदा करता है, उसके पिछले गुनाह माफ कर दिए जाते हैं" (बुखारी, हदीस 37)
जब हम एक साथ मिलकर तरावीह नमाज अदा करते हैं, तो यह न केवल हमारे बीच के बंधन को मजबूत करती है, बल्कि यह हमें अल्लाह के करीब भी करती है।
भारत में कई उदाहरण हैं जहां अन्य धर्मों के लोग भी रमजान के महीने में रोजे रखते हैं और मुसलमानों के साथ मिलकर इफ्तार करते हैं। यह दिखाता है कि हमारे देश में विभिन्न धर्मों के लोग एक दूसरे के साथ मिलकर रहते हैं और एक दूसरे की परंपराओं का सम्मान करते हैं। इस पवित्र महीने में, हम एक दूसरे के करीब आते हैं और समाज में एकता और प्रेम की भावना को मजबूत करते हैं!
नौशीन फातिमा
लेखिका एवं शिक्षाविद, मध्यप्रदेश