क्या होता है केंद्रीय बजट?
प्रत्येक वर्ष संसद मे बजट सत्र के दौरान साल भर का केंद्रीय बजट वित्त मंत्री द्वारा पेश किया जाता है तो आइए हम केंद्रीय बजट पर चर्चा से पहले यह समझने का प्रयास करें कि बजट वास्तव में क्या है? बजट एक वित्तीय योजना है जो एक निश्चित अवधि जैसे एक महीना या एक साल में होने वाली आय और व्यय का लेखा-जोखा प्रस्तुत करती है। इसके अंतर्गत यह योजना बनाई जाती है की धन कहां-कहां से जुटाया जाएगा और कहां-कहां ख़र्च होगा। इसमें वित्तीय लक्ष्य जैसे बचत, निवेश आदि को प्राप्त करने की योजना भी होती है ताकि पैसे का बेहतर प्रबंधन किया जा सके। यह व्यक्तियों परिवारों, कंपनियों और सरकारों के लिए एक महत्वपूर्ण वित्तीय रोडमैप होता है।
बजट के प्रकार:
व्यक्तिगत बजट: व्यक्तियों के अपने पैसे के प्रबंधन के लिए।
पारिवारिक बजट: परिवार के आय तथा व्यय की योजना के लिए।
व्यवसायिक बजट या कॉर्पोरेट बजट: व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के वित्तीय नियोजन के लिए।
सरकारी बजट: केंद्र सरकार, राज्य सरकारों तथा इस स्थानीय निकायों की वित्तीय योजना के लिए।
भारत सरकार द्वारा प्रतिवर्ष जो बजट बनाया जाता है तथा संसद में प्रस्तुत किया जाता है उसे केंद्रीय बजट (UNION BUDGET) कहते हैं। यह बजट केवल एक वार्षिक वित्तीय दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह सरकार की आर्थिक सोच, विकासात्मक प्राथमिकताओं और भविष्य की दिशा को दर्शाने वाली एक महत्वपूर्ण नीति दस्तावेज़ है। हर वर्ष संसद में प्रस्तुत किया जाने वाला केंद्र सरकार का बजट देश की 140 करोड़ से अधिक जनसंख्या के जीवन को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। कर व्यवस्था, सरकारी व्यय, कल्याणकारी योजनाएँ, आधारभूत ढाँचे का विकास और आर्थिक सुधार—इन सभी का निर्धारण इसी बजट के माध्यम से किया जाता है। समय के साथ भारतीय संघ बजट एक औपनिवेशिक लेखा विवरण से बदलकर राष्ट्र निर्माण का एक सशक्त माध्यम बन चुका है।
केंद्रीय बजट क्या है?
केंद्रीय बजट भारत सरकार की वार्षिक वित्तीय योजना है, जिसे एक वित्तीय वर्ष के लिए तैयार किया जाता है। भारत में वित्तीय वर्ष 1 अप्रैल से 31 मार्च तक होता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 112 के अनुसार इसे ‘वार्षिक वित्तीय विवरण’ (Annual Financial Statement) कहा गया है। बजट का निर्माण वित्त मंत्रालय द्वारा किया जाता है और इसे वित्त मंत्री द्वारा लोकसभा में प्रस्तुत किया जाता है। संसद की स्वीकृति के बाद ही बजट को लागू किया जाता है।
केंद्रीय बजट की समग्र संरचना
केंद्रीय बजट को मुख्यतः दो भागों में विभाजित किया जाता है—राजस्व बजट और पूंजी बजट। यह विभाजन सरकार की आय और व्यय को स्पष्ट रूप से समझने में सहायक होता है और यह दर्शाता है कि सरकार अपने संसाधनों का उपयोग किस प्रकार कर रही है।
राजस्व बजट (Revenue Budget):
राजस्व बजट में वह आय और व्यय शामिल होते हैं जिनसे कोई स्थायी संपत्ति का सृजन नहीं होता।
राजस्व प्राप्तियाँ (Revenue Receipts)
राजस्व प्राप्तियों में कर राजस्व और गैर-कर राजस्व शामिल होते हैं। कर राजस्व के अंतर्गत आयकर, कॉरपोरेट कर, वस्तु एवं सेवा कर (GST), सीमा शुल्क और उत्पाद शुल्क आते हैं। गैर-कर राजस्व में ब्याज से प्राप्त आय, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से मिलने वाला लाभांश, शुल्क, जुर्माना और दंड शामिल होते हैं।
राजस्व व्यय (Revenue Expenditure)
राजस्व व्यय में सरकारी कर्मचारियों के वेतन, पेंशन, सार्वजनिक ऋण पर ब्याज भुगतान, सब्सिडी (जैसे खाद्य, उर्वरक और ईंधन), राज्यों को अनुदान तथा शिक्षा और स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च शामिल होता है। जब राजस्व व्यय, राजस्व प्राप्तियों से अधिक हो जाता है, तो उसे राजस्व घाटा कहा जाता है, जो वित्तीय संतुलन के लिए एक चुनौती होता है।
पूंजी बजट (Capital Budget)
पूंजी बजट उन वित्तीय लेन-देन से संबंधित होता है जिनसे या तो संपत्तियों का निर्माण होता है या देनदारियों में कमी आती है।
पूंजी प्राप्तियाँ (Capital Receipts)
पूंजी प्राप्तियों में बाजार से उधारी, विदेशी सरकारों या संस्थानों से ऋण, पूर्व में दिए गए ऋण की वसूली तथा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में विनिवेश से प्राप्त धन शामिल होता है।
पूंजी व्यय (Capital Expenditure)
पूंजी व्यय में सड़क, रेलवे, बंदरगाह, हवाई अड्डे जैसे आधारभूत ढाँचे का विकास, रक्षा उपकरणों की खरीद, सार्वजनिक बैंकों में पूंजी निवेश और राज्यों को दिए जाने वाले ऋण शामिल होते हैं। इसे विकासोन्मुखी व्यय माना जाता है क्योंकि यह अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक क्षमता को मजबूत करता है।
केंद्रीय बजट की प्रमुख विशेषताएँ
केंद्रीय बजट की एक प्रमुख विशेषता राजकोषीय नीति (fiscal policy) और राजकोषीय घाटे (fiscal deficit) का प्रबंधन है। राजकोषीय घाटा सरकार के कुल व्यय और कुल प्राप्तियों (उधारी को छोड़कर) के बीच के अंतर को दर्शाता है। कर नीति बजट का एक महत्वपूर्ण अंग है। बजट में प्रत्यक्ष कर और अप्रत्यक्ष करों में संशोधन किए जाते हैं ताकि निवेश को प्रोत्साहन मिले, खपत बढ़े और मध्यम एवं निम्न आय वर्ग को राहत प्रदान की जा सके। हाल के वर्षों में कर प्रणाली को सरल, पारदर्शी और डिजिटल बनाने पर विशेष बल दिया गया है। यूनियन बजट, केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संबंधों को भी परिभाषित करता है, जिसमें करों का बँटवारा, अनुदान और केंद्र प्रायोजित योजनाएँ शामिल होती हैं।
भारत में सरकारी बजट की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत में पहला बजट 1860 में ब्रिटिश शासन के दौरान जेम्स विल्सन द्वारा प्रस्तुत किया गया था। स्वतंत्र भारत का पहला बजट 26 नवंबर 1947 को आर. के. शनमुखम चेट्टी ने प्रस्तुत किया। यह बजट एक नए स्वतंत्र राष्ट्र के सामने मौजूद आर्थिक चुनौतियों को दर्शाता था। 1950 से 1980 के दशक तक बजट पंचवर्षीय योजनाओं के अनुरूप तैयार किए जाते थे, जिनमें सार्वजनिक क्षेत्र और नियोजित विकास पर विशेष जोर दिया गया। बाद के वर्षों में वैश्विक उदारीकरण की पृष्ठभूमि में बजट तैयार किए गए।
वर्तमान परिदृश्य
केंद्र सरकार का आधुनिक बजट पारदर्शिता, डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्टार्ट-अप्स, सतत विकास और सामाजिक सुरक्षा पर केंद्रित है। 2016 तक रेलवे बजट अलग से प्रस्तुत किया जाता था जिसे 2017 से यूनियन बजट में शामिल कर दिया गया है।
केंद्र सरकार बजट का महत्व
यह बजट कई कारणों से बहुत महत्वपूर्ण है :
संसाधनों का आवंटन: बजट विभिन्न क्षेत्रों में संसाधनों का आवंटन करता है जिससे आर्थिक विकास और जन कल्याण के लिए प्राथमिकताएं निर्धारित होती हैं। बजट यह सुनिश्चित करने में सहायक होता है कि आवश्यक सेवाओं के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध हो।
आर्थिक स्थिरता: बजट के माध्यम से राजकोषीय नीति का प्रबंध करके सरकार आर्थिक उतार-चढ़ाव के दौरान अर्थव्यवस्था को स्थिर कर सकती हैं। रणनीतिक बजट निर्णय मंदी और मुद्रा समिति के प्रभाव को कम कर सकते हैं।
सार्वजनिक जवाब देही: एक पारदर्शी बजट प्रक्रिया जवाब देही को बढ़ावा देती है जिससे नागरिकों को यह समझने में मदद मिलती है कि सार्वजनिक धन कैसे खर्च किया जा रहा है और वह वित्तीय प्रबंधन के लिए सरकार को जवाबदेह ठहरा सकते हैं।
सामाजिक कल्याण और समावेशी विकास: केंद्रीय बजट का एक बड़ा हिस्सा सामाजिक क्षेत्र के लिए आबंटित किया जाता है। इसमें ग़रीबी उन्मूलन, स्वास्थ्य सेवाएँ, शिक्षा, कौशल विकास, महिला एवं बाल कल्याण, ग्रामीण विकास और रोजगार सृजन से संबंधित योजनाएँ शामिल होती हैं। यह व्यय समावेशी विकास के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
आधारभूत ढाँचा और निवेश (infrastructure and capital investment): आधुनिक बजटों में आधारभूत ढाँचे के विकास पर विशेष ज़ोर दिया जाता है क्योंकि यह आर्थिक विकास और रोज़गार सृजन का प्रमुख माध्यम है। सड़कें, रेलवे, डिजिटल कनेक्टिविटी और नवीकरणीय ऊर्जा (renewable energy) में निवेश भारत की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को बढ़ाता है।
बजट बनाने में चुनौतियां
बजट के महत्व के बावजूद सरकारी बजट कई चुनौतियों का सामना करता है। राजनीतिक दबाव के कारण निर्णय लिए जा सकते हैं जिसमें नीति निर्माता दीर्घकालिक लाभ के बजाय तात्कालिक हितों को प्राथमिकता देते हैं, जिससे आदर्श बजट बनाना चुनौती पूर्ण हो जाता है। साथ ही अंतरराष्ट्रीय घटनाएं तथा अन्य वैश्विक आर्थिक कारक भी प्रभाव डालते हैं। सरकारों को आर्थिक स्थिरता और विकास को बढ़ावा देने के लिए इन जटिलताओं से निपटना होता है।
संक्षेप में सरकारी बजट एक शक्तिशाली साधन है जो अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। संसाधनों के आवंटन को निर्धारित करके और राजकोषीय नीति के माध्यम से आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करके बजट विकास और स्थिरता को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रभावी बजट सतत आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्त करता है। यह सुनिश्चित करते हुए कि सार्वजनिक संसाधनों का कुशलता पूर्वक उपयोग सामाजिक कल्याण को बढ़ावा देने के लिए किया जाए। इसलिए नीति निर्माताओं को भावी पीढ़ियों के लिए एक मजबूत अर्थव्यवस्था के निर्माण के लिए अल्पकालिक आवश्यकताओं तथा दीर्घकालीन सतत विकास के बीच संतुलन बनाना होगा।
नए बजट से जनता की आकांक्षाएं
नए बजट के द्वारा देश की जनता यह आशा करती है कि देश में आर्थिक समस्याओं के समाधान में नया बजट योगदान देगा। इसलिए ऐसी नीतियों का निर्माण होना चाहिए जिससे देश में आर्थिक विकास के साथ-साथ ग़रीबी का उन्मूलन हो और रोज़गार के अवसर बढ़ें और आर्थिक असमानता कम हो।
कर नीति इस प्रकार की बनाई जाए कि करों का भार अल्प तथा मध्यम वर्ग पर कम पड़े। शिक्षा तथा समाज कल्याण के क्षेत्र में अधिक धन आवंटित किया जाए।
डॉ० फ़रहत हुसैन
रिटायर्ड प्रोफेसर, रामनगर, उत्तराखंड