काजल चौधरी हत्याकांड : कब सुधरेगा समाज?
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कवर स्टोरी

काजल चौधरी हत्याकांड : कब सुधरेगा समाज?

पिछले दिनों नई दिल्ली में हुई SWAT कमांडो काजल चौधरी की उनके पति द्वारा की गई हत्या ने सबको झकझोर कर रख दिया। काजल के परिवार वालों ने उनके पति पर दहेज उत्पीड़न का आरोप लगाया है। काजल को मारते समय उसके पति ने काजल के भाई को फोन कर सबूत रिकॉर्ड करने को भी कहा था। 

यह घटना सच में बेचैन कर देने वाली है। हत्यारे पति का कॉन्फिडेंस इतना था कि पत्नी को मारते समय उसके भाई को फोन लगाकर कहता है, तेरी बहन को मार रहा हूँ, रिकॉर्ड कर ले सबूत काम आएगा। और यह कोई निम्न वर्ग का शराब पीकर हल्ला करने वाला निकम्मा आदमी नहीं, जो नशे में किसी हारी-बेचारी महिला को पीटता हो। 

महिला ख़ुद दिल्ली पुलिस में थी। ऊपर से पति डिफेंस मिनिस्ट्री में और पत्नी का भाई भी पुलिस में। तब दहेज से जुड़े डोमेस्टिक वॉयलेंस का यह हाल है, जिसकी परिणति इतनी क्रूरता से की गई हत्या में हुई।

27 वर्ष की SWAT कमांडो काजल चौधरी, जो चार महीने की गर्भवती थीं और उनका एक 1.5 साल का बेटा भी है। 22 जनवरी 2026 की रात करीब 10 बजे उनके घर में जो कि मोहन गार्डन इलाके में स्थित है, उनके पति अंकुर चौधरी ने घरेलू झगड़े के दौरान पहले उनका सिर दरवाज़े के फ्रेम से टकराया और फिर भारी डंबल से सिर पर कई बार वार किया। 

अंकुर ने हमले से पहले काजल के भाई निखिल को फोन किया, जो ख़ुद दिल्ली पुलिस में कांस्टेबल हैं। अंकुर ने निखिल से कहा कि वह कॉल रिकॉर्ड कर ले, पुलिस एविडेंस में काम आएगा। निखिल ने कॉल पर बहन की चीख़ें सुनीं, लेकिन फोन कट गया। अंकुर ने दुबारा फोन करके कहा कि काजल मर गई है, अस्पताल आकर ले जाओ। 

अब काजल का परिवार आरोप लगा रहा है कि शादी के बाद से ही दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा चल रही थी, हालांकि यह लव मैरिज थी। अब इस हालांकि का क्या ही मतलब निकालें। जब इतने समय से प्रताड़ना चल रही थी फिर भी किसी ने कुछ नहीं किया। लव मैरिज में तो वैसे ही पूरे समाज और दोनों परिवारों की गिद्ध-दृष्टि गड़ी होती है कि बात बिगड़े और सबको मौक़ा मिले कहने का कि अपनी मनमर्ज़ी चलाई थी, अब भुगतो ख़ुद ही। बल्कि कई बार तो कपल्स, ज़्यादातर लड़कियां हीं, अकेले चुपचाप सब-कुछ सहती रहती हैं, क्योंकि पसंद उन्हीं की थी। परिवार का बैक सपोर्ट न के बराबर होता है। 

इस केस में भी दोनों पानीपत के आर्य कॉलेज में पढ़ते थे। अंकुर की बहन के ज़रिए पहचान हुई थी और 4 साल प्रेम में रहने के बाद शादी हुई थी। काजल के घर वाले पहले तैयार नहीं थे। फिर बाद में मान गए थे। लेकिन काजल न सिर्फ़ आत्मनिर्भर थी, बल्कि कड़ी मेहनत और कमांडो लेवल की ट्रेनिंग पाई फाइटर लड़की थी। इसलिये कुछ लोग कह रहे हैं कि इतना सब होने के बावजूद ख़ुद की ही रक्षा नहीं कर पाई। 

यहाँ भी विक्टिम ब्लेमिंग। मरने वाली की ग़लती है, ख़ुद को मरने क्यों दिया उसने। ना कि यह कि वह अपने ही घर में सुरक्षित क्यों नहीं थी। कोई कितना ही मज़बूत क्यों न हो, कहीं न कहीं किसी पर इमोशनल डिपेंडेंसी होना, ह्यूमन नेचर है। मुआमला ऊपर से चाहे दहेज का कह दिया जाए, इसकी जड़ों में वही औरत पर कंट्रोल की चाह, स्पेशली जब वह ख़ुद से कहीं अधिक समर्थ और सक्षम हो, अपनी ईगो का सेटिस्फेक्शन, 'कर रहा हूँ, क्योंकि कर सकता हूँ' वाली अथॉरिटी का भाव ही मिलेगा। 

फिर महिलाओं पर घरेलू हिंसा का तो इतना नॉर्मलाइज़ेशन है ही हमेशा से समाज में, कोई नीले ड्रम वाला छाती-कूट नहीं होगा। किसी रिया या निकिता जैसी विच हंटिंग नहीं होगी। बस यह होगा कि कई महिलाएं अपना सोशल सर्कल और समेटती जाएंगी। इन घटनाओं का ऐसी त्रासदी से जूझ रही महिलाओं पर बहुत बुरा असर होता है। उनका सामाजिक जुड़ाव कम होता जाता है, वे डर से घर में क़ैद हो जाती हैं, ज़्यादा सबमिसिव हो जाती हैं और इससे मेंटल हेल्थ इशूज़, डिप्रेशन, एंग्ज़ाइटी और PTSD बढ़ते हैं।

इंटरजेनरेशनल ट्रांसमिशन से बच्चे ऐसी हिंसा को सामान्य मानते हैं, जो समाज में जेंडर इनइक्वालिटी को और बढ़ाता है। पहले ही महिलाओं का वर्क पार्टिसिपेशन इतना कम है। हमारे यहाँ डोमेस्टिक वॉयलेंस को प्राइवेट मैटर माना जाता है, जो ऐसे केसेज़ की रिपोर्टिंग को रोकता है और समाज में स्टिग्मा बढ़ता ही जाता है।

ऐसे सभी मैटर्स में एक स्पष्ट जेंडर बायस दिखेगा, जहां पत्नी द्वारा पति की हत्या होने पर सारी महिलाओं को दोषी ठहराया जाता है और इसे महिलाओं की 'समस्या' के रूप में देखा जाता है, जबकि पति द्वारा की गई हिंसा से लेकर हत्या तक को अक्सर नॉर्मलाइज़ कर दिया जाता है। यहाँ बेनेवोलेंट सेक्सिज़्म से महिलाओं को 'प्रोटेक्शन' के नाम पर कंट्रोल करने को जस्टिफाई किया जाता है। 

इस ख़बर को भी इतना कवरेज इसलिये मिल गया कि लड़की न सिर्फ़ कमाऊ थी, कुलदीपक भी दे चुकी थी, एक बेटे की माँ थी, स्वस्थ, सुंदर तो थी ही, अपने साथ-साथ दूसरों की रक्षा करने में भी सक्षम थी, SWAT ऑफिसर थी। फिर भी अपने ही घर में इतना निर्मम अंत हुआ। अगर किसी छोटी जगह की कोई हाउसवाइफ होती तो कहीं एक छोटा सा कॉलम मिलता, जिसको लोग सरसरी पढ़कर इग्नोर कर देते।


डॉक्टर नाज़िया ख़ान

आयुर्वेद फिज़ीशियन, भोपाल, मध्यप्रदेश

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