"रमज़ान रोज़ा और क़ुरआन"
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दिव्य ज्योति

"रमज़ान रोज़ा और क़ुरआन"


"ए ईमान वालो तुम पर भी रोज़े फ़र्ज़ किए गए हैं जिस तरह तुमसे पहले वालों पर फ़र्ज़ किए गए थे ताकि तुम तक़वा हासिल करो" (क़ुरआन-2:183)

क़ुरआन को अल्लाह ने तमाम इंसानों के हिदायत व रहनुमाई के लिए भेजा है, इस हिदायत के लिए वह शख़्स राह पाएगा जिसके दिल में तक़वा होगा, इंसान किस तरह तक़वा हासिल कर सकता है इसके अलग-अलग तरीक़े क़ुरआन बताता है और उन्हीं में से एक रोज़ा भी है, चूँकि क़ुरआन और तक़वा के बीच एक गहरा संबंध है इसलिए वह इबादत जो तक़वा हासिल करने के लिए सबसे ज़्यादा कारगर है, वह रमज़ान के महीने की ख़ास इबादत बना दी गई क्योंकि रमज़ान का महीना क़ुरआन के नुज़ूल का महीना है यानी तक़वा के हुसूल का महीना है।

क़ुरआन और रोज़ा दोनों का उद्देश्य इंसानी शख़्सियत को इस तरह संवारना है कि उसमें अल्लाह का तक़वा और मुहब्बत पैदा हो जाए। इस हिसाब से रोज़ा और क़ुरआन में बहुत गहरा संबंध पैदा हो जाता है। यही वजह है कि रमज़ान के महीने में दिन हालते-सियाम (रोज़े की हालत) में और रातें हालते-क़याम (इबादत करते हुए) में गुज़ारने की ताकीद की गई है।

क़ुरआन को पढ़ते हुए उन सिफ़ात (गुण) पर ठहर जाएं जिन्हें अल्लाह तआला अपने बंदे में देखना चाहता है। ख़ास तौर पर वे सिफ़ात जिनका ज़िक्र बार-बार किया गया है। क़ुरआन के इस अध्ययन से पता चलेगा कि अल्लाह को सबसे ज्यादा वह बंदा पसंद है जो "मुत्तक़ी"' (परहेज़गार) हो और 'सब्र व शुक्र' करने वाला हो, जिसका दिल अल्लाह की मुहब्बत से भरा हुआ हो और जो उसकी ख़ातिर हर हाल में सब्र करने वाला और शुक्र करने वाला हो। जब इन सिफ़ात पर ठहर कर ग़ौर किया जाएगा, तो दिल में तुरंत यह एहसास पैदा होगा कि "यही तो वह सिफ़ात हैं जिनकी ख़ातिर मुझे रोज़ा रखने का हुक्म दिया गया है।" और यही अहसास वास्तव में इस महीने का सच्चा सम्मान है ।

इसी तरह, जब इंसान रोज़े की हालत में हो तो उसे सोचना चाहिए कि वह क्यों भूखा और प्यासा हैइसलिए क्योंकि यह अल्लाह का हुक्म है, उसकी मर्ज़ी है कि मैं खाने-पीने से रुक जाऊं और अपनी इच्छाओं व आरज़ूओं पर पहरा बिठा दूं। रोज़ा सिर्फ़ पेट और मुँह का नहीं, बल्कि रूह और दिल का भी होना चाहिए ताकि इंसान 'मुत्तक़ी' बन सके।''  तक़वा अपनी इच्छाओं और आरज़ूओं को ख़ुदा के इरादे और उसकी मर्ज़ी के हवाले कर देने का ही नाम है। 

रोज़े के ज़रिए वास्तव में यही चाहा गया है। रोज़ा फ़ाक़ाकशी और नफ़्सकशी नहीं है, बल्कि यह ज़ब्ते-नफ़्स (आत्म-संयम) ज़ब्ते-राय (विचारों के नियंत्रण) और ज़ब्ते-ज़ौक़ (इच्छाओं पर नियंत्रण) का नाम है। इंसान का नफ़्स और उसके विचार बेक़ाबू न हों, तक़वा दिल की उस कैफ़ियत का नाम है जिसमें इंसान अल्लाह की नाराज़गी से बचने के एहसास के साथ जीता है, और इसी एहसास को रोज़ा पैदा करता है ।

क़ुरआन भी यही चाहता है कि इंसान 'मुत्तक़ी' बन जाए और अल्लाह का फ़रमाँबरदार हो जाए, और अल्लाह से किए हुए वादे में वफ़ादार रहे।

इस तरह रोज़ा इंसान के अंदर एक 'क़ुरआनी शख़्सियत' को परवान चढ़ाता है। रमज़ान के महीने की ये दोनों नेमतें (रोज़ा और क़ुरआन) इंसान के ज़हन और दिल की गिरहें खोलती हैं और उसे पस्ती से बुलंदी की ओर ले जाती हैं।

एक शख़्स जो रोज़ा रखता है उसकी ज़िम्मेदारी है कि वो अपने रोज़े की हिफ़ाज़त करे, सहरी करते समय खुद से वादा करे कि वह रोज़े के उद्देश्य यानी तक़वा हासिल करने के लिए दिन भर संघर्ष करेगा और जब शाम को इफ़्तार करने के लिए बैठे तो अपने को जांचे कि वह अपने रोज़े की कितनी हिफ़ाज़त कर सका है, अपने रोज़े की हिफ़ाज़त और अल्लाह से किए हुए वादे को ताज़ा रखने के लिए क़ुरआन की तिलावत करे और उसकी आयतों पर ग़ौर करे।


मुत्तलिब मिर्ज़ा

राजस्थान

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