“जातिवाद“ जड़ से नहीं मिटा तो भुगतने होंगे गंभीर परिणाम
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संपादकीय

“जातिवाद“ जड़ से नहीं मिटा तो भुगतने होंगे गंभीर परिणाम


हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में रहते हैं जिसका गौरवशाली संविधान समूचे विश्व में महत्व रखता है। हमारे संविधान में समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व की बात की गई है और देश के किसी भी नागरिक को उसके अधिकार से वंचित नहीं रखा गया है। लेकिन दुर्भाग्यवश यह सभी बातें आज़ादी के इतने दशक बीत जाने के बावजूद केवल संविधान तक ही सीमित हैं। समाज में उसका असर देखना लगभग असंभव प्रतीत होता है।

संवैधानिक रुप से समानता का अधिकार मिलने के बावजूद देश में जातिवाद का दीमक धीरे धीरे समाज के लिए नासूर बनता चला जा रहा है। हमारी कॉलोनी, मोहल्ले और शहरों में बिल्डिंग्स का जातियों के आधार पर विभाजन हमारे मानव समाज में एक लकीर खिंचता है जो हमें ऊंचे और नीचे लोगों में बांट देता है। यही कारण है कि समाज में ब्राह्मण को बहुत ऊंचा और दलितों को आज भी नीचा माना जाता है। 

भले ही सामने से ना दिखे लेकिन सीवी, शादी के विज्ञापनों ,ऑफिस में प्रमोशन, यूनिवर्सिटीज़ में बेंचो पर, कल्चर फिट, कॉरपोरेट हायरिंग, हाउसिंग सोसायटी आदि में जातिवादी रुपी भेदभाव साफ झलकता है। जातिवाद सिर्फ दलितों की ही समस्या नहीं यह भारत के नैतिक भविष्य कि परीक्षा है।

भारतीय संविधान जातिवाद के विरुद्ध एक नैतिक और राजनीतिक बचाव है लेकिन इसका स्वरूप समाज में पूरी तरह नहीं हुआ है। यही वजह है कि तथाकथित सभ्य और उच्च जाति के लोगों द्वारा निम्न वर्गों पर बरसों से अत्याचार चला आ रहा है। 

1977 में बिहार का बेलछी नरसंहार, 2006 में महाराष्ट्र के खैरलांजी में एक ही परिवार के दलित लोगों की निर्मम हत्या कर दी गई, 2011 में हरियाणा के मिर्चपुर जिले में निम्न जाति के घरों को आग लगा दी गई और हत्याएं की गई, 2020 का हाथरस मामला और इसी तरह  नजाने कितनी हिंसा हमारे समाज में होती रहती है जिसका हमें ज्ञान तक नहीं होता।

यही भेदभाव के मामले स्कूलों में बच्चों के साथ पेश आते है कोलकाता के एक स्कूल में 5 वर्षीय बच्ची को जाति के आधार पर एडमिशन देने से मना कर दिया गया और बच्चों के साथ शिक्षकों के रवैए के मामले हमारे सामने आते रहते है। 

हम सबको मिलकर इस जातिवादी रुपी दीमक को समाज से समाप्त करने का प्रयत्न करना होगा क्योंकि जब तक इन के जड़ों से मिटाया नहीं जाएगा तो यह अदृश्य बनकर प्रभावी तरीके से और मजबूत होता जाएग। सामाजिक जीवन जहां असल लड़ाई है वहीं से इसकी शुरुआत होगी और धीरे धीरे हम अंत तक पहुंच सकते है। 

सबसे पहले तो किसी भी समुदाय के लोग हो उन्हें अंतरजातीय विवाह को सामाजिक समर्थन देना होगा,  कार्यस्थल , स्कूल , सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यकर्मों में सभी वर्गों की समान भागीदारी को बढ़ावा देना, परिवारों के मध्य हमें सीखना होगा कि कोई उच्च और निम्न नहीं है बल्कि सब इंसान है जो ईश्वर की बनाई हुई बेहतरीन संरचना है जिसमें कोई भेदभाव ईश्वर की तरफ से नहीं किया गया और एक सभ्य समाज और तथाकथित बुद्धिजीवियो को ये शोभा नहीं देता कि वो अपने ही जैसे इंसान को अपने निम्न सिर्फ इसलिए समझे कि उसकी जाति दूसरी है। 

जब परिवारों, समाज और कार्यस्थलों पर ये भेदभाव खत्म होगा तब हम इसकी जड़ों को कमज़ोर कर सकते है। जो इंसान एक बेहतरीन समाज चाहता है, एक बेहतरीन देश चाहता है वहां रहने वाले इंसानों में अगर भेदभाव ख़त्म ना हो तो कोई समाज या देश कभी आगे नहीं बढ़ सकता है।


खान शाहीन जाटू

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