पोस्टपार्टम डिप्रेशन : कारण और सुझाव
माँ बनना एक महिला के जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव होता है। कहा जाता है कि जब बच्चे का जन्म होता है, तब जन्म देने वाली महिला का भी एक प्रकार से दूसरा जन्म होता है। बच्चे के आगमन से परिवार में उत्सव जैसा वातावरण बन जाता है। प्रसव या डिलीवरी के बाद महिला अत्यधिक पीड़ा में होती है, परंतु जैसे ही वह बच्चे को अपनी गोद में लेती है, वह सारी पीड़ा भूल जाती है।
लेकिन समाज में यह भी देखने को मिलता है कि कुछ महिलाएँ प्रसव के बाद बच्चे को गोद में लेने या उसे दूध पिलाने से मना कर देती हैं। ऐसी महिलाओं को समाज अक्सर बुरा-भला कहता है, जबकि इसमें उस महिला की कोई गलती नहीं होती। कई बार महिलाएँ प्रसव के बाद मानसिक और भावनात्मक रूप से अत्यंत चुनौतीपूर्ण स्थिति का सामना करती हैं। इस स्थिति को पोस्टपार्टम डिप्रेशन या प्रसवोत्तर अवसाद कहा जाता है।
आइए समझते हैं कि पोस्टपार्टम डिप्रेशन क्या होता है। पोस्टपार्टम डिप्रेशन एक प्रकार का मानसिक स्वास्थ्य विकार है, जो बच्चे के जन्म के बाद महिला में विकसित हो सकता है। यह सामान्य बेबी ब्लूज़ से अलग और अधिक गंभीर होता है। बेबी ब्लूज़ में महिलाओं को कुछ दिनों तक हल्की उदासी या मूड स्विंग्स होते हैं, जबकि पोस्टपार्टम डिप्रेशन लंबे समय तक बना रह सकता है और महिला की दैनिक कार्यक्षमता को प्रभावित करता है। पोस्टपार्टम डिप्रेशन न केवल महिला के जीवन को प्रभावित करता है, बल्कि उसके बच्चे, परिवार और गृहस्थी पर भी गहरा प्रभाव डालता है। पोस्टपार्टम डिप्रेशन के लक्षण विभिन्न प्रकार के हो सकते हैं।
प्रसवोत्तर अवसाद के लक्षण
प्रसवोत्तर अवसाद (postpartum depression) के लक्षण अलग-अलग महिलाओं में भिन्न हो सकते हैं, लेकिन सामान्यतः निम्नलिखित लक्षण देखे जाते हैं—
लगातार उदासी या खालीपन महसूस होना
बिना कारण रोना
अत्यधिक थकान और ऊर्जा की कमी
नींद न आना या बहुत अधिक सोना
भूख में कमी या अत्यधिक भोजन करना
बच्चे से भावनात्मक जुड़ाव महसूस न होना
स्वयं को अयोग्य माँ मानना
अपराधबोध या शर्म की भावना
चिड़चिड़ापन और क्रोध
ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई
भविष्य के प्रति निराशा
कभी-कभी आत्महत्या या स्वयं को नुकसान पहुँचाने के विचार
यदि ये लक्षण दो सप्ताह से अधिक समय तक बने रहें, तो इन्हें हल्के में नहीं लेना चाहिए।
प्रसवोत्तर अवसाद के कारण
प्रसवोत्तर अवसाद के पीछे केवल एक ही कारण नहीं होता, बल्कि यह कई कारकों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम होता है—
जैविक कारण:
प्रसव के बाद एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन का स्तर अचानक गिर जाता है, जिससे मस्तिष्क के रसायन (न्यूरोट्रांसमीटर) प्रभावित होते हैं और अवसाद की संभावना बढ़ जाती है।
मनोवैज्ञानिक कारण:
माँ बनने की नई जिम्मेदारी, बच्चे की देखभाल, स्वयं के लिए समय न मिलना और “परफेक्ट माँ” बनने का सामाजिक दबाव मानसिक तनाव को बढ़ाता है।
सामाजिक कारण:
जिन महिलाओं को अपने जीवनसाथी, परिवार या मित्रों से भावनात्मक या व्यावहारिक सहयोग नहीं मिलता, उनमें प्रसवोत्तर अवसाद विकसित होने का जोखिम अधिक होता है।
उपचार और प्रबंधन
अच्छी बात यह है कि प्रसवोत्तर अवसाद का उपचार संभव है। समय पर सहायता मिलने से महिला पूरी तरह स्वस्थ हो सकती है।
काउंसलिंग (Counseling):
काउंसलिंग या थेरेपी, जैसे कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी (CBT), महिला को अपने विचारों और भावनाओं को समझने तथा उनसे निपटने में सहायता करती है।
पारिवारिक सहयोग:
पति और परिवार का भावनात्मक सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। महिला को सुना जाना और समझा जाना बेहद आवश्यक है। साथ ही, अन्य माताओं से बातचीत करना, जो समान अनुभव से गुजर रही हों, महिला के अकेलेपन की भावना को कम करता है।
दवाइयाँ:
कुछ मामलों में चिकित्सक एंटीडिप्रेसेंट दवाएँ भी सुझा सकते हैं।
आत्म-देखभाल (Self-care):
पर्याप्त आराम और नींद
संतुलित और पौष्टिक आहार
हल्की शारीरिक गतिविधि
माइंडफुलनेस, ध्यान या विश्राम अभ्यास
बिना अपराधबोध के सहायता लेना
हमारे समाज में आज भी मानसिक स्वास्थ्य, विशेष रूप से माताओं की मानसिक स्थिति पर खुलकर चर्चा नहीं होती। माँ से यह अपेक्षा की जाती है कि वह हर परिस्थिति में खुश, त्यागी और सहनशील बनी रहे। जब कोई महिला प्रसव के बाद अपनी मानसिक पीड़ा व्यक्त करती है, तो उसे अक्सर सामान्य कहकर टाल दिया जाता है, जिससे उसकी समस्या और गंभीर हो जाती है। ऐसे सामाजिक रवैये के कारण प्रसवोत्तर अवसाद जैसी वास्तविक समस्याओं को पहचान नहीं मिल पाती।
प्रसवोत्तर अवसाद कोई कमजोरी, असफलता या पाप नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर और उपचार योग्य मानसिक स्वास्थ्य समस्या है। इसका प्रभाव न केवल माँ पर, बल्कि बच्चे, परिवार और पूरे घर के वातावरण पर भी पड़ता है। एक स्वस्थ माँ ही स्वस्थ परिवार की नींव होती है। इसलिए मातृत्व को केवल खुशी का उत्सव मानने के बजाय एक संवेदनशील और सहयोग की आवश्यकता वाले चरण के रूप में समझना आवश्यक है। यदि कोई महिला प्रसव के बाद मानसिक परेशानी से जूझ रही है, तो उसे चुप रहने के बजाय समय पर सहायता लेनी चाहिए, क्योंकि सही सहयोग पूरे परिवार को सशक्त बना सकता है।
लेखक के बारे में
डॉ. जॉली ख़ान एक होम्योपैथिक डॉक्टर और मानसिक स्वास्थ्य काउंसलर हैं, जो बड़ौदा (वडोदरा) में स्थित हैं। वह शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के लिए ऑनलाइन परामर्श प्रदान करती हैं। उनका उद्देश्य सरल और प्रभावी उपचार के माध्यम से लोगों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाना है।
अधिक जानकारी के लिए: [email protected]
डॉ. जॉली ख़ान
काउंसलर, वडोदरा, गुजरात