आपकी ज़िम्मेदारी क्या है?
आज का समय इम्तिहानो और फितनो का समय है, हर तरफ नई-नई उलझने, बर्बादी के रास्ते और गुमराही के साधन फैल रहे हैं। टीवी, मोबाइल, सोशल मीडिया, बुरी संगत यह सब वह दरवाज़े हैं जिनसे शैतान इंसान के दिल में दाख़िल होता है ।इसलिए समझदारी और दूर अंदेशी यही है कि पहले ही इन फितनो को पहचान कर उनसे बचने की कोशिश की जाए वरना जब इंसान पूरी तरह उलझ जाता है तो निकलना मुश्किल और कभी-कभी नामुमकिन हो जाता है।
इन फितनों में से एक बड़ा फितना बच्चों का बिगड़ जाना भी है। जा़हिर है कि इसकी असल वजह माता-पिता की और खासकर माँ की लापरवाही है। एक माँ पर ज़रूरी है कि वह अपने बच्चों की सही परवरिश करे, उन्हें अच्छे व्यवहार और आ़दतों से संवारें और हर तरह की बुराई से बचाने का प्रयास करे।
अब सवाल यह है कि यहां पर मां को ही ज़्यादा क्यों समझाया जा रहा है? आइये समझते हैः-
कु़रआन की रोशनी में
अल्लाह तआला फ़रमाता है:-
"ऐ ईमान वालों! अपने आप को और अपने घरवालों को आग से बचाओ, जिसका ईंधन इंसान और पत्थर है।" (सूरह तहरीम: 6)
यह आयत हमें बताती है कि बच्चों की ईमानी और अख़लाक़ी परवरिश फर्ज़ है। माँ-बाप का काम रोटी, कपड़ा, मकान के साथ साथ अच्छी तालीम व तर्बियत, ह़लाल व ह़राम चीज़ों की पहचान और सबसे बढ़कर अल्लाह की मोहब्बत उनके दिलों में डालना है।
मेरा मानना है कि अगर आप बच्चे को अल्लाह की पहचान करा दें, अल्लाह से मोहब्बत करना सिखा दें, और बच्चे के दिल में इस बात को नक्श कर दें कि अल्लाह हमको हर जगह देख रहा है, अगर हमने गुनाह किया या अल्लाह की नाराज़गी वाले काम किये तो अल्लाह हमसे नाराज़ हो जाएगा। जब अल्लाह हमसे नाराज़ हो जाएगा तो हमारे पास क्या बचेगा? क्योंकि हमारे पास अल्लाह की रजा़ के अलावा कुछ नहीं है। तो यकी़न जानें इंशा अल्लाह हमारा बच्चा खुद से ही हमेशा सही रास्ता अपनाएगा।
हदीस की रोशनी में ज़िम्मेदारी
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:-
"तुम में से हर एक ज़िम्मेदार है और हर एक से उसकी ज़िम्मेदारी के बारे में पूछा जाएगा।" (बुख़ारी, मुस्लिम)
"औरत अपने शौहर के घर की जिम्मेदार है और उससे उसके घर के बारे में पूछा जाएगा।" (बुख़ारी)
यानी बच्चों की निगरानी, उनका माहौल, उनकी दोस्ती यारी, उनकी सोच यह सब औरत की अहम ज़िम्मेदारियों में शामिल हैं। क्योंकि मर्द तो आपके लिए कमाने की ज़िम्मेदारी को अंजाम देने के लिए सुबह से शाम घर से बाहर होता है, वह घर के अंदर के मुआ़मलात और बच्चों पर वो बारीक नज़र नहीं रख सकता जो आप रख सकती हैं।
अफसोस की बात है कि औरतें आज इस ज़िम्मेदारी को बहुत हल्के में ले रही हैं और कुछ तो ज़िम्मेदारी समझ ही नहीं रही हैं। जबकि असली ज़िम्मेदारी यही है कि वह अपने शौहर के घर की और उनके बच्चों की हिफाज़त करें।
औरतों को पता होना चाहिए कि उनका सबसे बड़ा माल उनके अपने बच्चे हैं। अगर वह उनकी सही तालीम और तर्बियत करेंगी, तो वही बच्चे समाज के लिए मिसाल बनेंगे। और अगर उनकी तर्बियत से लापरवाही करेंगी, तो पूरी मेहनत पर पानी फेरने के लिए खुद उनके ही बच्चे काफी होंगे, दुनिया में भी और आखि़रत में भी।
मेरी नजर में मर्द दुनिया की सबसे मज़लूम हस्ती है क्योंकि वह बेचारा अपने जिंदगी के सबसे बहुमूल्य धन यानी अपने बच्चों को अपनी बीवी के हवाले छोड़कर काम पर निकल जाता है रात को थक-हार कर घर लौटता है, और सो जाता है, सुबह से फिर वही ज़िम्मेदारी ... उसकी सारी उम्मीदें अपनी बीवी से वाबस्ता होती है कि वह उसके बच्चों को देख रही है वह बेफिक्र हो जाता है। वह सिर्फ जिंदगी भर कमाता रहता है।
अब ऐसे में औरतों से मेरा सवाल है कि क्या हमें यह बात अंदर से शर्म नहीं दिलाती कि हम उस शख्स के बच्चों को जो हम पर इतना भरोसा करता है अच्छी तालीम व तरबियत भी ना दे सकें? हम कैसे अपने बच्चों को घंटो मोबाइल देखने के लिए दे सकते हैं जबकि हम जानते हैं कि मोबाइल खुद ग़लत तरबियत करने के लिए काफी है।
औरत की असल ज़िम्मेदारी बच्चों की परवरिश
कैसे ????
माँ की गोद — बच्चे का पहला मदरसा
माँ बच्चे के दिल में पहला नक़्श बनाती है। जिस घर में दीन, अख़लाक़ और अदब की हवा चलती है, वहां बच्चे भी वैसी ही खुशबू लेकर पनपते हैं। अगर माँ नमाज़ की पाबंद हो, कुरआन की तिलावत करती हो, हया और शराफ़त से जीवन गुज़ारे, तो यह असर सीधे बच्चों पर पड़ता है। लेकिन अगर माँ की तवज्ज़ो घर के बजाय बाहरी मशगूलियत, मोबाइल और दुनियावी कामों में ज्यादा हो, तो बच्चों को बिगड़ने से कोई नहीं रोक सकता।
बच्चों की परविश — सिर्फ पढ़ाना नहीं, बनाना भी है।
बच्चों को सिर्फ़ स्कूल में दाख़िल करा कर छोड़ देना तर्बियत नहीं कहलाती असल तर्बियत यह है कि:
*सबसे पहले तौहीद और ईमान का सही सबक़ दिया जाए।
*उन्हें नमाज़ की आदत सिखाई जाए।
*झूठ, धोखा गी़बत और गै़र अख्लाक़ी आदतों से रोका जाए।
अदब, शरमो- हया उनके स्वभाव में उतारी जाए।
उनकी संगत, मोबाइल और इंटरनेट पर ध्यान रखा जाए (यह इस दौर में बहुत महत्वपूर्ण है कि हम अपने बच्चों के इंटरनेट के इस्तेमाल पर सख्त नज़र रखें)
आज का मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म बच्चे के दिल पर सबसे तेज़ असर करते हैं। इसलिए माँ का सतर्क रहना ज़रूरी है। थोड़ा सा ध्यान और प्यार से दी गई तर्बियत बच्चे को बर्बादी से बचा सकती है।
औरत घर की बुनियाद है
माँ चाहे तो घर को जन्नत बना दे, और बच्चों की अच्छी तालीम व तर्बियत पर ध्यान न दे कर घर को जहन्नम बना दे ।।।
इसलिए प्यारी बहनों! सबसे कामयाब औरत वही है जिसने अपने बच्चों को इस दौर में बर्बाद होने से बचा लिया और आपके शौहर ने जो भरोसा आप पर किया उसकी आपने लाज रखी।।
उम्मे आ़यशा
मध्य प्रदेश