पन्नों में बसे अनुभूति के अनगिनत संसार
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चर्चा

पन्नों में बसे अनुभूति के अनगिनत संसार

टाइम मशीन के बारे में तो आपने अवश्य ही सुना होगा — एक ऐसा काल्पनिक यंत्र जो हमें समय की सीमाओं को लाँघने की शक्ति देता है। कल्पना कीजिए कि यह अद्भुत यंत्र आपके हाथों में है। आप उसका डायल घुमाते-घुमाते 1526 पर पहुँचते हैं और अचानक कुछ सोच कर ठहर जाते हैं। आपके चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान खिल उठती है। आप यंत्र पर कुछ निर्देश दर्ज करते हैं फिर एक बड़ा-सा लाल बटन दबा देते हैं। क्षण भर में आसपास की दुनिया बदल जाती है। सब कुछ स्थिर होने पर आप स्वयं को पानीपत के ऐतिहासिक मैदान में उपस्थित पाते हैं जहाँ बाबर और इब्राहीम लोधी के बीच एक भीषण और निर्णायक युद्ध शुरू होने वाला है। 

इसके बाद आप डायल को 1776 और फिर 1789 पर ले जाते हैं और क्रमशः अमेरिकी और फ्रांसीसी क्रांतियों के युग का अनुभव करते हैं। फिर डायल को विभिन्न कालखंडों पर ले जाते हुए कभी उस्मानी सल्तनत के भव्य दरबारों की महिमा से आंखें ठंडी करते हैं तो कभी बग़दाद और क़ुर्तबा के ज्ञान-वैभव और सांस्कृतिक उत्कर्ष के साक्षी बनते हैं। कभी चीन की दीवार तो कभी आगरा के ताजमहल को ईंट-ईंट जुड़ते हुए देखते हैं।‌ कभी जामा मस्जिद, दिल्ली में मौलाना आज़ाद की ओजस्वी ललकार तो कभी वाशिंगटन डीसी में मार्टिन लूथर किंग जूनियर को समानता और मानव गरिमा का स्वप्न-संसार गढ़ते हुए सुनते हैं।  

अब यदि कुछ क्षणों के लिए—बस कुछ क्षणों के लिए—आप मुझे मूर्ख न समझने का वचन दें तो मैं ज़रा साहस जुटा कर कहूँ कि यह असंभव-सी प्रतीत होती समय-यात्रा वास्तव में संभव है। अंतर केवल इतना है कि इसके लिए हमें किसी रहस्यमय या चमत्कारी यंत्र की नहीं, बल्कि एक अत्यंत साधारण-सी वस्तु की आवश्यकता है। जी हाँ—मैं पुस्तकों की ही बात कर रहा हूँ!

पुस्तकें वह सशक्त माध्यम हैं जो हमें समय और स्थान की सीमाओं से मुक्त कर देती हैं। एक पुस्तक खोलते ही हम सुल्तान मोहम्मद फ़ातेह और नेपोलियन के साथ उनकी युद्धनीतियों पर विचार-विमर्श कर सकते हैं। सिकंदर और तारिक़ बिन ज़ियाद की विजयगाथाओं से प्रेरणा ले सकते हैं। अशोक, ऑगस्टस और अकबर के दरबार में उपस्थित हो सकते हैं। राजनीति पर लिंकन, चर्चिल, गांधी और जिन्ना से प्रश्न पूछ सकते हैं। अरस्तू, ग़ज़ाली और डेकार्टे के साथ दर्शन पर संवाद कर सकते हैं। आर्यभट, अलख़्वारिज़्मी और फ़िबोनाची के साथ गणित के रहस्यों पर मंथन कर सकते हैं। कालिदास, शेक्सपियर और ग़ालिब के साथ साहित्य की गहराइयों में उतर सकते हैं। 

यह सब—और इससे कहीं अधिक—केवल पुस्तकों के माध्यम से ही संभव है।

जब हम क़ुरआन खोलते हैं, तो वह आदम और इब्लीस से लेकर मूसा और फ़िरऔन के प्रतिद्वंद्व तक न जाने कितनी सदियों की यात्रा करा देता है। हज़रत मुहम्मद के जीवन पर हुआ व्यापक शोध पाठक को मक्का, मदीना और ताइफ़ की गलियों में ले जाता है। सीरत को ध्यानपूर्वक पढ़ने वाला बद्र और मक्का की विजय की उल्लासपूर्ण घड़ियों को महसूस करता है और खंदक़ व तबूक की कठिन परीक्षाओं की पीड़ा को भी। इसी प्रकार इतिहास की पुस्तकें केवल राजाओं की जन्म-तिथियाँ और मृत्यु-वर्ष ही नहीं बतातीं। यदि उन्हें गंभीरता से पढ़ा जाए, तो वे साम्राज्यों के उत्थान और पतन की कहानियाँ सुनाती हैं। वे हमें किसी युग की शक्तियों, कमज़ोरियों और उसके विकास तथा पतन के कारणों से परिचित कराती हैं। 

निश्चित रूप से हम इन भिन्न भिन्न युगों में जन्म तो नहीं ले सकते क्योंकि मनुष्य की इच्छाएँ भले ही अनगिनत हों परन्तु उसे इस संसार में जीवन केवल एक ही मिला है। लेकिन पुस्तकें हमें एक ही जीवन में भिन्न भिन्न युगों के अनेक जीवन जीने का अवसर प्रदान करती हैं। जब कोई गांधी की “सत्य के प्रयोग”, मंडेला की “लॉन्ग वॉक टू फ़्रीडम”, या मैल्कम एक्स की आत्मकथा पढ़ता है, तो वह उन महान व्यक्तित्वों के समय और मन में प्रवेश कर जाता है। उनके संघर्ष, संकल्प और सफलताएँ पाठक की अपनी चेतना का हिस्सा बन जाती हैं। उनके भय, संशय और असफलताएँ भी बहुत कुछ सिखा जाती हैं। 

मेरा यह आशय नहीं है कि जो किताबों का मित्र न हो, वह ज़रूर ही अक़्ल का दुश्मन होगा। हाँ, मैं इतना अवश्य कहूँगा कि ऐसा व्यक्ति जाने-अनजाने में मानव प्रगति के बुनियादी सिद्धांतों की उपेक्षा कर रहा होता है। मनुष्य इसलिए आगे बढ़ पाया क्योंकि उसने अपने पूर्वजों के अनुभवों को सँजोया और उन पर आगे निर्माण किया। पुस्तक इन अनुभवों का एक ठोस स्वरूप ही तो है। 

इसलिए जो व्यक्ति नहीं पढ़ता, वह बार-बार उन ग़लतियों को दोहराता है जो पहले ही लाखों बार गठित हो चुकी हैं और इस प्रकार पहिया फिर से बनाने में अपना सम्पूर्ण जीवन गँवा देता है। इसके विपरीत, जो पढ़ता है, वह दूसरों के अनुभवों से लाभ उठाता है और आगे बढ़ता चला जाता है। ग़लतियाँ उससे भी होती हैं मगर सामान्यतः घिसी-पिटी नहीं बल्कि नई होती हैं, ये नई ग़लतियाँ नए आविष्कार और नई प्रगति का मार्ग प्रशस्त करती हैं।

पुस्तकें सोच में गहराई लाती हैं। उदाहरण के लिए देखिए कि अधिकांश मुसलमानों के पास इस्लाम की एक परंपरागत समझ होती है। लेकिन जब कोई सैयद मौदूदी की “दीनियात” और “ख़ुत्बात” या सदरुद्दीन इस्लाही की “इस्लाम: एक नज़र में” जैसी पुस्तकें पढ़ता है, तो उसका दृष्टिकोण व्यापक हो जाता है और उसे अतुलनीय वैचारिक स्पष्टता प्राप्त होती। इसी प्रकार इस्लामी इतिहास की एक मिथकीय जानकारी बहुतों के पास है, लेकिन जिन्होंने शिबली नोमानी या डॉ. मोहम्मद हमीदुल्लाह को पढ़ा है, उनके लिए इस्लामी इतिहास एक स्पष्ट, आलोचनात्मक और बौद्धिक अनुशासन के रूप में सामने आता है।

यह बात केवल धार्मिक अध्ययन तक सीमित नहीं है। जो पढ़ता है, वह केवल जानकारी नहीं जुटाता—वह गहराइयों में उतरता है। सतही निष्कर्षों से आगे बढ़कर वह विचारों की जड़ों तक पहुँचता है। पुस्तकों के माध्यम से वह उन बारीकियों और सूक्ष्मताओं को समझ पाता है, जिन तक न पढ़ने वाला व्यक्ति केवल अनुमान या सुनी-सुनाई बातों के आधार पर कभी नहीं पहुँच सकता। यही कारण है कि समाज, धर्म, विज्ञान या दर्शन—हर क्षेत्र में गंभीर समझ उन्हीं को प्राप्त होती है जो पढ़ने का परिश्रम करते हैं।

विज्ञान में रुचि रखने वाला जब महान वैज्ञानिकों को पढ़ता है तो अपना वैज्ञानिक दृष्टिकोण और विकसित करता है। अफ़लातून, इब्न रुश्द‌ और कांट का अध्ययन करने वाला अपने प्रश्नों को अधिक स्पष्ट रूप से समझ पाता है। जो डिकेन्स, ह्यूगो और प्रेमचंद को पढ़ता है, वह समाज की आत्मा को ज़्यादा संवेदनशीलता से पहचानता है। यह सब उस गहराई और वैचारिक परिपक्वता को उत्पन्न करता है, जो बिना पढ़े संभव नहीं है।

संक्षेप में कहें तो पुस्तकों से मित्रता करने वाला व्यक्ति अपने घर में बैठकर ही समस्त संसार की सैर कर लेता है। वह समय में पीछे जाकर इतिहास के निर्णायक क्षणों का साक्षी बनता है और आगे बढ़कर भविष्य की संभावनाओं पर विचार करता है। वह एक ही जीवन में अनेक जीवन जीता है—कभी दार्शनिक बनकर, कभी वैज्ञानिक, कभी सुधारक, कभी क्रांतिकारी। वह मानव इतिहास के सबसे प्रखर मस्तिष्कों से संवाद करता है और उनके अनुभवों को अपनी चेतना का हिस्सा बना लेता है। इसके विपरीत, जो नहीं पढ़ता, उसके लिए यह दुनिया सीमित और संकुचित रह जाती है।

इसलिए पुस्तकों को बोझ न समझिए, उन्हें अपना सहचर बनाइए। वे आपको केवल ज्ञानी ही नहीं, बल्कि संवेदनशील, विचारशील और बहुआयामी मनुष्य बनाती हैं। अब प्रश्न यह है—क्या आप वास्तव में जीवन को उसकी पूरी गहराई के साथ जीना चाहते हैं, असंख्य जीवनों का अनुभव करना चाहते हैं, अनगिनत संसारों की यात्रा करना चाहते हैं, या फिर बिना पढ़े अपने सीमित परिवेश तक सिमटकर मात्र जीवित रहना चाहते हैं? 


डॉ. ख़ान यासिर 

स्वतंत्र लेखक, नई दिल्ली

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