यदि नीतीश के अंदर सच में नीति होती तो वे ऐसा न करते…
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राष्ट्रीय परिदृश्य

यदि नीतीश के अंदर सच में नीति होती तो वे ऐसा न करते…

 पिछले सप्ताह पटना में आयुष (AYUSH) डॉक्टरों को नियुक्ति पत्र देते समय एक मुस्लिम महिला के नक़ाब को उतारने का प्रयास करते हुए नीतीश कुमार का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। इसके बाद देश में एक गहरी राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज़ हो गई है। उनका यह कृत्य स्पष्ट रूप से महिला की इज़्ज़त और धार्मिक भावनाओं का अपमान है। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती। इसी कारण एक ओर कुछ राजनीतिक नेता और सामाजिक कार्यकर्ता इस घटना को गंभीर कानूनी मुद्दा बना रहे हैं, तो दूसरी ओर यह मामला सोशल मीडिया तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गया है। 

सत्तापक्ष के कुछ लोग नीतीश का बचाव करते दिखाई दे रहे हैं, जो अत्यंत शर्मनाक है। मुस्लिम महिलाओं के प्रति इस तरह के भेदभाव से भारत की छवि भी पूरे विश्व मे धूमिल हुई है। ‘मिडिल ईस्ट इवेंट्स’ नामक मीडिया कंपनी ने यह वीडियो साझा कर नीतीश कुमार के इस कृत्य पर सवाल उठाए हैं। हमारे देश के खाड़ी देशों के साथ अच्छे संबंध हैं; ऐसी घटनाएँ उनमें बाधा उत्पन्न कर सकती हैं, जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव हमारी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। यदि नीतीश में ज़रा भी नीति शेष हो, तो उनकी नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है कि वे इस घटना पर सार्वजनिक रूप से माफ़ी माँगें और नैतिकता का उदाहरण प्रस्तुत करें।

एक मुस्लिम के रूप में नहीं, बल्कि एक भारतीय नागरिक और निष्पक्ष व्यक्ति के रूप में देखें, तो भी इस घटना को किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता। यह एक दुर्लभ प्रकार का ‘शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न’ है, और इतने अनुभवी, वरिष्ठ राजनेता तथा उच्च संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति से ऐसी अपेक्षा नहीं की जा सकती। 

यह घटना “सुशासन बाबू” की कु-मानसिकता को उजागर करती है। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि वे भीतर से खोखले, मानसिक रूप से विकृत और अहंकारी व्यक्ति हैं। देश में बुर्क़ा या नक़ाब पहनने वाली महिलाओं के उत्पीड़न की घटनाएँ बढ़ रही हैं; ऐसे में धार्मिक, संवैधानिक और सामाजिक दृष्टि से गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

हम जानते हैं कि विभिन्न धर्मों और समुदायों में पर्दा प्रथा या लज्जा प्रथा पाई जाती है। एक बहुधार्मिक देश होने के नाते इस विविधता को स्वीकार करना और उसकी सुरक्षा करना प्रत्येक धार्मिक व्यक्ति की नैतिक ज़िम्मेदारी है। पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव के कारण हमारे देश में अश्लीलता और निर्लज्जता बढ़ रही है; प्रगति और विकास का संबंध पहनावे से नहीं, बल्कि बुद्धि से है। 

इस्लाम ने स्त्री को सामाजिक ज़िम्मेदारियाँ निभाने की अनुमति दी है, लेकिन नैतिक समस्याओं और सुरक्षा के कारण पर्दे की शिक्षा दी है। नक़ाब या बुर्क़ा न केवल महिला में आत्मविश्वास उत्पन्न करता है, बल्कि उसके लिए सुरक्षा-कवच का भी काम करता है। यह बात समझ लेनी चाहिए कि मुस्लिम महिला पर्दा किसी सामाजिक दबाव के कारण नहीं, बल्कि अल्लाह की इबादत समझकर करती है, जिसका स्पष्ट आदेश क़ुरआन और हदीसों में दिया गया है। 

“ऐ नबी! अपनी पत्नियों, अपनी बेटियों और ईमान वाली स्त्रियों से कह दो कि वे अपने ऊपर अपनी चादरें (जिलबाब) लटका लिया करें।“ (सूर:अल-अहज़ाब-59)

“ईमान वाले पुरुषों से कह दो कि वे अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी पवित्रता की रक्षा करें। ईमान वाली स्त्रियों से कह दो कि वे अपनी निगाहें नीची रखें, अपनी पवित्रता की रक्षा करें और अपनी शोभा (ज़ीनत) को प्रकट न करें सिवाय उसके जो स्वाभाविक रूप से दिखाई देता है” (सूरह :अन-नूर- 30,31)

“और जब तुम उनसे (नबी की पत्नियों से) कुछ माँगो तो पर्दे के पीछे से माँगो।“ (सूरह अल-अहज़ाब-53)

मुस्लिम सहित दूसरे धार्मिक लोगों को भी एक स्वर में ऐसी घटनाओं की निंदा करनी चाहिए। क्योंकि उनके धर्म मे भी स्त्री का अपमान असहनीय है। हिन्दुत्व का सूत्रोच्चार करने वाले जानते होंगे कि मनुस्मृति मे भी नारी के सन्मान की शिक्षा दी गई है। जैसे,

“जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवता निवास करते हैं। और जहाँ नारी का अपमान होता है, वहाँ किए गए सभी कर्म निष्फल हो जाते हैं। (मनुस्मृति, अध्याय 3, श्लोक 56)

हमारे संविधान में भी स्त्री गरिमा की सुरक्षा पर विशेष बल दिया गया है। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की बात करता है, जिसमें महिलाओं की गरिमा और अधिकारों को समान कानूनी संरक्षण देने का उल्लेख है। इसी प्रकार सार्वजनिक रूप से महिला को अपमानित करना, या धार्मिक वस्त्र के लिए दबाव डालना संविधान के विरुद्ध है और अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है। बल्कि अनुच्छेद 15(3) के अंतर्गत राज्य को महिलाओं की गरिमा की रक्षा के लिए विशेष कानून बनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया है।

संविधान का अनुच्छेद 19 व्यक्तिगत स्वतंत्रता का वर्णन करता है, जिसमें पहनावा, विचार और जीवनशैली शामिल हैं; इसके अंतर्गत एक महिला अपनी पसंद के अनुसार पहनावा पहन सकती है। अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार देता है। हम जानते हैं कि जीवन केवल श्वास-प्रश्वास की क्रिया का नाम नहीं, बल्कि स्वाभिमान के साथ जीने का नाम है। 

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि मानव गरिमा (Human Dignity) अनुच्छेद 21 का हिस्सा है। महिला को क्या पहनना है, कैसे जीना है इसकी उसे स्वतंत्रता है। यह अनुच्छेद अपनी पहचान और अपने शरीर पर स्वयं के अधिकार का उल्लेख करता है। कोई भी व्यक्ति या सरकार महिला की गरिमा को ठेस नहीं पहुँचा सकती। इसी प्रकार संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता देता है, जिसके अनुसार व्यक्ति किसी भी धर्म का पालन, प्रचार और प्रसार कर सकता है। 

नीतीश का यह कार्य बंधारण की कई धाराओ का उल्लंघन है। सामाजिक स्तर पर देखें तो प्रत्येक व्यक्ति में शर्म का एक नैतिक मूल्य होता है। यह नैतिकता भी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के मान-सम्मान की सुरक्षा की माँग करती है। प्रत्येक समुदाय का नैतिकता का अपना एक मानदंड होता है। कुछ लोगों को अंग-प्रदर्शन अनैतिक लगता है, तो कुछ ऐसे भी हैं जो नग्नता का समर्थन करते हैं। 

इस्लाम समाज की नैतिक पवित्रता बनाए रखने के लिए हिजाब का आदेश देता है। हिजाब का अपमान न केवल व्यक्तिगत और धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है, बल्कि एक महिला के रूप में उसकी इज़्ज़त, उसकी पसंद और उसकी स्वतंत्रता का अपमान तथा संविधान-विरोधी कृत्य है। सरकार और समाज को अपने-अपने स्तर पर महिला गरिमा की सुरक्षा के लिए कदम उठाने चाहिए। स्त्री सशक्तिकरण के दावेदारों को भी सार्वजनिक रूप से विरोध करना चाहिए।

शकील अहमद राजपूत

वरिष्ठ पत्रकार, गुजरात

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