भौतिकवाद के शिकंजे में महिलाएं
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कवर स्टोरी

भौतिकवाद के शिकंजे में महिलाएं

 जब समूचे विश्व में महिलाओं की काबिलियत का डंका बजते हुए दशकों दशक बीत गए हों, कोई ऐसा क्षेत्र नहीं बचा जहां महिलाओं ने अपनी प्रतिभा का लोहा ना मनवाया हो, ऐसे पोस्ट फेमिनिज़्म के दौर में जब हम अपने समाज पर नज़र दौड़ाते हैं तो महिलाओं की स्थिति बड़ी दयनीय नज़र आती है। ऐसा नहीं है कि हमारे यहां महिला सशक्तिकरण की आंधी ना आयी हो या महिलाएं प्रतिभाशाली ना हों, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। बल्कि हमारे देश का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं हैं जहां महिलाओं ने अपनी सफलता के झंडे ना गाड़े हों, लेकिन इसी पोस्ट फेमिनिज़्म के युग में हमारे समाज की महिलाएं भौतिकवाद के जाल में ऐसा फंसी की उससे छुटकारा मिलना लगभग असंभव प्रतीत होता है और उसपर विडंबना यह कि इस जकड़ को महिलाएं महसूस कर ही नहीं पाती हैं। विशेषरुप से भारत की मध्यमवर्गीय महिलाएं।

फलक़ के पति की अच्छी ख़ासी आमदनी है, कमरतोड़ महंगाई के खर्चों के बावजूद थोड़ी बहुत बचत करने में दोनों पति पत्नी सफलता हासिल कर लेते हैं। पिछले महीने दोनों के एक रिश्तेदार घर आए और हाल ही में खरीदे अपने महंगे सोफे का ज़िक्र उन दोनों के सामने कर दिया। फिर क्या था मेहमान के घर से जाते ही फलक़ ने ज़िद पकड़ ली कि अब उसे अपना सोफा भी बदलना है। (जो कि अभी छह महीने पहले ही खरीदा गया था और बिल्कुल अच्छी कंडीशन में था) ढेरों सोफे डिज़ाइन देखने के बाद फलक को जो सोफा पसंद आया वह उसके बजट से बाहर का था लेकिन उसने अपने पति को ईएमआई पर खरीदने के लिए मना ही लिया और इस प्रकार उसको अपने उन रिश्तेदार के सामने खुद को बड़ा साबित करने का मौका मिला लेकिन कर्ज़ का अतिरिक्त बोझ उनके सिर पर आ पड़ा।

विभा और उसका परिवार एक छोटे से घर में सुख शांति से रहता था। पति का अपना कारोबार था, बच्चे भी अच्छे स्कूलों में पढ़ रहे थे। फिर अचानक विभा ने अपनी सहेली का नया घर देख बड़ा सा घर खरीदने की ज़िद पकड़ ली। नया घर बजट से बाहर था लेकिन फिर भी होम लोन लेकर पहले घर खरीदा गया और घर को सजाने संवारने के लिए फिर लोन लेना पड़ा और इस तरह हर महीने ढेरों रुपये की ईएमआई देने का बोझ सिर पर आ पड़ा। नतीजा यह हुआ कि धीरे धीरे कर्ज़ बढ़ता गया, बिजनेस भी डाउन हो गया और विभा का हंसता खेलता परिवार अब दुखों के पहाड़ के नीचे दबता चला गया।

यह केवल उदाहरण मात्र है, इस प्रकार के ढेरों किस्से हमारे समाज में आसपास देखने को मिल जाते हैं। लगभग हर महिला (एक दो अपवाद को छोड़कर) आपको किसी ना किसी से प्रतिस्पर्धा करते हुए दिखाई देगी फिर चाहे वह महंगे कपड़े खरीदने की प्रतिस्पर्धा हो, कीमती ज़ेवर या घर का कोई और सामान। हद तो यह हो गई है कि बच्चों की शिक्षा भी स्टेट्स सिंबल का सवाल बन गई है। लोग महंगे से महंगे स्कूलों में अपने बच्चों को केवल इसलिए पढ़ाना चाहते हैं ताकि वे शान से लोगों को बता सकें कि हम हर महीने अपने बच्चे की इतनी फीस भरते हैं। 

इसका परिणाम यह हुआ कि इस भौतिकवादी प्रतिस्पर्धा ने हर घर का चैन व सुकून छीन लिया है, लोग सारी सुख सुविधाओं से लैस होने के बावजूद खुश नहीं है। हर कोई इसलिए कमाना और आगे बढ़ना चाहता है ताकि वह दूसरे को पीछे छोड़ सके। जिसके परिणामस्वरुप नफरत, अवसाद, चिंता, तनाव लोगों में बढ़ता जा रहा है। द हिंदू समाचार पत्र के मुताबिक भारत में लगभग 230 मिलियन लोग अवसाद और चिंता से ग्रसित हैं। द लासेंट जर्नल के मुताबिक वर्ष 2017 में 45.7 मिलियन लोग अवसाद का शिकार थे। जिसमें महिलाओं की संख्या पुरुषों के मुकाबले ज़्यादा थी।

जबकि महिलाओं में पहले के मुकाबले सामाजिक भेदभाव, कुरीतियां, मानसिक व शारीरिक उत्पीड़न यह सब काफी कम हो गया है। साक्षरता दर बढ़कर 70.3 प्रतिशत हो गई है। आर्थिक रुप से संपन्नता बढ़ गई है, लिविंग स्टैंडर्ड पहले के मुकाबले अच्छा हो गया है, सुख सुविधाएं भरपूर मात्रा में उपलब्ध हैं लेकिन इन सबके बावजूद तनाव, अवसाद और इस कारण ढेरों बीमारियों के चपेट में लोग आ रहे हैं जिसका मुख्य कारण यही ना समाप्त होने वाली प्रतिस्पर्धा है।

यदि थोड़ा पीछे जाकर पुराने समाज का अवलोकन करें तो पता चलेगा कि लोग सुख सुविधाओं से वंचित थे। महिलाओं को ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती थी, शिक्षा एवं जागरुकता की कमी थी, लिविंग स्टैंडर्ड नाममात्र की चीज़ समझी जाती थी लेकिन इसके बावजूद अवसाद और तनाव जैसी समस्याएं कोसों दूर थीं। नफरत का तो आपस में नामो निशान नहीं होता था, लोग एक दूसरे के साथ मिलजुल कर खुशहाल रहते थे। एक दूसरे के प्रति मदद की भावना रहती थी, ढेरों काम तो एक दूसरे की मदद से हो जाया करते थे।

लेकिन फिर भौतिकवाद और बाज़ारवाद ने हमारे समाज में कदम जमाना शुरु किया और धीरे धीरे हमारी खुशियों के बीच दिशाहीन प्रतिस्पर्धा ने जगह बना ली जिसके बाद आपसी रिश्तों का, प्रेम और सौहार्द का, अपनेपन का समापन होता चला गया। दुर्भाग्य से इसका सबसे ज़्यादा शिकार महिलाएं ही बनीं और विडंबना यह है कि आज भी हम इस बाज़ारवाद की चाल को समझ नहीं सके हैं बल्कि खुशी खुशी उसको सफल होने की राहें हमवार करते चले जा रहे हैं। आवश्यकता है इस भौतिकवादी जाल से बाहर निकलने की। अपनी प्रतिभाओं का सही इस्तेमाल करने की, हीन भावना से बाहर निकलकर आत्मविश्वास बहाल करने की। तभी हम खुश रह सकते हैं और एक मज़बूत व सभ्य समाज की नींव डाल सकते हैं।   


सहीफ़ा ख़ान

उप संपादक, आभा ई मैग्ज़ीन

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