‘फिज़ूलखर्ची करने वाला शैतान का भाई’
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दिव्य ज्योति

‘फिज़ूलखर्ची करने वाला शैतान का भाई’

आजकल चाहे शादी ब्याह हो, या कोई अन्य इवेंट आपको फिज़ूलखर्ची की भरमार दिखेगी। जो काम कम पैसों में आसानी से हो सकता है उसे मुश्किल बनाकर बेतहाशा पैसा खर्च करना लोग अपनी शान समझते हैं। जबकि इस्लाम हमें फिज़ूलखर्ची से रोकता है और बीच का रास्ता अपनाने को कहता है। यही इंसान की असल कामयाबी भी है। कुरआन में कहा गया हैः- 

​"बे शक़ फिज़ूल खर्ची करने वाले शैतान के भाई हैं।" (सूरह बनी इस्राइयल, आयत नंबर 27)  

इसी सूरह में आगे अल्लाह तआला इरशाद फरमाते हैः-

​"और ना तो अपना हाथ अपनी गर्दन से बंधा हुआ रखो और ना उसे बिल्कुल खुला छोड़ दो वरना मलामत ज़दा और आजिज़ होकर बैठे रहोगे।" (सूरह बनी इस्राइयल, आयत नंबर 29)

वर्तमान समय में हमारी जिंदगी से संतुलन नदारद हो गया है। हम किसी चीज़ में भी संतुलन नहीं रखते, कहीं तो हम बहुत ज़्यादा कंजूसी पर उतर आते हैं और कहीं इतना ज़्यादा फिजूलखर्ची कर देते हैं जिसका इस्लाम से दूर तक कोई संबंध ही नहीं होता। और इस तरह हम शैतान को अपना भाई बना लेते हैं और साथ ही अपनी ज़िंदगी से चैन व सुकून खत्म कर देते हैं। जबकि इस्लाम हमें इस तरह आनंद भरी ज़िंदगी जीने का मंत्र देता है।

यह इस्लाम और कुरआन की खूबसूरती है कि खाने-पीने से मना नहीं किया गया, बल्कि फिज़ूल खर्ची से मना किया गया है। जिसमें सीधे सीधे हमारी ही भलाई है लेकिन हम इस सच्चाई से अंजान बन बेतहाशा पैसा बहाने को अपनी शान समझते हैं। इसलिए हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि कहीं हम फिजूल खर्ची करते-करते इतने आगे ना निकल जाएँ कि दुश्मन (शैतान) दोस्त बनकर हमारे दिल में अहंकार पैदा कर दे और हम कहीं के ना रहें।

"प्यारे नबी (सल्ल.) ने फरमाया: कयामत के दिन बंदे के क़दम नहीं हिलेंगे जब तक उसके माल के बारे में ना पूछ लिया जाये कि कहाँ से कमाया और कहाँ खर्च किया।" (तिर्मिज़ी)

एक बार हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ि.) ने देखा कि एक व्यक्ति वुज़ू में ज़्यादा पानी खर्च कर रहा है। आपने फरमाया, "यह इसराफ (फिज़ूल खर्ची) क्यों?" उस व्यक्ति ने कहा, "क्या वुज़ू में भी इसराफ होता है?" आपने फरमाया, "हाँ, अगरचे तुम बहते दरिया के किनारे ही क्यों ना खड़े हों!"    

इस्लाम फिजूल खर्ची से रोक कर हमें शुक्रगुज़ारी, संतोष और संतुलित मार्ग पर चलने की शिक्षा देता है। जिससे हमारी ज़िंदगी में खुशियां आए, चैन व सुकून हासिल हो और हम अल्लाह के शुक्रगुज़ार बंदे बनें, लेकिन अफसोस है कि हम इस खुशियों भरे फार्मूले को दरकिनार कर अपने ही पैरों में कुल्हाड़ी मार अपनी ही ज़िंदगी बर्बाद कर रहे हैं। हमें चाहिए कि हम अपनी आमदनी और खर्च का आत्म-निरीक्षण करें और अल्लाह की नेमतों को उसकी मर्जी के मुताबिक़ इस्तेमाल करें। क्योंकि कामयाब वही है जो संतुलित मार्ग पर चले।    


फ़रहीन ख़ान

उत्तर प्रदेश

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