नव वर्ष : नई आशा
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संपादकीय

नव वर्ष : नई आशा

तेज़ी से गुजरते हुए समय ने दुनिया की क़ौमों को सन 2026 में दाख़िल कर दिया है। नया साल केवल कैलेंडर के बदलने का नाम नहीं, बल्कि आत्म-मूल्यांकन, बौद्धिक जागरूकता और भविष्य की दिशा तय करने का एक महत्वपूर्ण अवसर भी है। हर नया वर्ष अपने साथ नई संभावनाएँ, नई जिम्मेदारियाँ, नई आशाएँ और नए संकल्प लेकर आता है। बशर्ते कि हम अतीत से बोध ग्रहण करने वाले हों और इस बात पर गंभीरता से विचार करें कि जो समय बीत गया उसने हमें क्या दिया, और आने वाला समय हमसे किस तरह की अपेक्षाएँ रखता है। समय की यही पुकार है कि उम्मीद को केवल खुशफ़हमी नहीं, बल्कि चेतना, ज़िम्मेदारी और सामूहिक आत्म-परीक्षण से जोड़ा जाए।

आज हम जिस युग में साँस ले रहे हैं वह विज्ञान और टेक्नोलॉजी का दौर है। मानव भौतिक प्रगति के शिखर पर पहुँच चुका है। एआई मानव क्षमता की नई सीमाएँ रच रही है। निस्संदेह यह सब मानव बुद्धि की ऐतिहासिक उपलब्धियाँ हैं। संचार और सूचना टेक्नोलॉजी की असाधारण उन्नति ने पूरी दुनिया को एक ‘ग्लोबल विलेज’ में बदल दिया है। दुनिया के एक कोने में बैठा व्यक्ति पल भर में दूसरे कोने में मौजूद इंसान से संपर्क कर सकता है। जानकारी का एक विशाल सागर है, जो मानव की उँगली के एक इशारे का इंतज़ार कर रहा है।

लेकिन प्रगति के इस उजले परिदृश्य का एक अँधेरा पक्ष भी है कि इस बेकाबू विकास के बावजूद मानव समाज जटिल और अनेक समस्याओं में घिरा हुआ है। एक तरफ संसाधनों की प्रचुरता है, धन के ढेर लगे हुए हैं, ख़ज़ानों के भंडारों तक इंसान की पहुँच है दूसरी ओर करोड़ों लोग आज भी दो वक्त की रोटी को तरस रहे हैं। चारों ओर भूख, बेरोज़गारी, विस्थापन और असुरक्षा का वातावरण है। एक ओर आसमान छूती वैभवी इमारतें हैं, तो दूसरी ओर करोड़ों परिवार खुले आसमान के नीचे या गंदगी और ग़लाज़त से भरी बस्तियों में जीवन गुज़ारने को मजबूर हैं।

हर तरफ़ ज़ुल्म और अत्याचार का बोलबाला है। भ्रष्टाचार एक संगठित उद्योग का रूप ले चुका है। अदालतों की पूरी व्यवस्था, क़ानूनों की मोटी किताबें और धाराओं के दफ़्तर मौजूद होने के बावजूद, एक आम आदमी के लिए न्याय तक पहुँचना लगभग असंभव बना दिया गया है। हज़ारों निर्दोष युवा वर्षों से सलाख़ों के पीछे अपनी रिहाई का इंतज़ार कर रहे हैं। जाति, रंग, नस्ल, राष्ट्रीय और क्षेत्रीयता के भेदभाव ने इंसान को इंसान का दुश्मन बना दिया है। विकास के आँकड़े आकर्षक हो सकते है, लेकिन समाज के बड़े वर्ग की आँखों में आज भी भविष्य का भय साफ झलकता है। नए साल में सबसे बड़ी आशा प्रत्येक क्षेत्र मे न्याय को स्थापित करना है।

नफरत, ध्रुवीकरण और असहिष्णुता का बढ़ता हुआ वातावरण मानव समाज के लिए गंभीर चेतावनी है। जाति, धर्म, भाषा और पहचान के नाम पर समाज को बाँटने की प्रवृत्ति ने आपसी विश्वास को कमजोर कर दिया है। भौतिकतावादी मानसिकता ने मानव संबंधों को भी प्रभावित किया है। परिवार, समाज और नैतिक मूल्यों की जड़ें कमजोर पड़ रही हैं। उपभोग की दौड़ में स्त्री की गरिमा और सम्मान को सबसे अधिक ठेस पहुँची है। नया साल तभी सार्थक हो सकता है जब नैतिक मूल्यों को प्रस्थापना और स्त्री को सामाजिक पुनर्निर्माण की सक्रिय भागीदार के रूप में देखा जाए।

युवाओं के संदर्भ में नया साल दोहरी चुनौती और दोहरी आशा लेकर आता है। एक ओर वे तकनीक के सबसे बड़े उपभोक्ता हैं, दूसरी ओर वही भविष्य के निर्माता भी हैं। यदि युवा ऊर्जा को सही दिशा, नैतिक दृष्टि और सामाजिक उत्तरदायित्व मिल जाए, तो यही पीढ़ी निराशा के अंधकार को आशा के प्रकाश में बदल सकती है।

इस्लामी नैतिक दृष्टिकोण से नई आशाएँ

इस्लामी दृष्टिकोण नया साल मनाने को केवल औपचारिक उत्सव नहीं, बल्कि मुहासबा अर्थात आत्म-समीक्षा का अवसर मानता है। इस्लाम निराशा को गुनाह के समान मानता है और आशा को ईमान का अभिन्न अंग। क़ुरआन स्पष्ट रूप से कहता है कि अल्लाह की रहमत से मायूस न हुआ जाए। यही विचार आज की थकी हुई मानवता के लिए नई ऊर्जा बन सकता है।

इस्लाम विज्ञान और तकनीक को नकारता नहीं, बल्कि उन्हें नैतिक अनुशासन के साथ जोड़ता है। मनुष्य को धरती पर ख़लीफ़ा और अमानतदार माना गया है, जिसका अर्थ है कि संसाधनों का उपयोग शोषण नहीं, बल्कि न्याय और संतुलन के साथ हो। इस्लामी नैतिकता का मूल स्तंभ न्याय, करुणा और मानवीय गरिमा है। यही मूल्य नए साल में सामाजिक तनाव, आर्थिक असमानता और वैश्विक संघर्षों के बीच मानवता को स्थिरता दे सकते हैं। इस दृष्टि से नया साल केवल भविष्य की प्रतीक्षा नहीं, बल्कि बेहतर भविष्य के लिए नैतिक संकल्प का नाम है।


आरफ़ा परवीन

संपादक, आभा ई मैग्ज़ीन

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