बिहार चुनाव में वोट पर चोट
बिहार चुनाव का अध्याय भले ही बंद हो गया हो लेकिन प्रश्नों का नया अध्याय अब खुल चुका है। राजनीतिक अभियान, चुनावी नारे, वादे और आरोप प्रत्यारोप सब अतीत में चले गए, लेकिन जनता के दिलों में प्रश्नों की झड़ी छोड़ गए। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हमारा वोट वास्तव में सुरक्षित था? क्या हमारी आवाज़ सही तरह से सुनी गई? चुनावी परिणाम अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उससे ज़्यादा महत्वपूर्ण वह भावनाएं और अनुभव हैं जो बिहार के लाखों मतदाता अपने साथ ले गए। उन भावनाओं में उम्मीद भी है, मायूसी भी है, भरोसा भी है और शक के बादल भी मौजूद हैं। परिणाम का आंकलन बताता है कि बिहार की जनता ने इस बार भी मूल समस्याओं जैसे रोज़गार, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी। हालांकि जातिवाद के प्रभाव से भी इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन जन समस्याओं ने बड़ी हद तक चुनाव को प्रभावित किया। लेकिन इन सबके बावजूद वोट छीन जाने से संबंधित शिकायत ने सामूहिक रुप से चुनावी प्रक्रिया पर विश्वास को प्रभावित किया है। चुनाव के दौरान बिहार के विभिन्न क्षेत्रों से ऐसी शिकायत सामने आयी हैं जिन्होंने चुनावी पारदर्शिता पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया। जैसे वोटर लिस्ट से नाम गायब होना, पोलिंग बूथ की दूरी, उचित व्यवस्था ना होना, बुज़ुर्गों, महिलाओं और दिव्यांग के लिए सुविधाओं की कमी। कुछ स्थानों पर सामाजिक दबाव का असर भी देखने को मिला जबकि कुछ क्षेत्रों में डर का माहौल था। इन सब चीज़ों ने हज़ारों नागरिकों को उनके मूल लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित कर दिया। यह केवल सुविधाओं की कमी नहीं, भरोसे का टूटना है विशेषज्ञों के अनुसार वोट के अधिकार में रुकावटें सीधे तौर पर जनता के भरोसे को प्रभावित करती हैं। इसलिए ऐसे माहौल में भरोसा टूटना लाज़िमी है। जिसके परिणाम स्वरुप वोटर सोचता है कि अगर वोट डालने ही ना दिया गया तो फिर परिणाम उसका प्रतिनिधित्व कैसे कर सकते हैं? यह रुझान भविष्य में टर्न आउट कम होने और जनता की राजनीतिक गतिविधि से दूर होने का ख़तरा भी पैदा करता है। चुनाव के बाद अब सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी प्रशासनिक विभागों, चुनाव आयोग और सरकार पर है कि वह जनता के भरोसे को बहाल करें। इसके लिए ज़रुरी है कि वह वोटर लिस्ट की पारदर्शी जांच कराये, निम्न वर्ग को विशेष सुविधा मुहैया की जाएं, पोलिंग बूथ तक मतदाता की पहुंच सुविधाजनक हो सके। इसके अतिरिक्त संपूर्ण चुनावी प्रक्रिया पूर्ण रुप से पारदर्शी हो। अगर यह सुधार ना किए गए तो आने वाले चुनाव में संदेह के बादल और गहरे होते जाएंगे। लेकिन इस बिहार चुनाव में जो एक चीज़ सकारात्मक दिखी वह यह थी कि रुकावटों व अड़चनों के बावजूद लाखों मतदाता अपने घरों से निकले और वोट डाला। यह इस बात का सबूत है कि बिहार का वोटर लोकतंत्र के अस्तित्व पर विश्वास रखता है। अपनी स्वतंत्रता को महत्व देता है और परिवर्तन की आशा भी नहीं छोड़ता। बिहार चुनाव केवल एक राजनीतिक प्रक्रिया नहीं थी बल्कि यह जन चेतना की परीक्षा थी। परिणाम अपनी जगह लेकिन वास्तविक जीत तभी है जब हर नागरिक का वोट सुरक्षित हो, विश्वास और सम्मान बहाल हो। यदि वोट छीन लिया जाए तो सरकारें जैसे तैसे बन जातीं हैं लेकिन लोकतंत्र कमज़ोर हो जाता है। बिहार चुनाव ने हमें यह संदेश दिया है कि लोकतंत्र की नींव वोट है और वोट की सुरक्षा राज्य का प्रथम कर्तव्य है। चुनाव परिणाम अपनी जगह, सरकार अपनी जगह लेकिन असल प्रश्न अभी बाकी है कि क्या बिहार के हर नागरिक का वोट पूरी सच्चाई और सम्मान के साथ सुरक्षित रखा गया है?
मुहम्मद इरफ़ान
बारसी टॉकली, गुजरात