स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन : सरकारी षड्यंत्र से नागरिकों को बचाने की आवश्यकता
जब टी. एन. शेषन भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त थे, तब उनकी जो धाक थी, वह आज भी इतिहास के पन्नों पर सुनहरे अक्षरों से दर्ज है। उस समय मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट यानी चुनाव आचार संहिता क्या है, यह सामान्य मतदाता से लेकर प्रधानमंत्री तक सभी को समझ में आने लगी थी। उससे पहले स्थिति यह थी कि जैसी मनमर्जी से रेवड़ी बांटी जा सकती थी, चुनाव प्रक्रिया में खुल्लमखुल्ला धांधली हो सकती थी और सत्ता के सामने सब लाचार दिखते थे। लेकिन टी.एन.शेषन के चुनाव आयुक्त बनते ही आम नागरिकों में लोकतंत्र के प्रति जो विश्वास पैदा हुआ वह उनकी ही देन है, जो कि वास्तव में अद्भुत है।
वर्तमान में जिस प्रकार मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपने व्यवहार के द्वारा जनता का विश्वास तोड़ा है ऐसे में टी.एन,शेषन जैसे चुनाव आयुक्त की याद आती है। आज मुख्य चुनाव आयुक्त जिस तरह से व्यवहार कर रहे हैं, वह सीधे सत्ता की कठपुतली की भूमिका निभा रहे हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है। चुनाव आयुक्त की चयन प्रक्रिया से ही, जिस तरह सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को बहुमत के बल पर बाहर कर दिया गया, तभी से स्पष्ट हो गया था कि यह चुनाव प्रक्रिया अब तटस्थ नहीं रह पाएगी। लोकतंत्र की पूरी प्रक्रिया को बहुमत के बल पर धुंधला करने के बावजूद कोई उपहास नहीं हुआ। मौजूदा चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने जो किया वह सबके सामने है। यह अपेक्षित था और बहुत सहजता से सरकार ने होने दिया।
राहुल गांधी ने महादेवपुरा, कर्नाटक विधानसभा के आंकड़े और विवरण चुनाव आयोग के अपने ही डेटा से लेकर दिखाए और अपने प्रस्तुतिकरण से स्पष्ट रूप से साबित किया कि चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं है, बिल्कुल भी नहीं है। अलग-अलग चरणों में मतदाताओं को हटाने, नकली मतदाताओं को जोड़ने, डुप्लीकेट मतदाता खड़े करने, एक ही मकान में 100 से 500 मतदाता दिखाने और इस तरह की कई गड़बड़ियाँ, सामान्य नागरिक को समझ में आने लायक तरीके से देखी गईं।
गोदी मीडिया भी स्तब्ध रह गया और कोई खुलासा नहीं कर सका और मानना पड़ा कि मतदाता सूची की प्रक्रिया में खुलेआम गड़बड़ियाँ हुई हैं। इसके जवाब में चुनाव आयुक्त ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में जो खुलासे किए, वे सचमुच शर्मनाक थे। वीडियो फुटेज में बहनों की प्राइवेसी का मुद्दा एक छोटे बच्चे को बहलाने जैसा बेतुका था। यह किसी बाथरूम या चेंज रूम का फुटेज देखने जैसा नहीं था। यह तो यह जांचने के लिए था कि शाम 5:00 बजे के बाद कौन से लोग मतदान के लिए आकर खड़े हुए और इतना अधिक मतदान कैसे संभव हुआ। इसमें बहनें भी हों तो क्या आपत्ति हो सकती है?
बिहार के पहले चरण के मतदान की अगली शाम राहुल गांधी ने फिर से हाइड्रोजन बम फोड़ दिया। हरियाणा में हुई धांधली जनता के सामने स्पष्ट रूप से रखी और सबको चौंका दिया। ब्राज़ील की एक मॉडल का फोटो अलग-अलग मतदाताओं के नामों के सामने देखा गया और वह चुनाव आयोग की सूची में साफ-साफ दिखाई दे रहा है। कई पैनल चर्चाएं हुईं, बहसें हुईं, संपादकीय लिखे गए, स्तंभकारों ने भी कई बातें ध्यान में रखीं। लेकिन अंत में सब कुछ शांत होता दिख रहा है और यही मोदी सरकार करना चाहती है।
समय बीतने देना और जो कर रहे हैं, उसे शांति से करते जाना। कोई हमारा कुछ बिगाड़ नहीं सकता। न्यायपालिका भी एक हद तक चर्चा करती है और फिर मुद्दे को लटका छोड़ देती है। यह बात इलेक्टोरल बॉन्ड में भी देखी गई थी। भाजपा ने जरूरत का फायदा उठा लिया और समय बीत जाने के बाद अदालत ने इसे खारिज भी कर दिया। लेकिन जो आंकड़े विभिन्न पार्टियों को, खासकर भाजपा को मिले थे, वे चौंकाने वाले थे। पहली नजर में ही इस बॉन्ड की गलत स्कीम को सर्वोच्च अदालत ने स्टे न देकर, देर से फैसला देकर इसका सीधा लाभ सत्तारूढ़ पार्टी को होने दिया।
मोदी-शाह की जोड़ी जिस तरह से नए-नए गुर खोजकर चुनाव को दूषित कर रही है, वह सचमुच सत्ता पाने और उस पर चिपके रहने की उनकी अद्भुत भूख और ताकत दर्शाती है। एक तरफ उन्होंने भारत भर के प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों मीडिया को, और काफी हद तक सोशल मीडिया को भी, अपने पक्ष में लेकर, जिस तरह लगातार इस्तेमाल किया है, वह कमाल का है, तो दूसरी तरफ न्यायपालिका को भी काबू में लेकर यह स्थापित कर दिखाया है कि हम कुछ भी गैर-कानूनी नहीं कर रहे।
विपक्ष झूठा रोलता रहता है। लो, यह रही अदालत की क्लीन चिट भी! साम, दाम, दंड, भेद - किसी पहलू में वे ढील नहीं रखते। किसी को लालच से तो किसी को डर से वे आसानी से वश में कर लेते हैं और यह कला किसी से छुपी या अनजानी नहीं है।
बिहार के बाद अब चुनाव आयोग ने गुजरात सहित 12 राज्यों में SIR लागू करने की घोषणा की है। 4 नवंबर से इसका क्रियान्वयन भी शुरू हो गया है। जो प्रक्रिया चुनाव आयोग ने दिखाई है और जो 11 दस्तावेज मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए जरूरी बताए हैं, वे समाज के हाशिये पर रहने वाले लोगों, गरीबों, मजदूरों और पिछड़ों के लिए बहुत मुश्किल हैं। आधार के बारे में अनिश्चितता बनी हुई है।
नागरिकता के सबूत, जो केंद्र सरकार के हाथ में हैं, मांगकर पूरी प्रक्रिया को विवादास्पद बना दिया गया है। अल्पसंख्यकों यानी मुसलमानों को स्पष्ट रूप से निशाना बनाया गया है और कई जगहों पर उनके नामों की छंटनी की जा रही है। ABCDEF इस तरह 6 प्रकार की श्रेणियां बनाई गई हैं, 2002 से पहले और बाद के मतदाताओं को किस तरह मतदाता सूची में शामिल किया जा सकता है, इसकी जो समझाईश दी गई है, उसे देखते हुए यह प्रक्रिया बहुत मुश्किल बनने वाली है। स्वाभाविक रूप से, बहुत से लोग अपना नाम मतदाता सूची से खो देंगे।
आम तौर पर अब तक चुनाव आयोग यह सुनिश्चित करता था कि कोई मतदाता छूटे नहीं, लेकिन अब यह जताया जा रहा है कि कैसे वे बाहर हो जाएं। मतदाता सूची में सही तरीके से अपना नाम आ जाए, यह सुनिश्चित करने के लिए पहले चुनाव आयोग BLO यानी बूथ लेवल ऑफिसर को भेजकर जो प्रक्रिया कराता था, वह अब BLO द्वारा नहीं होगी, बल्कि मतदाता को स्वयं करनी होगी। उसे जो फॉर्म चाहिए वह दिया जाएगा और उसे भरकर वापस देने की जिम्मेदारी मतदाता की होगी। यह पूरी जटिल प्रक्रिया आम मतदाता को उलझा देगी, वह समय पर प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाएगा और अपना नाम खो देगा।
सवर्ण जाति के लोग और पढ़े-लिखे लोग तो यह काम कर लेंगे, लेकिन पिछड़ी जातियों, अनपढ़ लोगों, दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों के बाहर रह जाने का डर है। इन सभी दस्तावेजों को जमा कराने की पड़ताल में जाने के बजाय डर के मारे वे मतदाता बनने का काम ही छोड़ देंगे। हरियाणा और महाराष्ट्र में जिस तरह चुनाव प्रक्रिया का दुरुपयोग करके भाजपा और सहयोगी पार्टियों ने सत्ता हथिया ली, वह इस तरह की धांधली के कारण ही संभव हुआ, यह स्पष्ट रूप से राहुल गांधी चुनाव आयोग के डेटा से साबित कर सके हैं। इसी प्रक्रिया के इन 12 राज्यों में न हो पाने के लिए विपक्ष के साथ-साथ सिविल सोसाइटी और प्रबुद्ध नागरिकों को मतदाता सूची को सही और तटस्थ बनाने के लिए अभियान चलाना होगा।
अब जब बिहार चुनाव के परिणाम आ गए हैं, तो स्पष्ट हो गया है कि SIR (विशेष सघन समीक्षा) के कारण 123 सीटें सीधे प्रभावित हुई हैं। 65 लाख मतदाताओं को हटा दिया गया है और 21 लाख नए मतदाता जोड़े गए हैं और यह प्रक्रिया पूरी तरह से संदिग्ध है। मीडिया ने जोर-शोर से विपक्ष को कमजोर दिखाया और सत्तारूढ़ पार्टी को मजबूत दिखाया है, और जनता को SIR की वास्तविक भूमिका समझाने से चालाकी से दूर रखा है, यह सब प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तथा सोशल मीडिया के विश्लेषणों से देखकर समझा जा सकता है।
जिन 12 राज्यों में SIR की प्रक्रिया चल रही है, वहाँ वंचित समाज के, कम पढ़े-लिखे और मध्यम वर्ग के सभी नागरिक मतदाता गणना फॉर्म लेकर इधर-उधर भटक रहे हैं। सिविल सोसाइटी और कई संस्थाएं मदद के लिए आगे आई हैं, लेकिन वेबसाइट या चुनाव आयोग द्वारा डाली गई जानकारी बहुत से मतदाताओं का पर्याप्त डेटा नहीं दे पा रही है। कुछ BLO (बूथ लेवल ऑफिसर) सहयोग दे रहे हैं, तो कुछ बिल्कुल भी ध्यान नहीं दे रहे हैं।
बेचारा मतदाता अपनी जानकारी भरने के लिए उलझन में पड़ा हुआ है और हांफ रहा है। यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि बहुत ही चालाकी से इस पूरी प्रक्रिया को गठित किया गया है और मतदाता का विवरण भरने की जिम्मेदारी, जो चुनाव आयोग की थी, अब नागरिक के कंधों पर डाल दी गई है। भारत जैसे अर्ध-शिक्षित देश में यह कार्य कैसे पूरा होगा, यह समझ से परे है। सुप्रीम कोर्ट में मामला अभी भी लंबित है और जब तक अंतिम फैसला आएगा, तब तक शायद बहुत लाभ लिया जा चुका होगा।
इसलिए इस समय आवश्यकता है कि हम गांव-गांव और मोहल्ले-मोहल्ले में लोगों को जागरूक करें, स्पष्ट मार्गदर्शन दें, उचित व्यवस्था करें और यह सुनिश्चित करें कि मतदाता सूची में सभी पात्र लोग समय पर शामिल हो जाएं।
मु. उमर वहोरा
स्वतंत्र लेखक, गुजरात