पश्चिम का मानवाधिकार और इस्लाम
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कवर स्टोरी

पश्चिम का मानवाधिकार और इस्लाम

पश्चिम ने मानवाधिकार की जो धारणा दी उसकी शुरुआत 13 CE से हुई। यह पॉलिटिकल और इंटरनेशनल कानूनों जैसे मैग्ना कार्टा (1215), U.S. डिक्लेरेशन ऑफ़ इंडिपेंडेंस (1776), फ्रेंच डिक्लेरेशन ऑफ़ द राइट्स ऑफ़ मैन एंड ऑफ़ द सिटिज़न्स (1789), यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ़ ह्यूमन राइट्स (1948) के रूप में शुरू हुआ। सवाल यह है कि उन्हें इंसानों के लिए क़ानून और अधिकार कहाँ से मिले? अगर हम पीछे देखें तो पाते हैं कि वह सिर्फ इस्लाम है जो असल में क़ुरान की कई आयतों में इंसानियत और ह्यूमन राइट्स सिखाता है जबकि पश्चिम ने जो मानवाधिकार बताए वह इस्लाम के सैकड़ों साल बाद की बातें हैं।

जिसमें व्यवहार में नस्लवाद, उपनिवेशवाद, और अत्याचार किए गए, मिसाल के तौर पर अफ्रीका,अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया आदि जैसे देश। अगर हम दोनों कॉन्सेप्ट को एक साथ देखें तो हम आसानी से समझ सकते हैं कि इस्लाम मानवाधिकार के बारे में क्या कहता है।

इस्लाम द्वारा दिए गए मुख्य मानवाधिकार

1. जीवन का अधिकार (Right to Life)

"जिसने किसी इंसान को ख़ून के बदले या ज़मीन में फ़साद फैलाने के सिवा किसी और वजह से क़त्ल किया उसने जैसे तमाम इंसानों को क़त्ल कर दिया, और जिसने किसी की जान बचाई उसने जैसे तमाम इंसानों को ज़िंदगी बख़्श दी"- (कुरान 5:32)। इस आयत में आम लोगों की सुरक्षा के लिए युद्ध के सख़्त नियम हैं। कई हदीसें हैं जहाँ युद्ध (जंग) के दौरान आम लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित (हिफाज़त को यक़ीनी) करने की बात कही गई है। पैग़म्बर ने हत्या को “शिर्क के बाद सबसे बड़ा गुनाह" बताया है। जीवन लेने का अधिकार किसी व्यक्ति को नहीं केवल न्यायालय को होना चाहिए।

2. जान की सुरक्षा का अधिकार (Right to security of life)

इस्लाम इस बात पर ज़ोर देता है कि एक जान बचाना पूरी इंसानियत को बचाने जैसा है,चाहे बीमारी का इलाज करके, भूखे को खाना खिलाकर, या बिना किसी भेदभाव के किसी ख़तरे में पड़े व्यक्ति को बचाकर किया जाए। दिलचस्प बात यह है कि तलमूद भी इसी भावना को दोहराता है, लेकिन इसे सिर्फ़ इज़राइलियों तक ही सीमित रखता है, यहाँ तक कि यह भी कहता है कि किसी गैर-इज़राइली को बचाना गुनाह है। जबकि मुसलमान हर इन्सान की जान बचाने को अपना फ़र्ज़ समझते हैं, क्योकि क़ुरान ने ऐसा ही हुक्म दिया हैं। लेकिन वह अगर बचाना ज़रूरी समझते हैं तो सिर्फ बनी इस्राइल की जान को, बाकी रहे दूसरे इन्सान, तो यहूदी-दीन मे वह इन्सान समझे ही नही जाते, इसका जीवित उधारण इसराइल द्वारा कई देशों में किए जा रहे नरसंहार से आप देख सकते हैं। उनकी नज़र में उम्मी(अरबियों) के कोई इन्सानी अधिकार नही है। इन्सानी हुक़ूक़ सिर्फ बनी इस्राइल के लिए ख़ास हैं। क़ुरान में भी इस का ज़िक्र आया हैं कि यहूदी कहते है कि ‘‘ हमारे उपर उम्मियों के बारे में (यानी उनका माल मार खाने में) कोई पकड़ नही हैं।’’ (3:75)



3. जीवन की पवित्रता का अधिकार:(Right to the sanctity of life)

इस्लाम सिर्फ़ लड़ने वाले सैनिकों पर ही हमला करने की इजाज़त देता है,लेकिन उसके बाद भी मुसलमानों को सिखाया जाता है कि अगर कोई विरोधी दया मांगे तो अपनी तलवारें काबू में रखें।  क्या पश्चिम (वेस्ट) के मॉडर्न ह्यूमन राइट्स में ऐसे क़ानून हैं या यह नॉन-फाइटिंग सिविलियन्स के राइट्स को फॉलो करता है? असल में नहीं। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र के क़ानून भी सिर्फ कागज़ी हैं जो कभी लागू नहीं हो पाते, जबकि यह इस्लाम का मूल सिद्धांत है कि- हर इंसान सिर्फ "इंसान” होने की वजह से अधिकार रखता है,चाहे वह मुसलमान हो या गैर-मुसलमान या किसी भी देश, रंग, नस्ल या जाति का हो, इस्लाम तमाम इन्सानों के लिए इस हक़ को तस्लीम करता हैं। अगर कोई आदमी जंगली कबीलों से भी संबंध रखता हैं तो उसको भी इस्लाम इन्सान ही समझता हैं। इस तरह इस्लाम मानव जीवन की पवित्रता (हुरमत) को दर्शाता है।

4- औरतों के अधिकार और आज़ादी- (Women Rights & Freedom)

 इस्लाम में औरतों को धरती पर सबसे नाज़ुक और क़ीमती चीज़ माना जाता है। औरत की अस्मत और इज़्ज़त हर हाल मे आदर के योग्य हैं। उसकी इज़्ज़त पर हाथ डालना हराम है चाहे वह औरत अपनी कौम की हो, या दुश्मन कौम की, जंगल बियाबान(निर्जनता) में मिले या विजयी(फतह) किये हुये शहर में, हमारी अपने मज़हब की हो या दूसरे मज़हब की,मुसलमान किसी हाल में भी उस पर हाथ नही डाल सकता। अल्लाह क़ुरान में फरमाता हैं-’’ ज़िना के करीब भी न फटको"(17:32)

इस आयत के साथ ही इस काम की सजा मुक़र्रर कर दी गई और यह हुक्म बिना किसी शर्त के दिया गया कि किसी भी औरत की इज़्ज़त पर हाथ डालना हर हाल में मना हैं और अगर कोर्ई मुसलमान इस काम को करता हैं तो वह इस की सज़ा से नही बच सकता, चाहे दुनिया मे सज़ा पाये या आख़िरत में। विजय (फतह) किए हुए देशों में मुस्लिम फौजों का यह इतिहास रहा है कि औरतों के साथ बदसलूकी से वो लगभग पाक रहे हैं। इस्लाम में मर्दों को अपने परिवार के लिए कमाने वाला और भरण पोषण करने वाला (क़व्वाम) माना जाता है, जहाँ मुश्किलें हों वहाँ औरतें नहीं होतीं। उनकी लिए मेहर है और विरासत में हक़ भी,अल्लाह ने औरतों को घर का हक़ दिया और उसे रब्बातुल बैत(घर की रानी) बनाया है। औरतों को मर्दों की गंदी नज़रों से बचने के लिए ढके रहने का हुक्म है। 

इस्लाम में पोर्न और प्रॉस्टिट्यूशन हराम है, जिसने पश्चिम में बिलियन डॉलर की इंडस्ट्री खड़ी की है जिसमें बड़े बड़े पॉलिटिकल घराने भी शामिल हैं। जहाँ तक वेस्ट में औरतों की आज़ादी की बात है, तो यह पब्लिक में अपने जिस्म की नुमाइश को आज़ादी समझती है जबकि उनकी आज़ादी मर्दों के दबदबे वाले समाज में उनके साथ भेदभाव तक ही सीमित है लेकिन उनकी व्यापक सोच इस ग़ुलामी को समझ पाने की क्षमता नहीं रखती।

5- हर ज़रूरतमंद की सहायता का अधिकार (The right to assistance for every needy person) 

क़ुरान मे यह हुक्म दिया गया हैं कि ‘‘और मुसलमानों के मालों में मदद मांगने वाले और महरूम रह जाने वाले का हक़ हैं।‘‘(05:19) यह धर्म, समुदाय या जाति की परवाह किए बिना ज़रूरतमंदों की मदद करने की यूनिवर्सल अपील पर ज़ोर देता है। यह हरगिज़ नही देखा जायेगा कि वह अपनी क़ौम या अपने देश का हैं या किसी दूसरी कौम, देश या नस्ल से उसका संबंध हैं। आप हैसियत और पावर रखते हों और कोर्ई ज़रूरतमन्द आप से मदद मांगे तो आप ज़रूर उसकी मदद करें। ख़ुदा ने आप पर उसका यह हक़ क़ायम कर दिया हैं।

6- पाश्चात्य कौमों की गुलामसाज़ी (Slavery of Western nations)

350 सालों तक, पश्चिमी देशों ने गुलामों का बेरहमी से व्यापार किया, लगभग 100 मिलियन अफ्रीकियों को पकड़कर जानवरों की तरह ले जाया गया, जिनमें से 20% तक रास्ते में ही मर गए। अफ्रीका का "स्लेव कोस्ट" इस क्रूरता का गवाह है। यह एक दर्दनाक विडंबना है कि ये देश अब ग़ुलामी को सही ठहराने के लिए दूसरों की आलोचना करते हैं। यह भी अन्दाज़ा किया जाता है कि सामूहिक रूप से विभिन्न पाश्चात्य क़ौमों ने जितने लोगो को पकड़ा था उनकी तादाद दस करोड़ तक पहुंचती थी। इस तादाद में तमाम पाश्चात्य कौमों की ग़ुलाम साज़ी के स्टेटिस्टिक्स शामिल हैं।

7-  इस्लाम में गुलामी की हैसियत और अंत (Values of slavery in Islam & it's end)

इस्लाम ने गुलामी को आज़ादी को बढ़ावा देकर संबोधित किया, गुलामों को आज़ाद करना दान और पश्चाताप का काम बनाया। "खिलाफत रशीदा" के समय तक, अरब में ज़्यादातर गुलाम आज़ाद हो चुके थे। पैगंबर मुहम्मद (स अ व) ने 63 गुलामों को आज़ाद किया,और आयशा (र.अ) और अब्दुर रहमान बिन औफ (र.अ) जैसे साथियों ने हज़ारों गुलामों को आज़ाद किया। 40 से 50 साल में अरब में लगभग सारी गुलामी का अंत हो गया। इस्लाम ने पहले से मौजूद दासों को मुक्त करने के लिए अनेक प्रोत्साहन दिए-

-गुनाहों का प्रायश्चित= दास मुक्त करना 

-दास आज़ाद करना श्रेष्ठ नेकी

आज इसका हल क्या है? युद्धबंदियों में अदला-बदली? लेकिन इतिहास बताता है कि हारे हुए देशों को अक्सर ग़ुलामी से भी ज़्यादा मुश्किल हालात का सामना करना पड़ा है, जैसे WWII के बाद रूस में जर्मन और जापानी क़ैदियों को साइबेरिया में बेरहमी से काम करने के लिए मजबूर किया गया था। इस्लाम और पश्चिमी देशों में ग़ुलामी का यह अंतर बिल्कुल स्पष्ट है जिसका इतिहास गवाह है।

8- न्याय का अधिकार (Rights of Justice)

इस्लाम हर इंसान के साथ इंसाफ़ से पेश आने पर ज़ोर देता है, इन्सान का यह हक़ हैं कि उसके साथ न्याय किया जायें। यह एक बहुत अहम अधिकार हैं, जो इस्लाम ने इन्सान को इन्सान होने की हैसियत से दिया हैं। अल्लाह फरमाता है कि ‘‘ किसी गिरोह की दुश्मनी तुम्हे इतना न भड़का दे कि तुम नामुनासिब ज़्यादती करने लगो।’’

आगे चल कर फरमाया, ‘‘और किसी गिरोह की दुश्मनी तुम को इतना उत्तेजित न कर दें कि तुम इन्साफ से हट जाओ, इन्साफ करो, यही धर्म परायणता से करीबतर हैं।’’(5:8) एक और जगह फरमाया गया हैं कि ‘‘ ऐ लोगो! जो ईमान लाये हो, इन्साफ करने वाले और ख़ुदा के वास्ते गवाह बनो।’’(5:8) मालूम हुआ कि इस्लाम हमें आम इन्सान ही नही दुश्मनों तक से इन्साफ करने का हुक्म देता है।

9- मानव समानता (Human equality)

कुरआन में अल्लाह फ़रमाता हैं कि ‘‘ऐ इन्सानों! हम ने तुम को एक मां और एक बाप से पैदा किया।’’ दूसरे शब्दों में, इसका मतलब यह हुआ कि तमाम इन्सान अस्ल में भाई भाई हैं, एक ही मां और एक ही बाप की औलाद हैं। ‘‘ और हमने तुम को कौमों और कबीलों में बांट दिया, ताकि तुम एक दूसरे को पहचानों। ‘‘(49:13)। क़ुरान की यह आयत इस बात पर ज़ोर देती है कि सभी इंसान एक ही पिता और माता से हैं, जो आपसी पहचान के लिए कबीलों में बँटे हुए हैं, न कि बड़ाई के लिए। और आगे बताया गया कि "हकीकत में तुम में इज़्ज़त वाला वह हैं, जो तुम में सब से ज़्यादा ख़ुदा से डरने वाला है’’(49:13)। यानी इन्सान पर इन्सान की श्रेष्ठता(बड़ाई) सिर्फ पाक़ीजा किरदार और अच्छे आचरण की बिना पर हैं  न कि रंग,नस्ल, जुबान या वतन की बिना पर। यानी श्रेष्ठता का आधार तक़वा(ईश-भय) है और यह दूसरों पर घमंड करने के लिए नहीं,चरित्र की गुणवत्ता बताने के लिए है। इसी बात को अल्लाह के रसूल (सल्ल0) ने एक हदीस में बयान फरमाया हैं कि-

‘‘किसी अरबी को गै़र-अरबी पर कोर्ई बड़ाई नही हैं,न गै़र-अरबी को किसी अरबी पर बड़ाई हैं। न गोरे को काले पर और न काले को गोरे पर कोर्ई बड़ाई हैं। तुम सब आदम ‘(अलैहि0) की औलाद हो और आदम मिट्टी से पैदा हुए थे।’’ इस तरह इस्लाम ने तमाम मानव-जाति में बराबरी कायम की और रंग, नस्ल, भाषा और राष्ट्र के बिना पर सारे भेद-भावों की जड़ें काट दी।

10- इस्लामी युद्ध-नियम व संधि की हैसियत (Islamic Warfare: Rules and Status of Treaty)

इस्लाम ने जंग के जो नियम बताये हैं, उनकी सही हैसियत क़ानून की हैं, क्योकि वे मुसलमानों के लिए अल्लाह और रसूल के दिये हुए आदेश हैं, जिन की पाबन्दी हमें हर हाल में करना है। हमें देखना है कि पश्चिम के लोग जंग की सभ्य मर्यादाओं के उस दर्जे तक पहुंच सके हैं या नही, जिसका इस्लाम ने आदेश दिया था। दुश्मनों के हुक़ूक़ भी इस्लाम में मुर्कर किये गये हैं,जैसे:-

 युद्ध न करने वालो के अधिकार 

* जो नागरिक(आवाम)

लड़ने वाले नही हैं, उनको क़त्ल न किया जाये 


* किसी बूढ़े, किसी बच्चे और किसी औरत को कत्ल न किया जाए।


* मठों (खानकाहों) 

में बैठे साधुओं( राहिबो) को मत मारो, और पूजा(इबादत) की जगहों पर बैठे लोगों को मत मारो।

 युद्ध करने वालो के अधिकार 

* उन्हें आग का अज़ाब(सज़ा) न दिया जाये

* ज़ख्मीयों पर हमला ना किया जाए 

* कैदियों को क़त्ल ना किया जाए 

* किसी को बांधकर क़त्ल ना किया जाए 

* दुश्मन क़ौम के देश में आम गारतगरी या लूटमार न की जाये

* दुश्मन की लाशों पर ग़ुस्सा न निकाला जाये उनका अनादर ना किया जाए 

* दुश्मन की लाशे उनके हवाले की जाएं

* वादे ना तोड़ें जाएं कमिटमेंट्स को पूरा किया जाए 

* जंग से पहले जंग का ऐलान किया जाए

11- राजनैतिक अधिकार (Political Rights)

जहाँ इस्लामी शरिया(क़ानून) है वहाँ हर कोई अपने कर्मों के लिए जवाबदेह है, यहाँ तक कि उस देश का राजा(हुक्मरान)भी, क़ानून की ख़िलाफ़ वर्ज़ी करने पर उसे इंसाफ के साथ सज़ा दी जाती है लेकिन मानवाधिकार(ह्यूमन राइट्स) के वेस्टर्न कॉन्स्टिट्यूशन में राजनीतिक नेताओं(पॉलिटिकल लीडर्स) को नरसंहार के बाद भी बख़्शा जाता है। यहां तक कि अंतर्राष्ट्रीय क्रिमिनल कोर्ट भी उन्हें सज़ा देने में अपंग और असहाय नज़र आता है।

12- आर्थिक अधिकार (Economic Rights)

इस्लाम इंटरेस्ट फ्री बैंकिंग सिस्टम को बढ़ावा देता है जबकि वेस्ट में ख़ून चूसने वाले बैंक और इंश्योरेंस कंपनियां हैं जिन्होंने हर इंसान को अपने सिस्टम का ग़ुलाम बना लिया है और वह उसमें बुरी तरह फंस कर रह गया है। इस्लाम में ज़कात और अपनी मर्ज़ी से सदक़ा देना ज़रूरी है जिससे समाज में फाइनेंशियल बराबरी की जा सके और बहुत ही हाशिए(मारजिनालाइस्ड) पर पड़े समुदायों को ऊपर उठाया जा सके, पैसों का सही बंटवारा और उपयोग हो सके, ग़रीबी दूर हो, बेरोज़गारी का ख़त्मा किया जा सके और अर्थव्यवस्था को बढ़ाया जा सके।

 13- धर्म का प्रचार करने की आज़ादी (Freedom to Preach Religion)


इस्लाम कहता है “धर्म में कोई ज़बरदस्ती नहीं” (कुरान 2:256)। दुनिया के ज़्यादातर देशों में अपने अपने धर्म का प्रचार-प्रसार करने का अधिकार है लेकिन जहाँ तक कुछ देशों की बात है वहाँ इस्लाम का प्रचार करने की इजाज़त नहीं दी जा रही है, जबकि कई पश्चिमी देश, खाड़ी देश और सऊदी अरब जैसे मुल्क अपने नागरिकों(अवाम) को उनके धर्म का प्रचार और उनकी ज़मीन पर उनका धार्मिक स्थल बनाने की इजाज़त देते हैं।

इस्लाम में मानवाधिकार (ह्यूमन राइट्स) की नींव बहुत मज़बूत है क्योंकि वहाँ हर इंसान अल्लाह के सामने जवाबदेह है और गुनाह की सख़्त सज़ाएँ हैं लेकिन पश्चिम (वेस्ट) ने मानवाधिकारों की बात बहुत देर से शुरु की और अक्सर दोहरे मापदंड अपनाए। उनके मानवधिकार(ह्यूमन राइट्स) राजनीतिक नेताओं और पूंजीवादियों(कैपिटलिस्ट्स) के कंट्रोल में हैं जबकि इस्लाम ने शुरुआत से सार्वभौमिक (यूनिवर्सल) स्तर पर बिना रंग-नस्ल-धर्म के भेदभाव के इंसान को उसके अधिकार दिए। इस्लामी मानवाधिकार सिर्फ काग़ज़ी नहीं, बल्कि लागू किए गए जो उच्च परिणाम के साथ व्यवहार में आए। अब सवाल यह उठता है कि असल में क्या पश्चिमी देशों में इंसानों के लिए कोई अधिकार (हुक़ूक़) हैं?


 रज़िया मसूद

सोशल एक्टिविस्ट, भोपाल मध्य प्रदेश

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