मानवाधिकार और कुरआन
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दिव्य ज्योति

मानवाधिकार और कुरआन


يٰۤـاَيُّهَا الَّذِيۡنَ اٰمَنُوۡا كُوۡنُوۡا قَوَّا امِيۡنَ لِلّٰهِ شُهَدَآءَ بِالۡقِسۡطِ‌ ۖ وَلَا يَجۡرِمَنَّكُمۡ شَنَاٰنُ قَوۡمٍ عَلٰٓى اَ لَّا تَعۡدِلُوۡا‌ ؕ اِعۡدِلُوۡا هُوَ اَقۡرَبُ لِلتَّقۡوٰى‌ وَاتَّقُوا اللّٰهَ‌ ؕ اِنَّ اللّٰهَ خَبِيۡرٌۢ تَعۡمَلُوۡنَ ۞

“ऐ ईमानवालो! अल्लाह की ख़ातिर हक़ पर क़ायम रहने वाले और इंसाफ़ की गवाही देने वाले बनो।” – (कुरआन 5:8)

مِنۡ اَجۡلِ ذٰ لِكَ ‌ ۚكَتَبۡنَا عَلٰى بَنِىۡۤ اِسۡرَآءِيۡلَ اَنَّهٗ مَنۡ قَتَلَ نَفۡسًۢا بِغَيۡرِ نَفۡسٍ اَوۡ فَسَادٍ فِى الۡاَرۡضِ فَكَاَنَّمَا قَتَلَ النَّاسَ جَمِيۡعًا ؕ وَمَنۡ اَحۡيَاهَا فَكَاَنَّمَاۤ اَحۡيَا النَّاسَ جَمِيۡعًا ‌ؕ وَلَـقَدۡ جَآءَتۡهُمۡ رُسُلُنَا بِالۡبَيِّنٰتِ ثُمَّ اِنَّ كَثِيۡرًا مِّنۡهُمۡ بَعۡدَ ذٰ لِكَ فِى الۡاَرۡضِ لَمُسۡرِفُوۡنَ ۞

“जिस ने किसी इंसान को ख़ून के बदले या ज़मीन में फ़साद फ़ैलाने के सिवा किसी और वजह से कत्ल किया उसने मानो तमाम इंसानों को कत्ल कर दिया और जिस ने किसी की जान बचाई उसने मानो तमाम इंसानों को ज़िंदगी बख़्श दी।” – (कुरआन 5:32)

وَلَا تَقۡتُلُوا النَّفۡسَ الَّتِىۡ حَرَّمَ اللّٰهُ اِلَّا بِالۡحَـقِّ‌ ؕ وَمَنۡ قُتِلَ مَظۡلُوۡمًا فَقَدۡ جَعَلۡنَا لِـوَلِيِّهٖ سُلۡطٰنًا فَلَا يُسۡرِفْ فِّى الۡقَتۡلِ‌ ؕ اِنَّهٗ كَانَ مَنۡصُوۡرًا ۞

“किसी जान को जिसे मारना अल्लाह ने हराम कर दिया है हरगिज़ नाहक़ कत्ल ना करना।” (कुरआन 17:33)

 संपादन प्रभाग

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