इमाम अबू हनीफ़ा और शराबी पड़ोसी
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इस्लामी किस्से

इमाम अबू हनीफ़ा और शराबी पड़ोसी

इमम अबू हनीफ़ा रह० अपनी रातें इबादत में बिताने और तहज्जुद (मध्य-रात्रि के बाद की नमाज़) के दौरन कुरआन पढ़ने के लिए जाने जाते थे। उनके एक पड़ोसी को शराब की लत थी। लगभग हर रात वह आदमी ख़ूब शराब पीता और ऊंची आवाज़ में गाने गाकर उनकी इबादत में रुकावट पैदा करता। स्वाभाविक रुप से इमाम साहब को उससे परेशानी होती थी लेकिन उन्होंने इसे धैर्य के साथ सहन किया।

एक रात अचानक से शोर थम गया। इमाम अबू हनीफ़ा को उस शराबी की चिंता हुई, पड़ोसियों से पूछताछ की तो पता चला कि उसे गिरफ्तार कर लिया गया है और वह जेल में है। इमाम अबू हनीफ़ा उस समय के सबसे सम्मानित नागरिक और शहर के न्यायधीश (काज़ी) थे। लेकिन इसके बावजूद पता चलते ही तुरंत जेल गए। जब जेल पहुंचे तो जेल प्रशासन उन्हें देखकर दंग रह गया। कारण पूछा तो पता चला कि उस शराबी कैदी से मिलने आए हैं। इमाम साहब को देखकर उनके सम्मान में जेल प्रशासक ने तुंरत उस शराबी को रिहा कर दिया।

इमाम अबू हनीफ़ा का यह बर्ताव देख पड़ोसी दंग रह गया। उसने आश्चर्यचकित होकर इमाम साहब से पूछाः

आपने मेरे लिए ऐसा क्यों किया?”

इमाम ने उत्तर दियाः क्योंकि मेरे पड़ोसी होने के नाते आपका मुझ पर अधिकार है जिसे मैं कभी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता था।

इन सरल लेकिन व्यापक शब्दों ने उस शराबी को बदलकर रख दिया। वह इमाम साहब की सहानुभूति और चिंता से इतना प्रभावित हुआ कि सच्चे मन से अल्लाह के सामने तौबा कर अपने गुनाहों का पश्चाताप किया और शराब हमेशा के लिए छोड़ दी।

इमाम अबू हनीफ़ा रह० के इस व्यवहार से हमें यह शिक्षा मिलती है कि इस्लाम में पड़ोसियों को कितना महत्व दिया गया है। यदि कोई पड़ोसी परेशान करने वाला या तुच्छ भी हो तो भी उसके अधिकारों की रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है। एक सच्चा आस्तिक धैर्य, चिंता और दया दिखाता है। क्योंकि कभी-कभी दया का एक छोटा सा कार्य दूसरों के हृदय परिवर्तन का कारण बन सकता है। मज़बूत पड़ोस और मज़बूत समाज एक-दूसरे की उपेक्षा करके नहीं, बल्कि एक-दूसरे की परवाह करके बनते हैं।


एक पड़ोसी की शिकायत

हज़रत अबू हुरैरा रज़ि० से रिवायत है कि एक व्यक्ति पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्ल० के पास आया और अपने पड़ोसी की शिकायत की। आप सल्ल० ने फ़रमायाः “जाओ और धैर्य रखो।” कुछ दिनों के बाद वह दूसरी बार हज़रत मुहम्मद सल्ल० के पास आया, उन्होंने फ़िर उसे धैर्य रखने की सलाह दी। कुछ समय बाद वह तीसरी बार आया और आप सल्ल० के सामने शिकायत की तो उन्होंने कहाः “जाओ, अपना सामान निकालकर सड़क पर फेंक दो।” उस व्यक्ति ने ऐसा ही किया। जो भी वहां से गुज़रता उससे वह अपने पड़ोसी की परेशानियों के बारे बताता। उसकी बातें सुनकर लोग उसके पड़ोसी को कोसने लगे। लोग कहतेः “अल्लाह उसके साथ ऐसा करे, या उसके साथ वैसा करे।” 

लोगों को कोसते देख उस पड़ोसी से रहा नहीं गया और वह उस व्यक्ति के पास आया और कहने लगाः “अपना सामान घर में वापस रख दो। अब मैं ऐसा कुछ नहीं करुंगा जिससे तुम्हें कोई तक़लीफ पहुंचे।”

शिकायत करने वाले ने वैसा ही किया जैसा उसे बताया गया था। यह सोचकर कि पैंगबर हज़रत मुहम्मद सल्ल० उस पीड़ित व्यक्ति को हमेशा धैर्य रखने की सलाह देंगे। उस दुष्ट पड़ोसी ने उसे तब तक नज़रअंदाज़ किया जब तक कि बात नहीं बन गई। जब बात अत्याचार का विरोध करने और अपने अधिकारों की रक्षा करने की हो, तो इस्लाम में अपराधी के प्रति कोई सम्मान नहीं है। परिणामस्वरुप, जब उसे मामले की गंभीरता का एहसास हुआ, तो उसने माफ़ी मांगी, अपने पड़ोसी से विनती की और उससे अपना सामान अपने घर में वापस रखने का अनुरोध किया। साथ ही उसने अपने पड़ोसियों को और परेशान ना करने का वचन भी दिया।

संदर्भः सुनन अबू दाऊद, किताब अदब, अध्यायः फि हक़्कुल जवार, हदीस नंबर 5153 


संपादन प्रभाग

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