सहयात्री के अधिकार व इस्लामी किस्से
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समाज

सहयात्री के अधिकार व इस्लामी किस्से

इस्लाम एक ऐसा धर्म है जो जीवन के हर क्षेत्र में हमारा मार्गदर्शन करता है, फिर चाहे मामला राजनीतिक हो या सामाजिक, आर्थिक हो या अध्यात्मिक, निजी हो या सामूहिक। हर क्षेत्र में हमारे लिए इस्लाम ने मार्गदर्शन उपलब्ध करा दिया है। हमें हमारे अधिकार बता दिए हैं। इसी में से एक है पड़ोसी का अधिकार। पड़ोसी चाहे जो हो, वह हमारे पड़ोस में रहने वाला परिवार भी हो सकता है, क्लास में पढ़ने वाला सहपाठी भी हो सकता है, या फिर सफर के दौरान हमारा सहयात्री भी हो सकता है। 

जिस प्रकार हम पर अल्लाह तआला के अधिकार (हुक़ूक़) हैं उसी प्रकार हम पर बंदों के भी अधिकार हैं। वह लोग परिचित हों या अपरिचित,घर में हों या घर से बाहर किसी सफ़र में,या कहीं और हमें हर जगह उन अधिकारों को पूरा करना होता है। 

आइए विस्तार से जानते हैं इस्लाम में दिए गए सहयात्री के अधिकार के संबंध मेः-

सहयात्री का अर्थ होता है यात्रा का साथी

क़ुरआन की सूरह निसा में साहिब अल-जंब आया है यानी पास बैठने वाले। वह व्यक्ति जो थोड़े समय के लिए या अस्थायी तौर पर साथ हो, इसमें सहयात्री भी शामिल है। उनके साथ अच्छा व्यवहार (सुलूक) करने के लिए कहा गया है।

यात्रा के दौरान हमारे आस पास कई लोग होते हैं कुछ परिचित भी हो सकते हैं और कुछ अजनबी भी। हमें उन सब के साथ अच्छे अख़लाक से पेश आना चाहिए, चाहे वह मुसलमान हों या किसी अन्य धर्म के। 

किसी को भी किसी तरह की तकलीफ़ न दें। अगर किसी को कोई परेशानी हो तो उसकी परेशानी दूर करने की कोशिश करें। दूसरों के आराम का ध्यान रखें। अपनी ज़बान और हाथ से किसी को तकलीफ़ न दें।

अगर किसी को मदद की ज़रूरत हो तो मदद कर दें। अपने पास बैठने के लिए जगह दें। (बात चीत करें) खाते समय आपस में मिल बांट कर खाएं।

शोर हंगामा न करें, कोई बुज़ुर्ग या महिला हो तो सामान उठाने में, उठने बैठने में उसकी मदद करें।

सम्मान और नम्रता से पेश आएं. आजकल हमारे समाज में एक दूसरे के प्रति नफरत बेहद बढ़ गई है, लोग अपने सहयात्री को भी नफ़रत भरी नज़रों से देखते हैं, ऐसे में हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि हम अपने साथ सफर करने वाले के प्रति प्रेम और सम्मान की भावना रखें।


इफ़्फ़त फ़ारूक़ 

सवाई माधोपुर, राजस्थान

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