शाबाशी
मैडम अपनी कक्षा के सभी बच्चों का गृहकार्य जाँचकर उन्हें उनकी कॉपियाँ वापस कर रही थीं। उन्होंने एक कॉपी उठाते हुए गुङिया को पुकारा। गुङिया को पहले से ही अंदाज़ा था कि आज उसके कई जवाब गलत हो सकते हैं, इसलिए वह डर से सहम गई।
वह काँपते कदमों से मैडम के पास पहुँची। उसकी नज़र कॉपी पर लाल पेन से लगे गलती (×) के निशान पर टिक गई। मैडम ने उससे कुछ पूछना चाहा, तो उसकी ज़बान गूँगी होकर रह गई। शब्द होंठों पर आकर अटक गए।
“मै... मै... डम, मे... मे... री ग़ल... ती...”
फिर वह रोने लगी।
मैडम ने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा। उसे ढांढस बँधाया और कहा, “कॉपी के नीचे देखो, तुम रो क्यों रही हो? हमने तो तुम्हें शाबाशी दी है।”
गुङिया की नज़र नीचे लिखे रिमार्क्स पर जम गई।
“Very Good”
अब उसका हौसला बढ़ गया था। वह बोली, “मैडम! आपने शाबाशी क्यों दी है? मुझसे तो कई गलतियाँ हुई हैं।”
मैडम ने उसे प्यार से पुचकारते हुए कहा:
“बेटा! तुमसे गलती हुई है, कोई पाप तो नहीं हुआ। गलती तो कोशिश करने वालों से होती है। दौड़ने वाला ही गिरता है। जो दौड़ेगा ही नहीं, वह गिरेगा भी नहीं। तुम्हारी यही कोशिश तुम्हें सफल बना देगी। गलती करना कोई ऐब नहीं है, पाप करना ऐब है।”
मैडम की इस बात ने गुङिया की ज़िंदगी बदल दी थी। उसके अंदर का भय और डर समाप्त हो चुका था। एक नए हौसले और उम्मीद ने उसके अंदर शक्ति भर दी थी।
अब मैडम उसकी केवल शिक्षिका नहीं थीं, बल्कि एक ऐसी माँ थीं, जिन्होंने उसे एक नई ज़िंदगी दी थी।
कोई दिन ऐसा नहीं गुज़रता था, जब उसे मैडम की बात याद न आती हो।
आज 14 साल बाद गुङिया का M.B.B.S. का परिणाम आया था। उसने पूरे कॉलेज में टॉप किया था।
वह चादर से अपना मुँह ढँके खुशी से रो रही थी और अपनी उस मैडम को याद कर रही थी, जिनके एक वाक्य ने उसे सफलता की मज़िंल तक पहुंचा दिया था।
मौलाना सिराजुद्दीन नदवी
नई दिल्ली