बच्चे समाज का महत्वपूर्ण अंग हैं
बच्चे किसी भी समाज का वह भाग होते हैं जिन पर देश व दुनिया का भविष्य टिका होता है। यदि बचपन में सही मार्गदर्शन ना मिले तो केवल बच्चे का भविष्य ही नहीं बल्कि समाज का भी नुकसान होता है। यही कारण है कि दुनिया के अधिकांश विद्वानों ने बच्चों की शिक्षा, संस्कार एवं बच्चों के साथ अच्छे बर्ताव पर ज़ोर दिया है।
“जो छोटों पर रहम नहीं करता वह हम में से नहीं” – हज़रत मुहम्मद सल्ल०
“बाल्यावस्था ही जीवन का सुनहरा काल है, इसे प्यार से संवारो।” मुंशी प्रेमचंद
“इंसानियत के बारे में हमारी असली पहचान बच्चों के साथ हमारे बर्ताव से होती है।” नेल्सन मंडेला
“बच्चे को जैसा सिखाओगे, वैसा ही वह समाज को सिखाएगा” – स्वामी विवेकानंद
“आज के बच्चे कल के भारत का निर्माण करेंगे।” – जवाहरलाल नेहरु
वर्तमान समय में बच्चों को उचित मार्गदर्शन व उनका सही शिक्षण, संस्कार माता-पिता के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है। अकसर मां-बाप इसी बात से परेशान रहते हैं कि उनका बच्चा ज़िद्दी, बिगड़ैल होता जा रहा है, उसे बड़ों का आदर सम्मान करना नहीं आता। बड़ों के समझाने पर वह गुस्सा करने लगता, किसी चीज़ के लिए रोकने पर उसका बर्ताव और बुरा हो जाता है। जबकि पहले के ज़माने में ऐसा नहीं होता था। बच्चे बड़ों की बात मानते थे, उनका सम्मान किया करते थे।
बच्चों के इस बदलते स्वभाव पर दुनिया भर में विभिन्न प्रकार के शोध हो रहे हैं, नई-नई रिसर्च सामने आ रही है, अभिभावक भी काउंसलर, विशेषज्ञों के पास जा रहे हैं और उनके दिए हुआ दिशा निर्देशों का पालन कर रहे हैं। लेकिन मूल समस्या यह है कि बच्चों के इस स्वभाव का कारण उन्हें उचित माहौल नहीं मिल पाना है। विशेषज्ञ भी यही सलाह देते हैं कि बच्चों को स्वस्थ्य वातावरण उपलब्ध कराया जाए। और स्वस्थ वातावरण के लिए कुछ चीज़ें आवश्यक होती हैं।
जैसेः- स्वस्थ्य साहित्य, लेख, वीडियो, रील, दिमाग को तेज़ करने वाली गतिविधियां, प्रतिस्पर्धाएं, इनडोर, आउटडोर गेम्स इत्यादि। जो कि वर्तमान समय में दुर्लभ होते जा रहे हैं, बच्चो का अधिकांश समय गैजेट्स, वीडियो गेम इत्यादि में गुज़रता है।
इसलिए इस बार नवंबर 2026 के अंक में आभा टीम ने बाल दिवस विशेषांक निकालने का निर्णय लिया। ताकि हम बाल मनोविज्ञान के अनुरुप चुनिंदा साहित्य, लेख एवं कुछ बच्चों को आकर्षित करने वाली गतिविधियां प्रस्तुत कर सकें जिसके द्वारा अभिभावक अपने बच्चों का मार्गदर्शन करें। इसके अतिरिक्त हमारा उद्देश्य यह भी है कि हम इस विशेषांक के माध्यम से बच्चों में पढ़ने की प्रवृत्ति को बल देने का प्रयास करें।
इसलिए इस अंक में बच्चों के लिए कहानियां लेख एवं रचनाएं तो है हीं, साथ में अभिभावकों के लिए भी कुछ लेख मौजूद हैं जो उनके लिए लाभकारी साबित हो सकते हैं। वैसे भी बच्चों की परवरिश पर हम आभा में आपके लिए समय समय पर विशेषज्ञों के लेख एवं दिशा निर्देश लाते रहते हैं, हमारा प्रयास होता है कि आभा के पाठकों तक वह रचना पहुंचाई जा सके जिसकी वर्तमान समय में उन्हें आवश्यकता है। इस बार का यह अंक उसी प्रयास का एक हिस्सा है।
हम आशा करते हैं कि यह अंक आपको पसंद आएगा। इसके द्वारा आप बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय व्यतीत कर सकेंगे। बच्चों से कहानियां पढ़वाइए, एक्टिविटी करवाइए और शिक्षा दिवस पर जो प्रतियोगिता रखी गई है उसमें बच्चों को भाग लेने के लिए प्रेरित करिए।
अपनी इस प्रिय पत्रिका को आगे बढ़ाने एवं जन सुलभ बनाने में सहयोग प्रदान करें। धन्यवाद!
सहीफ़ा ख़ान
उप संपादक