बच्चे के स्वभाव पर माहौल का प्रभाव
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परिवार

बच्चे के स्वभाव पर माहौल का प्रभाव


मेरा बच्चा बहुत ज़िद्दी हो गया है, खाना भी नहीं खाता और जो चीज़ उसे चाहिए वह लिए बिना शांत नहीं होता। अपने खिलौने से बहुत जल्दी बोर हो जाता है, तोड़फोड़ करने लगता है। स्कूल से भी शिकायत आ रही है कि अपने दोस्तों को दांत काट लेता है या नाखुन से नोच लेता है।

पूरी बात सुनने के बाद हमें यह महसूस हुआ कि यह इस बात का संकेत है कि घर का माहौल सही नहीं है। बड़ों की ओर से बच्चे पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है, जिस कारण बच्चा इस प्रकार का बर्ताव कर रहा है।

बच्चे की परवरिश केवल उसे ख़ाना खिलाना, स्कूल भेजना, कपड़े पहनाना और उसकी ज़रुरतों को पूरा करने का नाम नहीं है। बच्चे का व्यक्तित्व हर पल विकसित हो रहा होता है। घर का माहौल, माता-पिता का बर्ताव, बातचीत का अंदाज़, ध्यान, प्रेम, आलोचना, स्क्रीन का इस्तेमाल, खेलने के अवसर, यहां तक कि माता-पिता के आपसी संबंध भी बच्चे के मस्तिष्क, भावना और बर्ताव पर प्रभाव डालते हैं। 

माता-पिता अकसर उस समय परेशान होकर विशेषज्ञ की ओर भागते हैं जब बच्चा अचानक ज़िद्दी, चिड़चिड़ा, शांत या माता-पिता से दूर होने लगता है। लेकिन बच्चे के स्वभाव में आने वाले हर बदलाव के पीछे ज़रुरी नहीं कि कोई एक बड़ी घटना हो। कभी-कभी दिनभर की छोटी छोटी आदतें, जो बड़ों को मामूली लगती हैं बच्चे के स्वभाव और व्यक्तित्व पर निरंतर प्रभाव डाल रही होती हैं।

बच्चा स्वभाविक रुप से मासूमियत, मुहब्बत, सच्चाई, जिज्ञासा और सीखने की प्रतिभा के साथ दुनिया में आता है। उसे हर पल किसी बनावटी दिखावे की ज़रुरत नहीं होती। उसे अपनी दुनिया की खोज करने के लिए समय, आज़ादी, संबंध, बातचीत, खेल, प्रकृति, खोज लगाने, जिज्ञासा शांत करने के लिए कभी खामोशी की, कभी आज़ादी की, कभी बिना डरे प्रयोग करने की और सबसे बढ़कर सुरक्षित एवं शांत माहौल की आवश्यकता होती है। 

समस्या उस समय उत्पन्न होती है जब हम बच्चे के शांत संकेतों को समझने के बजाय केवल उसके बर्ताव को ठीक करने का प्रयास करते हैं। बच्चे का रवैया हमारे लिए अलार्म होता है कि हम उसके व्यक्तित्व पर पड़ने वाले प्रभाव के कारण को अपने घर में तलाश करें, लेकिन हम उन कारणों की तलाश के बजाय बच्चे का व्यवहार ठीक करने का प्रयास करने लगते हैं। उसे डांटना चाहते हैं, उसे समझाना चाहते हैं, रास्ता दिखाने का प्रयास करते हैं और कभी-कभी तो माता-पिता अपने इशारे पर नाचने वाले बच्चे से संतुष्ट होते हैं।

आजकल की समस्या यह भी है कि माता-पिता को हर समस्या का हल केवल मोबाईल में दिखता है। वे बच्चों को मोबाईल देकर बिठा देते हैं और संतुष्ट रहते हैं कि बच्चा शरारत नहीं कर रहा। बच्चा घर गंदा नहीं कर रहा, वह इलेक्ट्रिक में हाथ नहीं डाल रहा, बहुत आराम है कि मां को अब उलझन कम है कि वह मोबाईल में व्यस्त है।

बच्चे को व्यस्त रखने के लिए स्थायी समाधान

आज गैजेट्स, मोबाईल, टीवी, टैब या लैपटॉप बच्चों की ज़िंदगी का अनिवार्य अंग बन चुका है। समय का एक बड़ा हिस्सा मोबाईल, टैबलेट, टीवी, कार्टून और तेज़ रफ़्तार डिजिटल समान के बीच गुज़र रहा है। स्क्रीन बड़ों के लिए भी घातक है, लेकिन बच्चे के लिए यह और ज़्यादा घातक है। बच्चे का शारीरिक व मानसिक विकास, सामाजिक, शैक्षिक प्रगति के लिए ज़रुरी है कि वह वास्तविक माहौल में खेले, बातचीत, शारीरिक गतिविधियों में लिप्त रहे, सामान पाने के लिए लड़े, और चीज़ों को जोड़ तोड़ कर अनुभव प्राप्त करे, लेकिन जब इन सारे अवसरों से बच्चा वंचित रहेगा तब समस्या उत्पन्न होती है।

स्क्रीन का प्रयोग बच्चे उसी घर में करते हैं जहां माता-पिता के पास बच्चों के लिए समय नहीं होता, या माता-पिता इसके नुकसान को नहीं जानते। बच्चे के हर बार रोने, बोर होने या शांत हो जाने पर मोबाईल थमा देना उसे अपनी भावनाओं और बोरियत से निपटने के प्राकृतिक तरीके सीखने से वंचित कर सकता है।

बच्चे को कभी-कभी शांत बैठने, सोचने, जानकारी जुटाने और स्वयं से खेल बनाने की भी आवश्यकता होती है। अगर हर खाली पल स्क्रीन से भर दिया जाए तो उसके लिए इंतज़ार, सब्र और स्वयं को व्यस्त रखने की कला की प्रैक्टिस कम हो जाती है।

खिलौने और सामान की भीड़

यह बात भी याद रहे कि खिलौने एवं हर सुविधा की उपलब्धता बच्चे को लापरवाह, ज़िद्दी, चीज़ों को महत्वहीन समझने वाला बना देती है। इसलिए खिलौना देने के बाद नज़र रखी जाए कि बच्चे को जो खिलौना दिया गया है उसका वह परिणाम मिल रहा है या नहीं जिस कारण दिया गया था। 

खिलौने का ढेर लगा देना भी बच्चे के स्वभाव को प्रभावित कर सकता है। हालांकि मां-बाप का उद्देश्य खिलौना देकर बच्चे को खुश करना होता है, लेकिन बच्चे को एक समय में बहुत ज़्यादा चीज़ें मिल जाने से रचनात्मक अंदाज़ में सोचने का मौका कम हो जाता है। इस कारण बच्चे को ढेर सारा खिलौना देने के बजाय कुछ चिन्हित चीज़ों में से चुनाव करने देना उसे ज़्यादा अच्छे से खेलने और रचनात्मकता के साथ चिंतन मनन करने का अवसर उपलब्ध करा सकता है। कभी एक साधारण सा डिब्बा, कुछ रंग, मिट्टी, लकड़ी के ब्लॉक् या घर के बर्तन बच्चे के लिए महंगे खिलौने से ज़्यादा रचनात्मक अवसर पैदा कर सकते हैं। 

वास्तविक उद्देश्य खिलौनों की संख्या नहीं बल्कि बच्चे के खेल के स्तर और उसमें उसकी सक्रियता महत्वपूर्ण है। पुराने समय को याद करिए, घरों में लड़कियां घर-घर खेलती थीं, किचन के बर्तन जमाना, खाना पकाना काल्पनिक दुनिया में एक कुशल गृहिणी की नकल समान था। बच्चा अपने बड़ों की नकल करता था, जिससे बच्चे में कर्तव्य बोध का विकास होता था और आगे ज़िंदगी में वह अपने कर्तव्य के प्रति जागरुक बनता था। 

इसी प्रकार बच्चों को खेल खेल में सीखने के गुण सिखाने चाहिए, विशेषरुप से लड़कों को अपने पेंसिल, रबर, टिफ़िन इत्यादि संभाल कर रखना, बिना कारण पेज ना फाड़ना आदि सिखाना चाहिए। आप मोबाईल इस्तेमाल करने वाले बच्चों को इस मामले में लापरवाह पाएंगे, उनमें छोटी छोटी चीज़ों का ध्यान देने का सलीका नहीं आ पाता है।

स्वयं सोचने और पड़ताल करने का अवसर

जब बच्चा किसी चीज़ को तलाश कर रहा हो, स्वयं से खेल रहा हो या किसी मुद्दे का हल ढूंढने का प्रयास कर रहा हो तो माता-पिता का हर चंद सेकेंड बाद बीच में टोकना उसके प्रयोग को सीमित कर सकता है। “ऐसे करो” “यहां रखो” “यह गलत है” “मैं बताती हूं” जैसे शब्द बच्चे को यह संदेश देते हैं कि हर काम का सही तरीका केवल बड़े जानते हैं। ऐसा करने के बजाय बच्चे को उचित सीमा के अंदर प्रयोग करने दें। 

यदि वह सुरक्षित तरीके से किसी मुद्दे को हल करने का प्रयास कर रहा है तो तुरंत हल बताने के बजाय उसे सोचने का मौका दें। यहीं छोटे छोटे प्रयोग आगे चल कर आत्मविश्वास और समस्या हल करने की प्रतिभा की नींव डालते हैं। आप दिमाग को शांत करने वाले खेल जैसे एक बर्तन में चावल डाल कर उसको चम्मच से बोतल भरने को दें सकते हैं, इससे उसमें ठहराव आएगा, लेकिन बीच में निर्देश ना दें कि, गिराओ नहीं, धीरे धीरे डालो, यह निर्देश उसके प्रयोग और गलती करके सीखने को कम कर देता है।

ज़रुरत से ज़्यादा तारीफ़

माता-पिता को जब हम मार्गदर्शन देते हैं कि बच्चे की तारीफ़ कीजिए ताकि आत्मविश्वास बढ़े तो वह बढ़ा चढ़ाकर या कभी झूठी तारीफ़ करने लगते हैं। याद रहे जब किसी टीचर से मात-पिता झूठ बोलते हैं कि बच्चा मोबाईल नहीं देखता तो बच्चे के मन में यह संदेश जाता है कि झूठ बोलकर धोखा दिया जा सकता है, बच्चे की परवरिश पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। इसी प्रकार छोटी सफ़लता पर बनावटी या बढ़ चढ़कर तारीफ़ करना भी ज़रुरी नहीं कि हमेशा सही साबित हो। 

बच्चे को हर काम पर केवल “वाह! तुम तो सबसे बेहतरीन हो” कहने के बजाय उसकी कोशिश और मेहनत को महसूस करना ज़्यादा प्रभावकारी बनाता है। जैसे कि यह कहना “तुमने मुश्किल काम को दोबारा कोशिश कर पूरा किया” बच्चे को मेहनत और प्रयास के महत्व को समझाता है। इस प्रकार बच्चा केवल दूसरों की तारीफ का मोहताज होने के बजाय अपने प्रयास के महत्व को सीखता है। 

बच्चे के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव लगातार आलोचना, दूसरों से तुलना और उपदेश (नसीहत) का होता है। “देखो फलां बच्चा कितना अच्छा है” “तुम उससे क्यों नहीं सीखते?” “तुमसे तो कुछ नहीं होगा” जैसे शब्द भले ही माता-पिता अच्छे के लिए बोलें लेकिन बार बार सुनने से बच्चा दूसरों के पैमाने से नापना शुरु कर सकता है। उसे यह महसूस होने लगता है कि माता-पिता की मुहब्बत उसके व्यक्तित्व से नहीं बल्कि उसके कामों से जुड़ी है। इसके परिणामस्वरुप वह आत्मविश्वास की कमी, असफ़लता का डर, दूसरों से जलन या दूसरों से हर काम की अनुमति लेने के रुझान में लिप्त हो सकता है।

झूठ और वादा तोड़ना

इसी प्रकार बच्चे की भावनाओं को नज़रअंदाज़ करना माता-पिता एवं बच्चे के संबंध में दूरी ला सकता है। जब बच्चा रो रहा हो और हम तुरंत कहें “बस करो, इसमें रोने की क्या बात है,” या जब वह परेशान हो और हम कहें, “फालतू का ड्रामा कर रहे हो,” तो हम उसकी समस्या हल करने के बजाय उसकी भावनाओं को झूठला रहे होते हैं। बच्चे की हर इच्छा पूरी करना ज़रुरी नहीं, लेकिन उसकी भावनाओं को स्वीकार करना ज़रुरी है। 

“मैं देख रही हूं कि आप बहुत परेशान हैं” “आपको यह बात बुरी लगी है,” “आइए पहले हमें बताइए कि हुआ क्या है,” जैसे शब्द बच्चे को यह एहसास देते हैं कि उसकी भावनाओं पर ध्यान दिया जा रहा है। बच्चे की भावनाओं को समझने वाले माता-पिता बच्चे को दूसरों की भावनाओं को समझना सिखाते हैं। जो बच्चे जितना ज़्यादा भावनात्मक रुप से सुरक्षित महसूस करते हैं, वह बड़े होकर उतना ही महत्व दूसरे की भावनाओं को देते हैं।

तुरंत हर इच्छा पूरी करना

हद से ज़्यादा सुरक्षा और हर इच्छा को तुरंत पूरा करना भी विचार योग्य है। माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा हर परेशानी से दूर रहे। लेकिन ज़िंदगी में हर निराशा और असफलता से बचाना संभव नहीं है। यदि हर इच्छा तुरंत पूरी हो, हर परेशानी माता-पिता स्वयं हल कर दें और बच्चे को इंतज़ार या प्रयास करने का मौका ना मिले तो वह सहनशीलता और इंतज़ार का अनुभव नहीं कर पाएगा। उचित सीमा के साथ बच्चे को इंतज़ार, प्रयास, छोटी असफ़लता और पुनः प्रयास का मौका देना उसको भावनात्मक रुप से मज़बूत बनाने में मदद कर सकता है।

उसके विपरीत प्राकृतिक माहौल, खेल एवं सादगी बच्चे के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। मिट्टी में खेलना, पौधों को पानी देना, परिंदों को देखना, साइकिल चलाना, दौड़ना, लकड़ी के टुकड़ों से कुछ बनाना, कहानी सुनना या माता-पिता के साथ बैठकर साधारण बातचीत करना बच्चे के अनुभव को बढ़ाता है। हर गतिविधि का उद्देश्य शिक्षा होना ज़रुरी नहीं। कभी-कभी बच्चे के साथ केवल मौजूद रहना ही संबंध के निर्माण का एक महत्वपूर्ण स्त्रोत होता है।

माता-पिता की भावनात्मक उपस्थिति

लारा और जैक एक साइकोलॉजिस्ट हैं। सोशल मीडिया पर हमारे दोस्त हैं, लारा कहती हैं “मैं एक वर्किंग वीमन हूं लेकिन जिस दिन मेरे बेटे या पति के हाथ से कांच का ग्लास या प्लेट टूट जाए तो मैं उस दिन स्वयं से कहती हूं कि मेरे पति या बच्चे को मेरी ज़रुरत है। मैं अपने सारे प्लान कैंसिल कर देती हूं, क्योंकि ग्लास का टूटना आपके नज़दीक लापरवाही है, जबकि इस लापरवाही के पीछे ज़रुर बंदे में कोई मानसिक तनाव है जो वह किसी से शेयर नहीं कर पा रहा है और पति के लिए पत्नी, या बच्चे के लिए माता-पिता का मौजूद ना होना उसे घर में तन्हा बना देता है।” 

माता-पिता की भावनात्मक उपस्थिति इन तमाम कामों में सबसे बुनियादी है। संभव है माता-पिता और बच्चा एक ही कमरे में हों, लेकिन माता-पिता का दिमाग लगातार मोबाईल, काम, टीवी या अपनी उलझनों में व्यस्त हो। शारीरिक मौजूदगी और भावनात्मक मौजूदगी एक जैसी चीज़ नहीं। बच्चे को यह महसूस होना चाहिए कि जब वह माता-पिता से बात कर रहा है तो उसे सुना जा रहा है। रोज़ का पंद्रह या बीस मिनट भी ऐसा हो सकता है जब मोबाईल एक तरफ़ हो, टीवी बंद हो और माता-पिता सिर्फ़ बच्चे के साथ हों। 

इन कुछ मिनटों में बच्चे से पूछा जा सकता है, “आज तुम्हें सबसे अच्छी चीज़ क्या लगी,” “क्या कोई बात तुम्हें परेशान कर रही है,” “आज तुमने क्या नया देखा,” घर का भावनात्मक माहौल भी बच्चे से छिपा नहीं रहता। बच्चे बहुत ही संवेदनशील होते हैं। यदि माता-पिता के बीच लगातार तनाव, रिश्ते में बिखराव, लड़ाई, चीख-पुकार हो तो बच्चा उसे महसूस कर सकता है। चाहे उसे सीधे कुछ ना बताया जाए। इसलिए बच्चे के लिए शांतिपुर्ण घर केवल एक आराम की जगह नहीं बल्कि उसकी भावनात्मक सुरक्षा का महत्वपूर्ण अंग है।

माता-पिता को यह याद रखना चाहिए कि बच्चे हमारी बातों से ज़्यादा हमारे किरदार से सीखते हैं। यदि हम चाहते हैं कि बच्चा सब्र करे तो उसे हमारा सब्र देखना होगा, यदि हम चाहते हैं कि वह सच बोले तो उसे हमारी सच्चाई देखनी होगी, यदि हम चाहते हैं कि वह मोबाईल से दूर रहे तो उसे हमें भी अपने मोबाईल में कम समय बिताते देखना होगा, यदि हम चाहते हैं कि वह दूसरों की भावनाओं का सम्मान करे तो उसे हमारे रवैये में भी सम्मान नज़र आना चाहिए।

बच्चे की परवरिश किसी एक दिन की योजना नहीं बल्कि रोज़ाना छोटे छोटे चुनाव का हिस्सा है। हमें हर बार पूरा अभिभावक बनने की ज़रुरत नहीं, हमें केवल इतना करना है कि हम बच्चे को देखें, सुनें, समझें और अपने रवैये पर नज़र रखते रहें। बच्चे के व्यक्तित्व को बदलने से पहले अपने माहौल को देखना ज़रुरी है। शायद बच्चे की ज़िद के पीछे ध्यान देने की ज़रुरत हो, उसके शांत रहने के पीछे भावनात्मक दूरी हो, उसके चिड़चिड़ेपन के पीछे बेबसी हो और उसकी स्क्रीन से जुड़ाव के पीछे वास्तवकि संबंध की कमी हो।

डॉक्टर ख़ान मुबश्शरा फ़िरदौस

संपादक, हादिया ई मैग्ज़ीन               

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