जेन ज़ी और बदलता समाज
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चर्चा

जेन ज़ी और बदलता समाज


हर नई पीढ़ी अपने से पिछली पीढ़ी से कुछ न कुछ अलग ज़रूर होती है। उसकी भाषा अलग होती है, उसके रुझान अलग होते हैं, उसकी प्राथमिकताएँ अलग होती हैं और सबसे बढ़कर दुनिया को देखने का उसका नज़रिया अलग होता है। इन सभी बदलावों को अपनाते हुए ही दुनिया पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रही है। जो लोग इन बदलावों को महत्व नहीं देते और उन्हें स्वीकार नहीं करते, वे अक्सर अतीत में ही जीते रह जाते हैं और नई पीढ़ी को समझने में असमर्थ रहते हैं। परिणामस्वरुप, वे नई पीढ़ी से जुड़ नहीं पाते और उसके बारे में नकारात्मक धारणाओं का शिकार हो जाते हैं।

जेन ज़ी के मुद्दे पर भी कोई राय बनाते समय हमें इन बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है, क्योंकि जेन ज़ी जिस दुनिया में पैदा हुई और बड़ी हुई है, वह दुनिया भी अपने आप में एक गहरे बदलाव से गुज़र रही है। किसी भी पीढ़ी को समझने के लिए एक बुनियादी बात समझना ज़रूरी है और वह यह कि इंसानी नफ़सियात की बुनियादी ज़रूरतें पीढ़ियों के साथ नहीं बदलतीं। 

यही स्थिति जेन ज़ी की भी है। असल में उसके स्वभाव या मनोविज्ञान में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है, बल्कि समाज में आए वैचारिक और डिजिटल बदलावों की वजह से उसके स्वभाव और मनोवैज्ञानिक भावनाओं के प्रकट होने के तरीके में बदलाव आया है। उदाहरण के लिए, आज का युवा जानकारी की ऐसी दुनिया में पैदा हुआ है जहाँ जानकारी की कमी नहीं, बल्कि जानकारी की अधिकता खुद एक समस्या बन चुकी है। 

उसके सामने दुनिया भर के विचार मौजूद हैं, लेकिन इनमें से किसे सच माना जाए, किसे गलत और किसे सिर्फ एक राय माना जाए, यह सवाल पहले से कहीं अधिक जटिल हो गया है। यहीं से जेन ज़ी को समझने का एक महत्वपूर्ण बिंदु सामने आता है और वह यह कि जेन ज़ी का मूल मनोविज्ञान वही है, लेकिन उसका मनोवैज्ञानिक वातावरण ज़रूर नया है।

इस वातावरण के पीछे डिजिटल बदलाव के साथ-साथ बदलती हुई सामाजिक मान्यताएँ, व्यक्तिवाद, उत्तर-आधुनिक विचार, आर्थिक अनिश्चितता और अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) भी मौजूद हैं। एक तरफ व्यक्ति को अपनी पसंद, पहचान और आज़ादी पर पहले से अधिक अधिकार मिला है, दूसरी तरफ इसी आज़ादी के साथ अपनी पहचान खुद तय करने का दबाव भी बढ़ा है। 

पहले इंसान के पास कुछ बनी-बनाई पहचानें होती थीं; परिवार, समुदाय, धर्म, पेशा और सामाजिक परंपराएँ। आज इनमें से बहुत सी चीज़ें भी चुनाव के दायरे में आ गई हैं। यह आज़ादी एक अवसर भी है और एक मनोवैज्ञानिक बोझ भी। जब चुनाव कम हों तो इंसान शिकायत करता है कि मेरे पास अधिकार नहीं है। लेकिन जब चुनाव असीमित हो जाएँ तो एक दूसरा सवाल पैदा होता है कि मैं चुनाव क्या करूँ?

जेन ज़ी के मानसिक रवैये को समझने के लिए इस विरोधाभास को समझना बहुत ज़रूरी है। यह पीढ़ी करियर चाहती है, लेकिन करियर के साथ मकसद भी चाहती है। पैसा चाहती है, लेकिन मानसिक शांति भी। आज़ादी चाहती है, लेकिन अपनी मान्यताओं के साथ तालमेल रखने वाली ज़िंदगी भी।

Deloitte India — 2026 Gen Z and Millennial Survey के भारत से जुड़े एक सर्वे में 506 जेन ज़ी लोगों को शामिल किया गया था। सर्वे के अनुसार 99 प्रतिशत भारतीय जेन ज़ी लोगों ने कहा कि नौकरी से संतुष्टि के लिए मकसद का एहसास महत्वपूर्ण है, जबकि 54 प्रतिशत ने बताया कि आर्थिक कठिनाइयों की वजह से उन्होंने ज़िंदगी के बड़े फैसले टाल दिए हैं। यानी यह पीढ़ी सिर्फ़ “जज़्बे” की बात नहीं करती, उसके सामने आर्थिक वास्तविकता भी मौजूद है। 

वह मकसद भी चाहती है और स्थिरता भी। इसलिए जेन ज़ी को केवल “बेसब्री की पीढ़ी” कहना आसान लेकिन अधूरा विश्लेषण होगा। हो सकता है कि वह सफलता की पारंपरिक परिभाषा पर सवाल कर रही हो। हो सकता है कि उसके लिए केवल तनख़्वाह काफ़ी न हो। हो सकता है कि वह अपनी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा केवल नौकरी और रिटायरमेंट के बीच बिताने के बजाय ज़िंदगी में किसी और अर्थ की तलाश में हो। 

डिजिटल दुनिया और मनोवैज्ञानिक दबाव

डिजिटल दुनिया ने इंसान की एक पुरानी मनोवैज्ञानिक ज़रूरत, यानी दूसरों से स्वीकार किए जाने और पहचान मिलने की इच्छा, को एक ऐसी चीज़ में बदल दिया है जिसे मापा नहीं जा सकता है। पहले किसी इंसान की तारीफ़ उसके सीमित सामाजिक दायरे में होती थी। आज पसंद, लोकप्रियता और सामाजिक स्वीकार्यता को लाइक्स, कमेंट्स, व्यूज़ और फ़ॉलोअर्स की शक्ल में गिना जा सकता है। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन के यूरोपीय क्षेत्र की 2022 की एक बड़ी रिसर्च, जिसमें लगभग 2 लाख 80 हज़ार किशोर शामिल थे, के अनुसार समस्या पैदा करने वाले सोशल मीडिया इस्तेमाल, Problematic Social Media Use, की दर 2018 के 7 प्रतिशत से बढ़कर 2022 में 11 प्रतिशत हो गई। ये आँकड़े यूरोप, मध्य एशिया और कनाडा के किशोरों से संबंधित हैं, इसलिए इन्हें पूरी दुनिया की जेन ज़ी पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता, लेकिन डिजिटल वातावरण और युवाओं की भलाई के बीच बढ़ते संबंध को समझने के लिए यह एक महत्वपूर्ण संकेत ज़रूर है। 

यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना चाहिए, सोशल मीडिया ने तुलना, असुरक्षा या दूसरों से स्वीकार किए जाने की इच्छा पैदा नहीं की। ये सब इंसान हमेशा से करता आया है, बल्कि सोशल मीडिया ने इन सबको तेज़, व्यापक और निरंतर बना दिया है। इसी तरह छोटी वीडियो, REELS ने ध्यान के बिखरने का विचार पैदा नहीं किया, लेकिन हर कुछ सेकंड बाद नया कंटेंट देने वाली दुनिया में लगातार ध्यान बनाए रखना निश्चित रूप से एक नई चुनौती बन गया है।

 उत्तर-आधुनिक विचार और पहचान का सवाल


आधुनिकता ने तर्क, विज्ञान, प्रगति और कुछ सार्वभौमिक सिद्धांतों पर भरोसा पैदा किया। उत्तर-आधुनिक विचार ने इन बड़े विचारों, निश्चित दावों और स्थापित अधिकारों पर सवाल उठाए। इस वैचारिक बदलाव का एक सकारात्मक पहलू यह था कि इंसान ने हर चीज़ पर नए सिरे से सोचना शुरू किया। नई पीढ़ी में आलोचनात्मक सोच पैदा हुई। लेकिन जब हर स्थापित जवाब को सवाल बना दिया जाए और उसके बदले कोई स्पष्ट आधार उपलब्ध न कराया जाए, तो एक दूसरी समस्या भी पैदा होती है और वह यह कि अगर हर चीज़ बिना आधार की है, तो वह असली आधार क्या है जिसके आधार पर हम अपनी ज़िंदगी के फैसले करें? 

यहाँ पहचान, नैतिकता, सच्चाई और उद्देश्य के प्रश्न और अधिक जटिल हो जाते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि जेन ज़ी ज़रूर एक “उलझी हुई पीढ़ी” है। बल्कि वह ऐसे वैचारिक माहौल में बड़ी हुई है जहाँ जवाबों से ज़्यादा सवाल उपलब्ध हैं।

 कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI)

डिजिटल बदलाव ने जानकारी की अधिकता की समस्या पैदा की थी; कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने जानकारी पैदा करने को लगभग असीमित बनाने की दिशा में एक और कदम बढ़ा दिया है। आज एक युवा लेख लिखवा सकता है, तस्वीर बनवा सकता है, अनुवाद करवा सकता है, प्रोग्रामिंग करवा सकता है, रिसर्च में मदद ले सकता है और कुछ ही पलों में वह काम कर सकता है जिसके लिए कुछ समय पहले पूरी टीम की ज़रूरत पड़ती थी।

यहाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता का सवाल सिर्फ़ रोज़गार का नहीं है। अगर मशीन लिख सकती है, डिज़ाइन कर सकती है, विश्लेषण कर सकती है और रचनात्मक काम के कई हिस्से कर सकती है, तो इंसान की अपनी विशेषता क्या है? यह सवाल सिर्फ़ जेन ज़ी का सवाल नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत का सवाल है।

खतरा यह नहीं कि मशीन इंसान से ज़्यादा काम करेगी। असली खतरा यह है कि कहीं मशीन के असीमित इस्तेमाल के नतीजे में इंसान मानसिक रूप से अपाहिज न हो जाए, कहीं इंसान के सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित न हो जाए। इसलिए जेन ज़ी को कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस्तेमाल के मामले में न सिर्फ़ सावधानी की, बल्कि पर्याप्त शिक्षण देने की भी आवश्यकता है।

जेन ज़ी: चुनौती और संभावना?

जेन ज़ी की समस्याओं को केवल मानसिक दबाव, अकेलेपन और सोशल मीडिया तक सीमित कर देना भी अन्याय होगा। इस पीढ़ी के पास वे अवसर भी हैं जो पिछली पीढ़ियों को इस स्तर पर उपलब्ध नहीं थे। दुनिया के बेहतरीन शिक्षकों तक पहुँच, घर बैठे नई स्किल सीखने की आज़ादी, वैश्विक स्तर पर कारोबार और संपर्क के अवसर, अपनी आवाज़ सीधे लाखों लोगों तक पहुँचाने की क्षमता और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के ज़रिए अपनी क्षमता को कई गुना बढ़ाने की संभावना ये सब वास्तविक अवसर हैं।

लेकिन हर अवसर अपने साथ एक ज़िम्मेदारी भी लाता है। जानकारी के दौर में सबसे महत्वपूर्ण क्षमता जानकारी हासिल करना नहीं, बल्कि जानकारी को परखना है। अवसरों से भरे इस दौर में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि मैं क्या कर सकता हूँ? बल्कि यह है कि मुझे क्या करना चाहिए? और शायद यही वह जगह है जहाँ जेन ज़ी का कन्फ्यूज़न शुरू होता है।

जेन ज़ी की चुनौतियों और संभावनाओं को समझने के लिए कॉकरोच जनता पार्टी के नाम से सामने आने वाली युवाओं की मुहिम भी एक दिलचस्प केस स्टडी है। यह मुहिम शुरुआत में ऑनलाइन अभिव्यक्ति के रूप में सामने आई और बाद में विरोध-प्रदर्शन की गतिविधियों तक पहुँची। इस मुहिम से जुड़े युवाओं ने परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और शिक्षा से जुड़े मुद्दों के खिलाफ़ विरोध किया, शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े की माँग भी सामने रखी और आख़िरकार इस्तीफ़ा करवाने में कामयाब भी हुए।

इससे एक बात समझ आती है कि डिजिटल पीढ़ी केवल स्क्रीन के पीछे रहने वाली पीढ़ी नहीं है। ज़रूरत पड़ने पर यह पीढ़ी ज़मीनी आंदोलन में भी उतर सकती है। सोशल मीडिया मनोरंजन का माध्यम ज़रूर है, लेकिन वह जानकारी, बातचीत, संगठन बनाने और सामूहिक कार्रवाई का माध्यम भी बन सकता है। यह भी जेन ज़ी के बदलते सामाजिक व्यवहार का एक पहलू है। इसलिए जेन ज़ी को “राजनीति से ऊबी हुई” या “गैर-संजीदा” पीढ़ी कहना सही बात नहीं है।

दूसरी बात जो स्पष्ट रूप से सामने आती है, वह यह कि यह पीढ़ी किसी ऑथोरिटी को केवल इसलिए स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं कि वह ऑथोरिटी है। यह सवाल करती है, जवाबदेह बनाती है और वैकल्पिक माध्यम तलाशती है। यह रवैया एक ताकत भी बन सकता है और एक ख़तरा भी। ताकत तब, जब सवाल के साथ रिसर्च और आलोचनात्मक चेतना हो। ख़तरा तब, जब हर असहमति को ज़ुल्म, हर व्यक्तिगत अनुभव को सच्चाई और हर वायरल दावे को सच मान लिया जाए। क्योंकि हर सवाल समझदारी की निशानी नहीं होता और हर ऑथोरिटी पर शक करना भी आलोचनात्मक चेतना नहीं है।

अंतिम बात

आने वाले समय का सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि जब जानकारी मशीन के पास हो, रचनात्मकता में मशीन शामिल हो, फैसलों में एल्गोरिदम शामिल हों और मानवीय रिश्तों का एक बड़ा हिस्सा डिजिटल हो जाए, तो इंसान अपनी पहचान, अपनी नैतिकता, अपने रिश्तों और अपनी ज़िंदगी के मकसद को किस आधार पर तय करेगा? 

यहीं से हमें फिर उसी बुनियादी बिंदु की तरफ़ लौटना होगा, जिससे बात शुरू हुई थी। इंसान का बुनियादी मनोविज्ञान नहीं बदला है। प्यार की ज़रूरत वही है। सम्मान की ज़रूरत वही है। रिश्ते की ज़रूरत वही है। मकसद की तलाश वही है लेकिन इन ज़रूरतों के आसपास बनने वाली दुनिया बदल गई है। और शायद यही जेन ज़ी की सबसे बड़ी चुनौती भी है और सबसे बड़ा अवसर भी।


ऐसे में सबसे बड़ा सवाल उस बुनियादी ढाँचे का है, जो नई पीढ़ी के स्वभाव और मनोविज्ञान के साथ तालमेल रखता हो, जिससे नई पीढ़ी के दिल और दिमाग़ को संबोधित किया जा सके। इसलिए ऐसे ढाँचे को जेन ज़ी के सामने पेश किया जाए, उनके बीच स्वस्थ बातचीत का माहौल बनाया जाए, उनके साथ सोच-समझकर जुड़ाव पैदा किया जाए, बजाय इसके कि हम उन्हें “खराब पीढ़ी” और “क्रांतिकारी पीढ़ी” जैसे किसी एक लेबल में बंद कर दें।


जावेद कुरैशी 

स्वतंत्र लेखक, गोवा

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