दुनिया मंज़िल नहीं रास्ता है
क़ुरआन इंसान को उसके जीवन का उद्देश्य याद दिलाता है और उसे इस जीवन के साथ-साथ आख़िरत (परलोक) की तैयारी भी साथ में करने को कहता है। सूरह अत-तकासुर एक छोटी मगर बेहद प्रभावशाली सूरह है। इसमें केवल आठ आयतें हैं, लेकिन इन आठ आयतों में व्यक्ति की लापरवाही, दुनिया की चाहत, मौत, आख़िरत और अल्लाह की नेमतों की जवाबदेही का बहुत गहरा संदेश दिया गया है।
أَلْهَاكُمُ التَّكَاثُرُ
अर्थ:
“तुम्हें एक-दूसरे से बढ़कर हासिल करने की चाहत ने ग़ाफ़िल कर दिया।”
“तकासुर” का अर्थ है ज़्यादा से ज़्यादा हासिल करने की चाहत और दूसरों से आगे निकलने की होड़। इंसान के लिए मेहनत करना और हलाल रोज़ी कमाना बुरा नहीं है, लेकिन जब दुनिया की चीज़ें इंसान को अल्लाह की याद और आख़िरत से ग़ाफ़िल कर दें, तो यही “तकासुर” है।
आज इंसान बड़े घर, अधिक धन, संपत्ति, अच्छी गाड़ी, शोहरत और सामाजिक प्रतिष्ठा के पीछे भाग रहा है। एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी पैदा हो जाती है। इस तरह इंसान “मेरे पास क्या है?” से ज़्यादा “दूसरे के पास मुझसे ज़्यादा क्या है?” सोचने लगता है।
حَتَّىٰ زُرْتُمُ الْمَقَابِرَ
अर्थ:
“यहाँ तक कि तुम कब्रों तक पहुँच गए।”
दुनिया की चीज़ें जमा करने की यह दौड़ अंततः इंसान को कब्र तक पहुँचा देती है। इंसान कितना ही धन और सामान जमा कर ले, मौत के बाद इनमें से कुछ भी उसके साथ नहीं जाता। उसके साथ उसके अमल (कर्म) जाते हैं।
कब्र इंसान को उसकी असली हक़ीक़त याद दिलाती है कि दुनिया की ज़िंदगी स्थायी नहीं है। इसलिए दुनिया की तैयारी के साथ आख़िरत की तैयारी भी ज़रूरी है।
كَلَّا سَوْفَ تَعْلَمُونَ
अर्थ:
“हरगिज़ नहीं! बहुत जल्द तुम्हें मालूम हो जाएगा।”
इंसान दुनिया में रहते हुए आख़िरत को भूल सकता है और अपनी ज़िंदगी की असली मंज़िल से ग़ाफ़िल हो सकता है, लेकिन एक दिन वह हक़ीक़त उसके सामने आ जाएगी।
हम अक्सर नेक कामों को यह सोचकर टालते रहते हैं कि अभी बहुत समय है। लेकिन मौत का कोई निश्चित समय नहीं। इसलिए तौबा और नेक अमल को भविष्य पर नहीं छोड़ना चाहिए।
ثُمَّ كَلَّا سَوْفَ تَعْلَمُونَ
अर्थ:
“फिर हरगिज़ नहीं! बहुत जल्द तुम्हें मालूम हो जाएगा।”
अल्लाह तआला एक ही चेतावनी को दोहराकर उसकी गंभीरता को स्पष्ट करते हैं। एक दिन इंसान को मालूम हो जाएगा कि दुनिया की जिस दौड़ में वह अपनी पूरी ज़िंदगी लगा रहा था, उसकी असली हैसियत क्या थी।
उस दिन धन और शोहरत नहीं, बल्कि इंसान के ईमान और अमल उसके काम आएँगे।
كَلَّا لَوْ تَعْلَمُونَ عِلْمَ الْيَقِينِ
अर्थ:
“हरगिज़ नहीं! अगर तुम्हें यक़ीन का इल्म होता।”
अगर इंसान को आख़िरत और अल्लाह के सामने जवाबदेही का सच्चा यक़ीन हो जाए, तो उसकी ज़िंदगी बदल जाएगी। वह हर काम से पहले सोचेगा कि यह काम अल्लाह को पसंद है या नहीं।
आख़िरत का यक़ीन इंसान को गुनाह से रोकता और नेक कामों की तरफ़ बढ़ाता है।
لَتَرَوُنَّ الْجَحِيمَ
अर्थ:
“तुम ज़रूर जहन्नम को देखोगे।”
यह आयत इंसान को आख़िरत की हक़ीक़त और अपने अमल की जवाबदेही की याद दिलाती है। दुनिया की थोड़ी-सी ज़िंदगी के लिए ऐसे काम करना जो आख़िरत को नुकसान पहुँचाएँ, समझदारी नहीं है।
मोमिन की ज़िंदगी में आख़िरत का एहसास उसे अपने कामों पर निगरानी रखने वाला बनाता है।
ثُمَّ لَتَرَوُنَّهَا عَيْنَ الْيَقِينِ
अर्थ:
“फिर तुम उसे अपनी आँखों से यक़ीनी तौर पर देखोगे।”
आज इंसान आख़िरत को अपनी आँखों से नहीं देखता, लेकिन ईमान वाला अल्लाह की बताई हुई हक़ीक़तों पर यक़ीन रखता है। एक दिन आख़िरत की ये हक़ीक़तें उसके सामने बिल्कुल स्पष्ट हो जाएँगी।
इसलिए समझदारी यह है कि इंसान उस दिन के आने से पहले अपनी ज़िंदगी को सँवार ले।
ثُمَّ لَتُسْأَلُنَّ يَوْمَئِذٍ عَنِ النَّعِيمِ
अर्थ:
“फिर उस दिन तुमसे ज़रूर नेमतों के बारे में सवाल किया जाएगा।”
यह सूरह की आख़िरी और बहुत महत्वपूर्ण आयत है। अल्लाह ने इंसान को अनगिनत नेमतें दी हैं—ईमान, स्वास्थ्य, समय, परिवार, औलाद, घर, रोज़ी, ज्ञान और सुरक्षा।
आख़िरत में केवल यह नहीं पूछा जाएगा कि हमारे पास कितनी नेमतें थीं, बल्कि यह भी कि हमने उन नेमतों का इस्तेमाल किस तरह किया।
समय मिला तो कहाँ लगाया?
धन मिला तो कहाँ खर्च किया?
ज्ञान मिला तो उस पर कितना अमल किया?
औलाद मिली तो उनकी कैसी तरबियत की?
ईमान मिला तो उसकी कितनी क़द्र की?
सूरह अत-तकासुर का केंद्रीय संदेश
सूरह अत-तकासुर हमें दुनिया छोड़ने की शिक्षा नहीं देती, बल्कि दुनिया को उसकी सही जगह रखने की शिक्षा देती है। इंसान मेहनत करे, हलाल रोज़ी कमाए, अपने परिवार की ज़िम्मेदारियाँ निभाए और दुनिया की ज़रूरतें पूरी करे, लेकिन दुनिया की मोहब्बत उसे आख़िरत से ग़ाफ़िल न कर दे।
आज “तकासुर” की बहुत-सी शक्लें हमारे समाज में दिखाई देती हैं। दूसरों से अधिक धन, बड़ा घर, बेहतर सामान और अधिक प्रतिष्ठा हासिल करने की चाहत इंसान को बेचैन कर देती है। दूसरों से तुलना करते-करते वह अपनी ही नेमतों को भूल जाता है।
क़ुरआन हमें याद दिलाता है कि दुनिया मंज़िल नहीं, रास्ता है। असली मंज़िल आख़िरत है।
इसलिए हमें अपनी ज़िंदगी का जायज़ा लेते रहना चाहिए। हमें यह सोचना चाहिए कि हम दुनिया की चीज़ें तो जमा कर रहे हैं, लेकिन क्या हम आख़िरत के लिए भी कुछ जमा कर रहे हैं?
एक दिन दुनिया की सारी दौड़ समाप्त हो जाएगी। इंसान अकेला अपने रब के सामने खड़ा होगा। उस दिन धन, शोहरत और प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि ईमान, नेक अमल और अल्लाह की रज़ामंदी असली कामयाबी होगी।
अल्लाह तआला हमें दुनिया की ग़फ़लत से बचाए, अपनी नेमतों का शुक्र अदा करने की तौफ़ीक़ दे, आख़िरत की तैयारी करने वाला बनाए और अपनी रज़ामंदी हासिल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।
आमीन या रब्बल-आलमीन।
स्वालिहा रईस फ़लाही
लखनऊ, उत्तर प्रदेश