गांधीवादी सिद्धांत की वर्तमान उपयोगिता
महात्मा गांधी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। अलबर्ट आइंस्टीन ने एक बार महात्मा गांधी के बारे में कहा था कि आने वाली पीढ़ियां शायद ही विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई इंसान भी इस धरती पर आया था। 2 अक्टूबर को गांधी जयंती बड़े धूमधाम से मनाई जाती है और भारत समेत समूचा विश्व महात्मा गांधी के जीवन की दास्तान को याद करता है।
गांधी जी राजनीतिक और सामाजिक जीवन के साथ-साथ व्यवहारिक जीवन के लिए एक नया दार्शनिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करने वाले महान विचारक थे। उन्होंने अपना जीवन सिद्धांतों पर गुज़ारा जिसमें सत्य, अहिंसा और सर्वधर्म सम्मान प्रमुख हैं।
समस्त गांधीवादी सिद्धांत वास्तव में ऐसे सिद्धांत नहीं है जिनका स्वयं गांधी जी ने प्रतिपादन किया हो, बल्कि उन्होंने अलग अलग धर्मों की नैतिक शिक्षाओं को अपनाया और जो कुछ जीवन में उन्होंने किया या जिस राह पर चलते रहे वो उनके सिद्धांत बन गए। जब व्यक्ति जीवंत, ऊर्जावान और गतिशील होने के साथ साथ किसी भी चीज को पाने में सक्षम है तब इन सिद्धांतों का पालन करता है तो जीवन में सफल हो सकता है।
महात्मा गांधी जिनका जीवन अनेक प्रेरणादायक घटनाओं से भरा है और हर घटना अपने आप में एक विशिष्ट स्थान रखती है। उनकी एक अहिंसात्मक घटना दांडी यात्रा या नमक सत्याग्रह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में बहुत महत्वपूर्ण साबित हुई।
1929 के ब्रिटिश शासन द्वारा लगाए गए उच्च करो और नमक कानून के विरोध में महात्मा गांधी ने 12 मार्च को साबरमती आश्रम से दांडी तक 240 मील की पैदल यात्रा प्रारंभ की और 6 अप्रैल 1930 को दांडी पहुंचकर समुद्र से नमक बनाकर ब्रिटिश कानून का उल्लंघन किया। इस अहिंसात्मक आंदोलन ने देशभर में ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह को और मजबूत कर दिया।
यह घटना बताती है कि अहिंसा और सत्य के माध्यम से सामाजिक और राजनीतिक बदलाव प्राप्त किये जा सकते है। उनका मानना था कि अहिंसा के माध्यम से शत्रु को परास्त किया जा सकता है। यह सिर्फ आदर्श नहीं बल्कि जीवन जीने का मूलभूत तरीका है। हिंसा से किसी समस्या का स्थाई समाधान नहीं हो सकता इसलिए वो अहिंसा को अपने जीवन में ऊंचा स्थान देते थे।
अहिंसा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसे केवल शारीरिक क्षेत्र तक सीमित न रखा जाए बल्कि मानसिक और भावनात्मक क्षेत्र में भी उसके उपयोग को व्यक्ति अवश्य अपनाए। अर्थात व्यक्ति किसी को शारीरिक नुकसान ना पहुंचाए और साथ-साथ न दिल से किसी के बारे में बुरा सोचे और न किसी को मानसिक रूप से प्रताड़ित करे।
जब मन में छल-कपट, नफरत, धोखा धड़ी जैसी बुराइयां होती है तो मन पवित्र नहीं रहता और जब मन पवित्र ना हो तो इंसान कोई महान कार्य कदापि नहीं कर सकता क्योंकि मन की शांति के बिना कोई कार्य निर्मित नहीं किया जा सकता।
इसी प्रकार सत्य भी गांधी के सिद्धांतों का एक महत्वपूर्ण तत्व था। उनका मानना था कि सत्य केवल वार्तालाप तक सीमित नहीं बल्कि जीवन जीने का महत्वपूर्ण आधार है जिसमे ईमानदारी और नैतिकता भी शामिल है। सत्यवादी व्यक्ति इसलिए दूसरों से भिन्न है क्योंकि वो न्याय करने वाले, सभी को समान दर्जा देने वाले, सभी को बराबर हक देने वाले और किसी के साथ ज़ुल्म करने वाले नहीं होते।
सत्य का सबसे सुंदर तत्व यह है कि यह केवल वार्तालाप में ही नहीं बल्कि कार्यों और विचारों में भी दिखाई देता है। जब इंसान सत्य को अपने जीवन का आधार बनाता है तो वह निजी स्वार्थ, सामाजिक दबाव और सत्ता के भय से ऊपर उठकर सही बात कहने का साहस जुटा पाता है।
आज जबकि राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सांप्रदायिकता और धार्मिक उन्माद बढ़ रहा है, आपसी मतभेदों के कारण नफ़रत का माहौल पैदा हो गया है, राष्ट्रीय स्तर पर धार्मिक उन्माद का सबसे पीड़ादायक रूप हम सभी देख रहे है, जहां धर्म और आस्था के नाम पर दूसरे समुदाय के उपासना-स्थलों को निशाना बनाया जाता है।
उन्हें (मस्जिदों को) तोड़ना या उन्हें क्षति पहुँचाना केवल किसी इमारत को नुकसान पहुँचाना नहीं, बल्कि उन लोगों की धार्मिक भावनाओं और उनके अधिकारों को ठेस पहुँचाना है। वहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फ़िलिस्तीनियों के साथ अत्याचार और उत्पीड़न का भयावह रूप पूरी दुनिया के सामने है।
ऐसे में गांधी जी के सर्वधर्म सम्भाव का सिद्धांत अपनाकर सांप्रदायिक सौहार्द और एकता के द्वारा समाज और राष्ट्र को जोड़ने का कार्य किया जा सकता है। राजनीतिक और आर्थिक हित के लिए नफ़रतों का बाजार गर्म है, ऐसे में यदि प्रेम और करुणा, अहिंसा और नैतिकता को अपनाया जाए, जहाँ इंसान केवल अपना लाभ ना देखे बल्कि दूसरों को उनके अधिकार दे तो आपस में दिलो को जोड़ा जा सकता है।
जिस समाज में सत्य का सम्मान होता है, वहाँ नफरत, छल और दिखावे के लिए जगह कम होती जाती है, एवं आपसी विश्वास मजबूत होता है और तभी एक सुंदर समाज की नींव रखी जा सकती है।
सत्य, अहिंसा, नैतिकता और आपसी प्रेम ऐसे मूल्य है जिनकी ज़रूरत हर व्यक्ति और हर समाज को है और इनका महत्व हमारी नज़र में सबसे अधिक है। लेकिन सवाल यह है कि इंसान इन सिद्धांतों पर कब तक और किस आधार पर कायम रह सकता है?
जब सच बोलने पर खुद का हित छोड़ना पड़े, क्रोध के समय खुद को रोकना कठिन हो, जब अन्याय के विरूद्ध खड़े हो तो सामने कोई अपना हो, जब नैतिकता के रास्ते पर चले तो अपना घाटे का सौदा दिखाई दे, जब शत्रु सामने हो तो भली और अच्छी बात करना मुश्किल लगे ?
तो कौनसी आंतरिक शक्ति इंसान को इन सभी कामों के लिए विवश करेगी ?
इस्लाम इस प्रश्न का उत्तर ईश्वर (सर्वशक्तिमान) के प्रति जवाबदेही के एहसास में तलाशता है और इसी जवाबदेही को इंसान के चरित्र का आधार बनाता है।
ईश्वर से भय ही इंसान को नैतिकता पर चलने के लिए विवश करता है, उसे यकीन होता है कि मेरे अच्छे व्यवहार और कर्मों का बदला ज़रूर उसे मरने के बाद मिलने वाला है चाहे दुनिया में उसे उसका फल मिले या ना मिले। लेकिन जब यह भय समाप्त हो जाता है तो इंसान दुनियाभर में फसाद फैलाता है।
ख़ान शाहीन जाटू
संपादक