पढ़ो तो मैं कुछ लिखती हूँ
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साहित्य

पढ़ो तो मैं कुछ लिखती हूँ



पढ़ो तो मैं कुछ लिखती हूँ

अपनी ज़िंदगी में आने वाले लोगों को लिखती हूं

अपने संघर्ष की एक कहानी लिखती हूं

उनके लिए अपने फ़र्ज़ को लिखती हूं


समझो तो मैं अपनी कहानी लिखती हूं

अपने ही किरदारों को निभाती हूं

कभी बीवी कभी बहू कभी भाभी कभी मां बनकर

सबको समझती हूं,सबके लिए खुदको खो देती हूं


सुनो तो मैं कुछ गाती हूं

अपना अफसाना, अपना तराना सुनाती हूं

जहां सब तरफ़ शोर और दबी मेरी आवाज़ है

या शोर से जानबूझकर दबाई गई मेरी आवाज़ है


महसूस तो करो मैं कुछ लिखती हूं

मेरे अहसासात, मेरे जज़्बात लिखती हूं

मेरे दिल की आवाज़ लिखती हूं

अपनी राय, अपने ख्यालात लिखती हूं


अपना बचपन, अपने दोस्त अपने खेल याद करती हूं

अपना स्कूल अपना कॉलेज अपने दोस्तों और साथियों की

हर यादों की आगोश में चली जाती हूं

अपने बीते कल को सोचती हूं और मुस्कुराती हूं


बताओ मैं कुछ पूछती हूं

आज में ख़ामोश क्यों बैठी रहती हूं

क्यों मैं अपने हुक़ूक़ से दूर कर दी जाती हूं

जिनका अता करता खुदा है

जिनको तरक करता समाज हैं, लोग हैं


पढ़ो में कुछ लिखती हूं

अपनी कहानी लिखती हूं

अपनी ज़बानी लिखती हूं

खुद में छुपी हर बात लिखती हूं


नक़ाबो में छिपे वो चेहरे लिखती हूं

जिन्होंने गुम कर दिया मुझे कहीं

खोई हुई अपनी पहचान लिखती हूं

समझो मैं मुकम्मल निस्वानियत (स्त्रीत्व)लिखती हूं


इशरत जहां

स्वतंत्र लेखक, राजस्थान


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