शादी और ज़िम्मेदारी से दूर भागते युवा, क्या है समाधान?
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समाज

शादी और ज़िम्मेदारी से दूर भागते युवा, क्या है समाधान?


वर्तमान समय में जब हम समाज का अवलोकन करते हैं तो हमें युवाओं की बदलती सोच, उनकी प्राथमिकताओं और जीवन के प्रति उनके दृष्टिकोण में बड़ा परिवर्तन नज़र आता है। आज का युवा सिर्फ शादी से ही नहीं, बल्कि कई तरह की सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों से भी दूरी बनाना चाहता है। लड़का हो या लड़की, दोनों के मन में कहीं न कहीं यह सोच घर करने लगी है कि जिम्मेदारी का मतलब है अपनी आज़ादी खो देना, अपनी ख्वाहिशों को पीछे छोड़ देना और पूरी जिंदगी ऐसे ढर्रे पर चलना, जिसे समाज ने पहले से तय कर रखा है।

लेकिन क्या सच में जिम्मेदारी का मतलब यही है? शायद इस सवाल का जवाब तलाशने से पहले हमें उस सोच को समझना होगा, जिसने शादी और जिम्मेदारियों को लेकर हमारी पूरी समझ और नजरिया तैयार किया है।

हम बचपन से ही एक तय सामाजिक सोच और माहौल को देखते हुए बड़े होते हैं। लड़की है तो उसे सिखाया जाता है कि घर संभालना है, समझौता करना है और सबको साथ लेकर चलना है। एक उम्र के बाद शादी के बारे में सोचना है और शादी के बाद नए घर को अपना बनाना है। लड़का है तो उसे सिखाया जाता है कि उसे कमाना है, परिवार की जिम्मेदारी उठानी है, माता-पिता के बुढ़ापे का सहारा बनना है और तभी वह एक “जिम्मेदार पुरुष” कहलाएगा। एक उम्र आते ही समाज का अगला सवाल भी लगभग तय होता है “अब शादी कब कर रहे हो?”

बात यहीं खत्म नहीं होती। लड़की से कहा जाता है, “अभी अपने घर में हो, शादी के बाद अपने घर जाकर जो करना हो करना।” और जब वह शादी करके दूसरे घर जाती है तो कई बार वहाँ भी उसे सुनने को मिलता है कि “यह तुम्हारा मायका नहीं है।” 

सोचिए, दो घर होने के बावजूद अगर किसी लड़की को बार-बार यह बताया जाए कि इनमें से कोई भी पूरी तरह उसका अपना नहीं है, तो उसके मन में अपने अस्तित्व को लेकर कैसी भावना पैदा होगी? शायद यहीं से एक डर जन्म लेता है- अपनी पहचान खो देने का डर, अपने फैसले खो देने का डर, अपने सपनों से दूर हो जाने का डर और सबसे बढ़कर यह डर कि शादी के बाद उसका जीवन केवल दूसरों की उम्मीदों को पूरा करने तक सीमित हो जाएगा।

जब कोई लड़की अपनी माँ, दादी, नानी, बुआ, मौसी या बड़ी बहन को वर्षों तक अपने लिए समझौते करते हुए देखती है, तो उसके मन में शादी और जिम्मेदारियों की एक ऐसी तस्वीर बन सकती है, जिससे उसे डर लगने लगे। उसने देखा है कि घर संभालने वाले व्यक्ति को अपने लिए समय नहीं मिलता, अपनी ख्वाहिशें पीछे रखनी पड़ती हैं और परिवार की खुशी के लिए बार-बार खुद को पीछे करना पड़ता है। फिर समाज भी इसी तस्वीर को शादी का सामान्य रूप बनाकर उसके सामने रख देता है।

लेकिन क्या शादी सच में ऐसी ही होती है? क्या शादी का मतलब अपनी पहचान खोकर किसी दूसरे परिवार में खुद को मिला देना है? - नहीं। शादी तो दो अलग-अलग जिंदगियों का साथ आना है, जहाँ दोनों मिलकर एक बेहतर जिंदगी बनाते हैं, न कि कोई एक अपनी पहचान खो दे। यह दो लोगों की साझेदारी है, जिसमें दोनों के सपनों, व्यक्तित्व, कर्तव्य और निर्णय को समान महत्व मिलना चाहिए। शायद इसीलिए आज युवाओं का शादी से दूर भागना सिर्फ उनकी समस्या नहीं है। कहीं न कहीं यह उस सोच का नतीजा भी है, जो हमने पीढ़ियों से उनके सामने रखी है, जहाँ शादी को साझेदारी से ज्यादा त्याग, समझौते और बोझ के रूप में दिखाया गया।

अगर इस्लाम में शादी की मूल भावना देखें तो परिस्थिति कुछ अलग ही प्रतीत होती है। हमारे प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) और हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा का निकाह आपसी सम्मान, भरोसे और साथ का सुंदर उदाहरण है। हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा एक सफल और सम्मानित व्यवसायी थीं और उम्र में भी उनसे बड़ी थीं, लेकिन निकाह के बाद उनकी पहचान और उनका व्यक्तित्व खत्म नहीं हुआ। दोनों ने एक-दूसरे की जिंदगी और जिम्मेदारियों का सम्मान किया। शायद आज हमें शादी को इसी नज़रिए से समझने की जरूरत है, यह किसी की पहचान या उपलब्धियों का अंत नहीं, बल्कि दो लोगों का एक-दूसरे की ताकत बनना है। अगर हम शादी को वास्तविक अर्थ में समझाएँ, तो शायद युवाओं को उससे डरने के बजाय उसकी खूबसूरती समझ आए।

लेकिन शादी का यह दबाव सिर्फ लड़कियों पर नहीं है। लड़कों के हिस्से में भी समाज ने अपनी उम्मीदों का एक अलग बोझ रखा है “अच्छी नौकरी होनी चाहिए”, “कमाई अच्छी होनी चाहिए”, “अपना घर होना चाहिए” और “माता-पिता के बुढ़ापे का सहारा बनना है।” ये बातें जिम्मेदारी की सीख हैं, लेकिन जब इन्हें लगातार दबाव की तरह रखा जाए तो वही जिम्मेदारी बोझ लगने लगती है। फिर लड़के को लगता है कि शादी का मतलब पत्नी, बच्चों और माता-पिता की सारी जिम्मेदारियाँ एक साथ उठाना है। जो जिम्मेदारी प्रेम और अपनापन से निभाई जा सकती थी, वह सामाजिक दबाव के कारण डर का रूप ले लेती है।

शायद इसलिए कि हमने जिम्मेदारी को सहज बनाने के बजाय उसे बोझ जैसा बना दिया है। हमने यह कम समझाया कि परिवार की जिम्मेदारी मिलकर निभाई जा सकती है, पति-पत्नी एक-दूसरे का सहारा बन सकते हैं और माता-पिता व बच्चों के बीच डर से ज्यादा बातचीत जरूरी है। किसी रिश्ते में रहना खुद को खो देना नहीं, बल्कि अपनी पहचान के साथ दूसरे के साथ आगे बढ़ना है। और यहीं से परवरिश की अहमियत सामने आती है। 

बच्चा जिम्मेदारी किताबों से नहीं, अपने घर को देखकर सीखता है। वह देखता है कि माँ-बाप एक-दूसरे से कैसे बात करते हैं, एक-दूसरे के सपनों और फैसलों की कितनी कद्र करते हैं और उसकी बात सुनी जाती है या सिर्फ अपनी बात मनवाई जाती है। इसलिए परवरिश सिर्फ पढ़ाई और करियर तक सीमित नहीं है। यहीं से बच्चे के मन में रिश्तों, सही-गलत और अपनी और दूसरों की जिम्मेदारियों की पहली समझ बनती है।

आज हम बच्चों की पढ़ाई और करियर को लेकर काफी गंभीर रहते हैं। स्कूल से लेकर विषय और करियर तक, हम हर चीज़ सोच-समझकर चुनते हैं और चाहते हैं कि बच्चे की काबिलियत सही दिशा में निखरे। लेकिन क्या हम उसके भावनात्मक और सामाजिक जीवन के लिए भी उतना ही सोचते हैं? क्या हम उससे रिश्तों, मतभेद, जिम्मेदारी और अपनी बात रखने के तरीके पर बात करते हैं? क्या हम उसे समझाते हैं कि किसी की परवाह करना गुलामी नहीं है और अपनी जरूरतों के साथ दूसरों की जरूरतों का सम्मान करना भी जरूरी है?

आज कई पारिवारिक परेशानियों के पीछे कहीं न कहीं बातचीत की कमी दिखाई देती है। कई बार बच्चों की छोटी-सी मांग, उनकी इच्छा या माता-पिता की उम्मीदें इतनी बढ़ जाती हैं कि बात बहुत दूर तक चली जाती है। बच्चों को हर सुविधा देना ही प्यार नहीं है और हर बात पर रोक लगाना ही अनुशासन नहीं है। सही परवरिश शायद इन दोनों के बीच का संतुलन है, जहाँ बच्चे को अपनी बात कहने की आजादी मिले, लेकिन दूसरों की बात सुनने की आदत भी हो; अपनी जरूरतों को समझे, लेकिन दूसरों की जरूरतों की भी कद्र करे; और जायज़-नाजायज़, सही-गलत का फर्क भी समझे।

मैंने ऐसे परिवार भी देखे हैं जहाँ यह संतुलन बहुत अच्छे से बना हुआ है। माता-पिता बच्चों को डराकर नहीं रखते और न ही उन पर अपनी हर उम्मीद थोपते हैं। बच्चे भी बिना डर के अपने माता-पिता से हर तरह की बात कर पाते हैं और माता-पिता उनकी बात समझने की कोशिश करते हैं। ऐसे घरों में जिम्मेदारी बोझ या आदेश नहीं लगती, बल्कि रिश्तों का स्वाभाविक हिस्सा बन जाती है। शायद हमें ऐसे ही परिवारों को सामान्य बनाना है।

आज के युवाओं से मेरी बस इतनी बात है - जरूरी नहीं कि जो आपने देखा है, वही आपके साथ भी हो। अगर आपने अपने आसपास शादी को सिर्फ समझौते और जिम्मेदारियों के बोझ के रूप में देखा है, तो जरूरी नहीं कि आपकी शादी भी वैसी ही हो। जिम्मेदारी निभाने का मतलब खुद को खो देना नहीं है। अगर आपने कोई गलत तरीका देखा है, तो उससे भागने के बजाय यह सोचिए कि उसे बेहतर कैसे बनाया जा सकता है। बदलाव की शुरुआत यहीं से होती है। 

इंसान की फितरत ही ऐसी है कि वह समाज और रिश्तों के बीच रहकर जीता है। हम अकेले पैदा नहीं होते, अकेले बड़े नहीं होते और हमारी खुशियाँ भी सिर्फ हमारी नहीं होतीं। परिवार, दोस्त, पड़ोसी और रिश्ते हमारी जिंदगी का हिस्सा हैं। इसलिए “मैं आज़ाद हूँ, मुझे किसी की जरूरत नहीं और मैं किसी जिम्मेदारी में नहीं पड़ना चाहता/चाहती” जैसी सोच कुछ समय के लिए अच्छी लग सकती है, लेकिन जिंदगी को पूरी तरह रिश्तों और जिम्मेदारियों से अलग करके जीना हमारी फितरत नहीं है। 

हमें ऐसे घर और रिश्ते चाहिए जहाँ बेटी अपनी पहचान के साथ बेटी और बहू दोनों बनकर रह सके, बेटा सिर्फ कमाने वाला नहीं बल्कि एक समझदार और संवेदनशील इंसान भी बने। जहाँ पत्नी का करियर परिवार के खिलाफ न समझा जाए और पति की भावनाओं को कमजोरी न माना जाए। जहाँ माता-पिता का सम्मान डर से नहीं, प्यार से हो और बच्चों की आज़ादी का मतलब लापरवाही न हो।

शादी न तो पूरी जिंदगी सिर्फ समझौते करते रहने का नाम है और न ही ऐसा बोझ जिसे जितनी जल्दी हो सके उतार दिया जाए। यह जिंदगी का एक अहम रिश्ता है, इसलिए इसे समझकर और सोच-समझकर अपनाना चाहिए। किसी भी जिम्मेदारी को स्वीकार करने से पहले उसके असल मायने समझना जरूरी है, वह हमारी जिंदगी और हमारे व्यक्तित्व में क्या जोड़ सकती है और हम उसे बोझ बनाने के बजाय किस तरह प्यार, समझ और आपसी सहमति के साथ निभा सकते हैं।

और अंत में मैं यही कहना चाहूँगी की, बदलाव किसी एक दिन, किसी एक कानून या किसी एक इंसान से नहीं आएगा। बदलाव तब आएगा जब हम हर दिन थोड़ा-थोड़ा अपनी सोच बदलेंगे। जब हम जिम्मेदारी को बोझ नहीं, साझेदारी समझेंगे। जब शादी को समाज के दबाव में नहीं, बल्कि समझदारी और आपसी सहमति से लिया गया फैसला मानेंगे। जब हम बच्चों से सिर्फ यह नहीं पूछेंगे कि “बड़े होकर क्या बनोगे?” बल्कि यह भी पूछेंगे कि “कैसे इंसान बनना चाहते हो?” 

आखिरकार, खुद को मिटाकर जीना भी सही नहीं है और खुद को सबसे ऊपर रखकर बाकी रिश्तों से दूर हो जाना भी नहीं। जिंदगी शायद इसी संतुलन का नाम है, जहाँ हम अपनी पहचान और अपने रिश्तों, दोनों को साथ लेकर चल सकें। अब हमें यह तय करना है कि अगली पीढ़ी को हम कैसी तस्वीर देना चाहते हैं, ऐसी, जहाँ शादी डर और जिम्मेदारी बोझ लगे, या ऐसी, जहाँ शादी साझेदारी हो, जिम्मेदारी अपनापन हो और परिवार वह जगह हो जहाँ इंसान खुद को खोता नहीं, बल्कि और बेहतर बनता है।


अर्शी ख़ानम

राजकीय फार्मासिस्ट, जयपुर, राजस्थान

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