"आधुनिक दौर में भी असुरक्षित नारी"
आज हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं। विज्ञान और तकनीक ने दुनिया को नई ऊँचाइयों तक पहुँचा दिया है। शिक्षा, चिकित्सा, संचार और परिवहन के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई है। महिलाएँ अंतरिक्ष से लेकर सेना, न्यायपालिका, प्रशासन, शिक्षा, खेल, उद्योग और राजनीति तक हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का परिचय दे रही हैं। लेकिन इन सभी उपलब्धियों के बावजूद एक प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा है—क्या आज की महिला वास्तव में सुरक्षित है? क्या उसे वह सम्मान प्राप्त है जो उसका हक है?
आज का युग विज्ञान, तकनीक और विकास का युग कहलाता है। हम चाँद और मंगल तक पहुँचने की बात करते हैं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) पर गर्व करते हैं और आधुनिक समाज का दावा करते हैं। लेकिन जब समाज में महिलाओं की स्थिति पर नज़र डालते हैं, तो एक कड़वी सच्चाई सामने आती है कि विकास के इस दौर में भी अनेक महिलाएँ सुरक्षा, सम्मान और न्याय के लिए संघर्ष कर रही हैं।
प्रतिदिन समाचार पत्रों और समाचार चैनलों में महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों की खबरें सामने आती हैं। कहीं किसी मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म होता है, कहीं किसी युवती को उत्पीड़न का शिकार बनाया जाता है, कहीं घरेलू हिंसा के कारण किसी महिला का जीवन बर्बाद हो जाता है, तो कहीं दहेज, मानसिक प्रताड़ना या साइबर अपराध उसकी स्वतंत्रता और सम्मान को चोट पहुँचाते हैं। यह स्थिति केवल कानून की नहीं, बल्कि समाज की सोच का भी प्रश्न है।
महिलाओं का सम्मान बचपन से सिखाया जाना चाहिए। माता-पिता, शिक्षक और समाज को लड़कों में यह संस्कार विकसित करना चाहिए कि हर महिला सम्मान की अधिकारी है। जिस समाज के युवक महिलाओं का सम्मान करना सीख जाते हैं, वहाँ अपराध स्वतः कम होने लगते हैं। इसलिए शिक्षा के साथ चरित्र निर्माण और नैतिक मूल्यों का विकास भी आवश्यक है!
हदीस में आप ﷺ ने फ़रमाया:
"औरतों के बारे में अल्लाह से डरो।" (सहीह मुस्लिम)
यह शिक्षा स्पष्ट करती है कि महिलाओं के साथ सम्मान, दया और न्याय का व्यवहार करना ईमान का हिस्सा है।
महिला किसी भी समाज की बुनियाद होती है। वह एक बेटी, बहन, पत्नी, माँ और समाज की निर्माता है। उसके हाथों में आने वाली पीढ़ियों का भविष्य होता है। यदि महिलाओं को सम्मान, सुरक्षा और शिक्षा नहीं मिलेगी, तो किसी भी समाज का वास्तविक विकास संभव नहीं है।
आज महिलाओं ने शिक्षा, चिकित्सा, विज्ञान, प्रशासन, न्यायपालिका, सेना, खेल, व्यापार और राजनीति सहित लगभग हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा सिद्ध की है। वे देश और समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इसके बावजूद उनके सामने अनेक गंभीर समस्याएँ आज भी मौजूद हैं।
देश के कई हिस्सों से महिलाओं के साथ छेड़छाड़, दुष्कर्म, घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न, मानव तस्करी, साइबर अपराध और मानसिक शोषण जैसी घटनाएँ लगातार सामने आती रहती हैं। ऐसी घटनाएँ केवल पीड़िता को ही नहीं, बल्कि पूरे समाज को शर्मसार करती हैं। जब कोई बेटी असुरक्षित महसूस करती है, तो यह केवल एक परिवार की नहीं बल्कि पूरे देश की चिंता का विषय होता है।
महिलाओं के सम्मान की शुरुआत घर से होती है। यदि बच्चों को बचपन से ही यह शिक्षा दी जाए कि हर महिला सम्मान की अधिकारी है, तो समाज में बड़ा परिवर्तन आ सकता है। केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि नैतिक शिक्षा, अच्छे संस्कार और सामाजिक जिम्मेदारी भी उतनी ही आवश्यक है।
सरकार, प्रशासन, शैक्षणिक संस्थानों, सामाजिक संगठनों और धार्मिक नेतृत्व—सभी की जिम्मेदारी है कि वे महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करें, अपराधियों के विरुद्ध निष्पक्ष और शीघ्र कार्रवाई सुनिश्चित करें तथा ऐसा वातावरण बनाएँ जहाँ महिलाएँ बिना भय के शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जीवन में भाग ले सकें।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करे। न्याय में अनावश्यक देरी अपराधियों का मनोबल बढ़ाती है। पुलिस, न्यायपालिका और प्रशासन को संवेदनशील और उत्तरदायी होना चाहिए। साथ ही समाज को भी तमाशबीन बनने के बजाय अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठानी चाहिए।
मीडिया और सोशल मीडिया की भी बड़ी जिम्मेदारी है। महिलाओं को केवल मनोरंजन या वस्तु के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उनके सम्मान, उपलब्धियों और अधिकारों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इंटरनेट के इस युग में साइबर अपराधों से महिलाओं की सुरक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।
हर पुरुष को यह समझना चाहिए कि जिस महिला के सम्मान की वह रक्षा करेगा, वही किसी की बेटी, बहन, पत्नी या माँ है। महिलाओं का सम्मान करना केवल सामाजिक कर्तव्य नहीं, बल्कि मानवता की पहचान है।
नबी ﷺ ने फ़रमाया:
"मोमिनों में सबसे पूर्ण ईमान वाला वह है जिसका अख़लाक सबसे अच्छा हो, और तुम में सबसे अच्छे वे हैं जो अपनी स्त्रियों के लिए सबसे अच्छे हैं।" (तिर्मिज़ी, हदीस 1162)
ये शिक्षा स्पष्ट करती हैं कि महिलाओं के साथ सम्मान, दया और न्याय का व्यवहार करना केवल सामाजिक दायित्व ही नहीं बल्कि धार्मिक जिम्मेदारी भी है।
अंत में हमें यह समझना होगा कि किसी भी समाज की पहचान उसकी ऊँची इमारतों, आधुनिक तकनीक या आर्थिक प्रगति से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वहाँ महिलाओं को कितना सम्मान, सुरक्षा और न्याय मिलता है। जिस समाज में बेटी डर के साथ जीती हो, बहन असुरक्षित महसूस करती हो और माँ के सम्मान की रक्षा न हो, उस समाज को सभ्य और विकसित नहीं कहा जा सकता।
तबस्सुम शेख
पुसद, महाराष्ट्र