शिक्षक: सामाजिक परिवर्तन का सच्चा आधार
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राष्ट्रीय परिदृश्य

शिक्षक: सामाजिक परिवर्तन का सच्चा आधार


शिक्षक कोई साधारण व्यक्ति नहीं होता। व्यक्तित्व निर्माण में परिवार के बाद सबसे महत्वपूर्ण भूमिका शिक्षक की ही होती है। मैं व्यक्तिगत रूप से शिक्षक के पेशे को बहुत ही पवित्र और श्रेष्ठ मानता हूँ। संसार को इच्छित मनुष्यों की तैयारी का काम शिक्षक के कंधों पर है। उसका काम केवल विषय पढ़ाना नहीं है, बल्कि बच्चे में ऐसे मूल्यों का सिंचन करना है कि उसका जीवन सोलहों कलाओं से खिल उठे। यह एक चुनौतीपूर्ण कार्य है।

शिक्षक होना स्वयं एक महान उपलब्धि है। यह एक ऐसा गौरवपूर्ण पद है, जो अर्थपूर्ण दृष्टि से राजा के सिंहासन से भी ऊँचा और तंत्री, मंत्री या संतरी के अधिकार से अधिक प्रतिष्ठित है, इसलिए एक शिक्षक को विद्यार्थियों के लिए मार्गदर्शक, प्रेरणादाता, उपदेशक और आदर्श होना चाहिए। क्योंकि उन्हें बच्चों को जीवन के पाठ सिखाने हैं, उनका नैतिक निर्माण करना है और उन्हें एक जिम्मेदार व्यक्ति बनाकर समाज को अर्पण करना है।

लेकिन परिस्थिति की समीक्षा करें तो वास्तविकता इसके विपरीत नजर आती है। मुझे क्षमा करें, आज शिक्षक की दशा और दिशा देखकर उन्हें शिक्षक कहते हुए मुझे संकोच होता है। उन्हें 'शिक्षक' कहने के बजाय केवल 'जानकारी देने वाला यंत्र', 'पाठ्यक्रम पूरा करने वाला कर्मचारी' या 'सिलेबस कम्प्लीटर' कहना अधिक उचित लगता है। क्योंकि वे पाठ्यक्रम के रूप में केवल विद्यार्थियों को जानकारी या आँकड़े उपलब्ध कराते हैं, कौशल का ज्ञान देते हैं या केवल परीक्षा-उन्मुख तैयारियाँ करवाते हैं।

आज देश के विविध भागों से विद्यार्थीयो द्वारा शिक्षकों पर हमले के समाचार पढ़ने में आ रहे है. शिक्षकों की प्रतिष्ठा बिगाड़ने के कारणों में एक मुख्य कारण यह है कि शिक्षक अपने कर्तव्य के प्रति गंभीर नहीं हैं। इस पेशे से जुड़े अधिकांश लोग मजबूरी से या कम्फर्ट सुरक्षित सरकारी नौकरी पाने के लिए शिक्षक बने हैं। उनका उद्देश्य केवल आजीविका प्राप्त करना है। व्यक्ति के लिए जीवन-निर्वाह करने हेतु अर्थोपार्जन भी आवश्यक है, लेकिन यह पेशा यहाँ तक सीमित नहीं है। 

उनके हाथों में बच्चों के कोमल मन में जीवन के ऐसे पाठ अंकित करने की जिम्मेदारी है, जो उन्हें सत्य के सही मार्ग का यात्री बना दें और वे अपने जीवन के मूल उद्देश्य को समझ सकें। उनके अंदर ऐसे मूल्यवान मूल्यों की छाप छोड़ दें, जो उन्हें उच्च स्तर का इंसान बना दें।

आज आदर्श मूल्यों वाले शिक्षकों को समाज में दीपक लेकर ढूँढ़ने जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है। आज की पीढ़ी में जो नैतिक पतन, भौतिकता, व्यक्तिवाद, स्वच्छंदता, गैर-जिम्मेदारी दिखाई दे रही है, उसके बहुत से कारण हो सकते हैं, लेकिन एक मुख्य कारण शिक्षा व्यवस्था और शिक्षकों की नैतिक स्थिति भी है।

समाज में सकारात्मक परिवर्तन के लिए बहुत से पहलुओं पर विचार-मंथन करना होगा, लेकिन इस वर्ष शिक्षक दिवस के संदर्भ में शिक्षक की नैतिकता पर खुले मन से चर्चा होनी चाहिए। बच्चों को शिक्षक बनाकर उनका प्रोत्साहन भले ही करें, लेकिन इस दिन को सिर्फ एक परंपरा बनाने के बजाय कुछ ठोस कदम उठाएँ ताकि पढ़ाने वाले लोग वास्तव में शिक्षक बनें।

शिक्षक का चरित्र शिक्षा प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। विद्यार्थी शिक्षक के शब्दों की अपेक्षा उनके व्यवहार, विचारों और चरित्र से अधिक सीखते हैं। शिक्षक के महत्व का अनुमान इस हदीस से लगाया जा सकता है। मुअल्लिम-ए-आज़म अर्थात शिक्षक शिरोमणि हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया:

निःसंदेह, अल्लाह ने मुझे कठोर (सख्त) व्यवहार करने वाला या मुश्किलें पैदा करने वाला बनाकर नहीं भेजा, बल्कि मुझे शिक्षक (मुअल्लिम) और आसानी पैदा करने वाला बनाकर भेजा है।” (सहीह मुस्लिम: 1478)

प्यारे नबी सल्ल० स्वयं को एक शिक्षक के रूप में प्रस्तुत करते हैं और वास्तव में आपका संपूर्ण जीवन हमारे लिए एक आईने के समान है। आप केवल छोटे बच्चों के लिए मार्गदर्शक नहीं थे, बल्कि युवा हों या वृद्ध, स्त्रियाँ हों या पुरुष, सभी के लिए आदर्श मुरब्बी थे। आपने अपने विचारों, व्यवहार और श्रेष्ठ चरित्र से पूरे समाज का कायापलट कर दिया। 

व्यक्ति का ऐसा सर्वांगीण विकास हुआ कि वह नैतिकता की उच्चतम अवस्था तक पहुँच गया और ऐसे आध्यात्मिक साम्राज्य की स्थापना हुई कि अत्याचार, अन्याय, असभ्यता, असमानता, अहंकार, अज्ञानता समाप्त हो गई। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से अंधकार विलुप्त हो गया।

एक शिक्षक को जो आदर और सम्मान मिलना चाहिए, वह तभी संभव है जब वह वास्तव में ‘शिक्षक’ बने। अपनी आदतों, स्वभाव, चरित्र और भावनाओं में परिवर्तन किए बिना बच्चों और विद्यार्थियों में परिवर्तन असंभव है। शायद विषय का विशेषज्ञ बनना आसान है, लेकिन विद्यार्थियों के मन में स्थान बनाना आसान नहीं है। 

उसके लिए कड़ी मेहनत, कर्तव्यनिष्ठा और दिल से संबंध बनाने होंगे। महानता विजेता बनने में नहीं है, महानता दिल जीतने में है; और उसके लिए विनम्रता, सम्मान और स्नेहपूर्ण व्यवहार, नरमी, प्रेम और क्षमा जैसे मूल्यों को अपने अंदर विकसित करना होगा।

कुशल बनाना आसान है, लेकिन नैतिक बनाना आसान नहीं है। इसके लिए जीवन में सादगी और विचारों में बुलंदी लानी होगी। हमें बच्चों को सिखाना होगा कि धर्म का लक्ष्य समुदायों या जातियों के बीच दीवारें खड़ी करना नहीं है, बल्कि सत्य के माध्यम से मनुष्यों के दिलों को एक-दूसरे से जोड़ना है। ये सद्गुण धर्म के साथ गहरे संबंध, व्यवहार में मनुष्यों के प्रति दया, करुणा और विश्वबंधुत्व के बिना संभव नहीं हैं।

एक प्रखर ज्ञानी बन जाना मुश्किल नहीं है, लेकिन एक बच्चे की गुप्त प्रतिभा और योग्यता को पहचानना कठिन है। इसके लिए अपने अंदर चारों ओर देखने की दृष्टि, विचारशक्ति और उत्कृष्ट निर्णयशक्ति का सिंचन करना होगा। विद्यार्थियों को विज्ञान पढ़ाना आसान है, लेकिन उनमें आलोचनात्मक विचारधारा, अनुसंधान और नई खोजों को सही दिशा देना आसान नहीं है। 

इसके लिए हमें प्रतिभा,आध्यात्मिकता और जीवन के लक्ष्य के बीच गहरा संबंध स्थापित करना होगा। संक्षेप में, हमें तय करना होगा कि हम भविष्य के लिए कैसे नागरिक तैयार करना चाहते हैं, उसी के अनुसार हमें अपने अंदर ईमानदारी से परिवर्तन लाना होगा। यदि हम इतना करने में सफल हो गए तो इस पवित्र पद की गरिमा को पुनः स्थापित करने में सफल होंगे, शिक्षक के रूप में हमारा जीवन सार्थक कहलाएगा और इस देश का भविष्य उज्ज्वल बनेगा। इसी आशा के साथ शिक्षक दिवस की खूब शुभकामनाएं....


शकील अहमद राजपूत

स्वतंत्र लेखक, गुजरात

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