हलाल कमाई का महत्व
सुबह की पहली किरण से लेकर रात के अंधेरे तक, इंसान अपना पूरा जीवन भाग-दौड़ में गुज़ार देता है। भोजन, तन के कपड़े, बच्चों की शिक्षा और छत का साया पाने के लिए धन आवश्यक है। लेकिन क्या कभी हमने शांत मन से सोचा है कि जो निवाला हम हर शाम अपने मासूम बच्चों के मुख में डालते हैं, उसकी नींव क्या है?
इस्लाम केवल यह नहीं पूछता कि तुमने कितना कमाया, बल्कि गवाही इस बात की मांगता है कि तुमने कैसे कमाया। हलाल कमाई केवल एक आर्थिक शब्द नहीं है यह एक व्यक्ति की अंतर्रात्मा, उसकी दुआओं की मिठास और उसके घर के सुकून का आधार है।
हलाल कमाई का मतलब सिर्फ कड़ी मेहनत नहीं, बल्कि वह पाकीज़गी (पवित्रता) है जिसमें किसी का दिल न दुखा हो, किसी का हक़ न मारा गया हो, और न ही किसी के साथ छलावा हुआ हो। पसीने की वह एक-एक बूंद जो ईमानदारी से ज़मीन पर गिरती है हलाल है। इसके विपरीत चोरी, रिश्वत, मिलावट, ठगी, झूठ और धोखे से जमा की गई दौलत चाहे कितनी भी चमकती हो, वह अंदर से खोखली और हराम होती है।
अल्लाह तआला ने कुरआन मजीद में पूरी मानवता को प्रेम और चेतावनी के साथ पुकारा है, "ऐ लोगो! धरती में जो हलाल और पाक चीजें हैं, उनमें से खाओ और शैतान के कदमों पर न चलो।" (2:168)
अल्लाह तआला ने केवल पेट भरने का आदेश नहीं दिया, बल्कि भोजन के 'पाक' होने पर ज़ोर दिया है। एक अन्य स्थान पर अल्लाह फरमाता है,
"ऐ पैग़म्बरो! पाक चीजों में से खाओ और नेक काम करो।" (23:51)
गौर कीजिए! अच्छे कर्मों (नेक अमल) से पहले पाक रोज़ी का ज़िक्र है। जब पेट में हलाल का निवाला जाता है, तो दिल में नूर पैदा होता है और हाथ अपने-आप नेक कामों की तरफ उठते हैं। लेकिन जब शरीर हराम से पलता है, तो आत्मा मुर्दा होने लगती है।
सहीह मुस्लिम की एक अत्यंत भावुक कर देने वाली हदीस में रसूलुल्लाह (सल्ल.) ने फरमाया कि अल्लाह पाक है और केवल पाकीज़ा चीज़ को ही स्वीकार करता है। फिर आपने एक ऐसे व्यक्ति का उल्लेख किया जो दूर-दराज़ का लंबा सफ़र करके आता है, जिसके बाल बिखरे हैं, धूल से अटा हुआ है। वह आसमान की तरफ हाथ उठाकर रो-रोकर पुकारता है "ऐ मेरे रब! ऐ मेरे रब!"लेकिन रसूलुल्लाह (सल्ल.) फरमाते हैं,
"उसका खाना हराम का है, उसका पीना हराम का है, उसका पहनावा हराम का है और उसकी परवरिश हराम पर हुई है... तो भला उसकी दुआ कैसे कुबूल हो सकती है?"
सोचिए! कितनी बेबसी का मकाम है कि इंसान गिड़गिड़ाए, रोए, लेकिन उसकी कमाई की गंदगी उसकी दुआ और अल्लाह के बीच दीवार बन जाए।
आज बाज़ार चालबाज़ियों से भरे हैं। लेकिन इस्लामी व्यापारिक नैतिकता हमें ईमानदारी का सबक देती है। रसूलुल्लाह (सल्ल.) ने फरमाया,
"खरीदने और बेचने वाले जब तक जुदा न हों, उन्हें अधिकार है। यदि वे सच बोलें और (सामान का) दोष स्पष्ट कर दें, तो उनके सौदे में बरकत दी जाती है, लेकिन यदि वे झूठ बोलें और दोष छिपाएँ, तो उनके सौदे की बरकत मिटा दी जाती है।" (सहीह अल-बुखारी 2079)
झूठ बोलकर कमाया गया मुनाफा बैंक बैलेंस तो बढ़ा सकता है, लेकिन वह घर से 'बरकत' और 'सुकून' छीन लेता है। हलाल कमाई कम होकर भी दिल को बेइंतहा इत्मीनान देती है।
हराम कमाई केवल पैसे की बर्बादी नहीं, चरित्र की बर्बादी है। जब एक बाप हराम का पैसा घर लाता है, तो वह केवल धन नहीं लाता, बल्कि अपने बच्चों के भविष्य में ज़हर घोल देता है। इसके विपरीत, जब एक पिता दिन-भर हाड़-तोड़ मेहनत करके शाम को सूखी रोटी भी हलाल तरीके से घर लाता है, तो उस रोटी में मोहब्बत और अल्लाह की रहमत होती है। बच्चे सीखते हैं कि सिर उठाकर जीना किसे कहते हैं। वे समझते हैं कि लालच की ऊँची इमारत से ईमानदारी की छोटी झोपड़ी कहीं अधिक सम्मानजनक है।
हमें अपने बच्चों को सिर्फ यह नहीं सिखाना है कि "बड़े होकर अमीर कैसे बनना है", बल्कि यह तालीम देनी है कि "ईमानदार कैसे रहना है"।
क्योंकि जब यह सांसों की डोरी टूटेगी, तो कब्र में यह नहीं पूछा जाएगा कि तुमने कितना बैंक बैलेंस छोड़ा, बल्कि यह सवाल होगा कि तुमने जो निवाला खाया था, वह हलाल का था या हराम का। हलाल कमाई का छोटा सा कतरा ही इंसान के लिए दुनिया में सुकून और आख़िरत (परलोक) में सफ़लता का कारण बनेगा।
उम्मे सबा
महाराष्ट्र