डॉटर्स डे: बेटी घर वापस लौट सकती है?
सारा एक पोस्ट ग्रेजुएट लड़की है, पढ़ाई में हमेशा अव्वल रही, घर में जब आर्थिक स्थिति बिगड़ी तो उसने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर घर को आर्थिक संकट से निकालने में सहयोग किया। जीवन बहुत अच्छे से बीत रहा था तभी एक पढ़े लिखे संपन्न परिवार में उसकी शादी हो गई। शादी के कुछ दिनों बाद उससे मुलाकात हुई तो बातीचत में मालूम पड़ा ससुराल वाले ठीक नहीं है। पति मारता है, उसका और उसके मायके वालों का अपमान करता है। सुनकर बुरा लगा कि इतनी अच्छी संस्कारी लड़की को कैसा ससुराल मिल गया। बात जब आगे बढ़ी तो पता चला कि वह ससुराल वापस जाना चाहती है।
मैंने कारण जानना चाहा तो बताया कि “किसी भी कीमत पर अपना परिवार बचाना चाहती है।”
मैंने कहा “जब तुम्हारा पति तुम पर हाथ उठाता है तब भी तुम वहां जाना चाहती हो?”
उसका जवाब सुनकर मैं शॉक रह गई, उसने कहा “बहुत लोग मारते हैं बाद में सुधर जाते हैं।”
मैं सोच में पड़ गई कि एक पढ़ी लिखी जागरुक लड़की अपने पति द्वारा की जा रही हिंसा को कैसे सामान्य मान सकती है? क्यों वह एकतरफ़ा रिश्ता निभाना चाहती है?
कारण स्पष्ट है कि यह उसकी मजबूरी है, क्योंकि हमारा समाज आज भी शादीशुदा लड़की को वापस घर लौटने का अवसर नहीं देता है। यदि वह वापस आ भी जाए तो उसके साथ ऐसा सौतेला व्यवहार किया जाता है कि वह मजबूरन हिंसा सहती रहे। कहा जाता है कि “जिस घर में डोली गई है वहीं से अर्थी भी उठनी चाहिए।”
यही है हमारे देश की हजारों बेटियों की “डॉटर्स डे” की असली कहानी। हमारे समाज में कभी बेटियों से ये कहा ही नहीं जाता कि - "बेटा, अगर महल में घुटन लगे, तो वापस आ जाना। ये महल नहीं, घर है। इसका दरवाजा हमेशा खुला है।" हम बेटियों को विदा करना बहुत अच्छे से सिखाते हैं। हल्दी, मेहंदी और दुनिया के सभी चोचले। विदाई पर रोते भी हैं। पर क्या हम उन्हें वापस आना सिखाते हैं?
आप लोगों को ट्विशा केस याद होगा। मरने से पहले ट्विशा ने अपनी मां से बार-बार कहा कि “मुझे इस घर में नहीं रहना” लेकिन उसकी मां उसे समझा बुझा कर शांत कर देती थीं। मौत से एक दिन पहले भी उसने अपनी मां को मैसेज कर बताया था कि वह नरक जैसी ज़िंदगी जी रही है।
हमने अपनी बेटियों के लिए कमरे तो सजाए, पर उन कमरों में ताला कब लगा दिया, पता ही नहीं चला। शादी के बाद वो कमरा स्टोर रूम बन जाता है और धीरे-धीरे बेटी को लगता है कि वो सच में पराई हो गई। बेटियां बहुत कुछ नहीं मांगतीं वो बड़ी-बड़ी बातें नहीं मांगतीं। वो नहीं कहती कि मेरे नाम प्रॉपर्टी कर दो। वो बस ये सुनना चाहती है कि "बेटा, ये घर तेरा भी है।"वो नहीं कहती कि मेरी शादी मत करो। वो बस ये कहना चाहती है कि "मुझे थोड़ा वक्त दे दो, मुझे खुद को तो समझ लेने दो।"
वो नहीं कहती कि मुझे तलाक के बाद भी अपनाओ। वो बस ये चाहती है कि कोई आकर कहे - "कोई बात नहीं बेटा, तूने कोई पाप नहीं किया। रिश्ता खत्म हुआ है, जिंदगी नहीं।"
अगर आप अपनी बेटी के लिए वास्तव में कुछ करना चाहते हैं तो उसे यह यकीन दिलाइए कि वो फेल हो सकती है। उसकी शादी फेल हो सकती है, उसकी नौकरी फेल हो सकती है, उसका फैसला गलत हो सकता है। और तब भी, तब भी आप उसके साथ खड़े हैं।
क्योंकि बेटियां बोझ नहीं होती हैं। वह तो परिवारों को एक लड़ी में पिरोने वाला धागा होती हैं। हर रिश्ते को दिल से निभाती हैं। बस उन्हें ज़रुरत होती है कोई उन्हें प्यार से थपथपाए, उनके फैसलों में उनका साथ दे, उन पर भरेसा करे, ताकि वे निडर होकर ज़िंदगी की चुनौतियों का सामना कर सकें।
डॉटर्स डे का उद्देश्य भी यही है कि समाज से बेटे और बेटियों के बीच भेदभाव समाप्त किया जा सके। लेकिन हम हर साल सितबंर माह के अंतिम रविवार को डॉटर्स डे तो बड़े धूमधाम से मनाते हैं, बेटियों के बारे में खूब अच्छी अच्छी पोस्ट तो शेयर करते हैं लेकिन आज भी बेटियों की स्थिति में कोई सुधार नहीं आ सका है।
हज़रत मुहम्मद सल्ल० का प्रसिद्ध कथन है-
“जिस व्यक्ति की तीन बेटियां हों, और वह उनके साथ अच्छा व्यवहार करे तो वे उसके लिए जहन्नुम से बचाव का कारण बनेंगी।” (तिर्मिज़ी शरीफ़)
एक रिवायत में है कि एक सहाबी ने पूछा, “अगर दो बेटियां हों तो?” आप सल्ल० ने फ़रमाया – “दो का भी वही सवाब है।” हदीस के रावी (बताने वाले) कहते हैं कि यदि उस समय लोग एक के संबंध में भी पूछते तो आप सल्ल० यही फ़रमाते।
सहीफ़ा ख़ान
उपसंपादक