AI युग: स्कूल पुराना, सवाल नए, समय कम
AI आपकी नौकरी छीनने नहीं आ रहा, बल्कि वह उस पूरी दुनिया को बदल रहा है जिसमें आपकी नौकरी सांस लेगी।
ज़ैनब के पिता पिछले उन्नीस वर्षों से पत्रकारिता के पेशे से जुड़े हैं। उन्होंने अपनी आँखों के सामने चुनाव, दंगे, बजट सत्र और तीन-तीन राज्य सरकारों को ताश के पत्तों की तरह बिखरते और गिरते देखा है। वे महफ़िल की नब्ज़ पहचानना भलि भांति जानते हैं, उन्हें पता है कि वे ख़ुफ़िया स्रोत कैसे तलाशे जाते हैं जिनसे कोई और संपर्क नहीं कर सकता, और किसी बोरिंग नेता की तीन घंटे लंबी प्रेस ब्रीफ़िंग को केवल 600 शब्दों में कैसे समेटा जाता है जो वास्तव में महत्वपूर्ण हों। लेकिन पिछली ईद पर जब वे घर लौटे, तो हमेशा से ज़्यादा ख़ामोश थे।
हुआ यूं कि उनके अख़बार ने हाल ही में एक ऐसी AI वायर सर्विस को अपने सिस्टम का हिस्सा बना लिया है जो पलक झपकते ही ब्रेकिंग न्यूज़ के खुलासे (संक्षेप) तैयार कर देती है; पूरे संदर्भ, बेहतरीन फ़ॉर्मेटिंग और शानदार भाषा के साथ। और दिलचस्प बात देखिए, इससे पहले कि कोई इंसानी रिपोर्टर अपना लैपटॉप खोलकर चाय का घूंट भरे, ख़बर पब्लिश भी हो जाती है।
नौकरी से किसी को निकाला नहीं गया है, कम से कम अभी तक तो नहीं। लेकिन नाइट डेस्क का स्टाफ़ कम कर दिया गया है, और फ़ीचर तथा विशेष रिपोर्टिंग का बजट बर्फ़ की तरह जमा दिया गया है। अब संपादकों का आधा दिन उस सामग्री का जायज़ा लेने में गुज़रता है जो मशीन ने रात के समय ख़ुद-ब-ख़ुद फ़ाइल कर दी थी; वे उसकी 'पूर्ण-विश्वस्त ग़लतियों' को सुधारते हैं और यह सोचने पर मजबूर कि इसे पत्रकारिता कहा जाए या महज़ क्वालिटी कंट्रोल!
ज़ैनब ग्यारहवीं कक्षा में है। उसे किसी ऐसी नौकरी के छिन जाने का कोई ख़ौफ़ नहीं है जो अभी उसके पास है ही नहीं। वह तो बस अपने पिता को देख रही है—एक ऐसा व्यक्ति जिसने अपना पूरा पेशेवर जीवन उन बातों और राज़ों की खोज में गुज़ार दिया जो दूसरों को मालूम नहीं होते थे, और आज वे एक ऐसी मशीन के प्रूफ़रीडर बनकर रह गए हैं जो न कभी थकती है, न सोती है, और न ही छुट्टी मांगती है।
पड़ोस में कुछ घर छोड़कर, उसके क्लासमेट फ़र्रुख़ का अनुभव बिल्कुल इसके विपरीत है। उसके बड़े भाई इमरान ने पिछले साल BCA की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी और छह महीने तक छोटे कारोबारों के लिए AI वर्कफ़्लो बनाने का हुनर सीखता रहा। आज आलम यह है कि वह गुरुग्राम के एक लॉजिस्टिक्स स्टार्टअप के लिए घर बैठे काम करते हुए अपने माता-पिता की कुल आमदनी से भी ज़्यादा कमा रहा है। उसने आज तक किसी दफ़्तर की चौखट पर क़दम तक नहीं रखा।
एक ही शहर। एक ही पीढ़ी। दो बिल्कुल अलग भविष्य—और उनके बीच फ़र्क़ सिर्फ़ इस बात का है कि किसने बदलाव की आहट को पहचाना, और कब पहचाना।
यह रोबोट्स के हाथों नौकरियां छिन जाने की कोई घिसी-पिटी कहानी नहीं है। वह आख्यान (नैरेटिव) अब दस साल पुराना और बासी हो चुका है। असली स्थिति यह है कि काम की बुनियादी बनावट किस तरह अंदर ही अंदर नए सिरे से गढ़ी जा रही है - फ़ैसले कैसे लिए जाते हैं, कामयाबी का सेहरा किसके सिर बंधता है, महारत का पैमाना क्या है, और अब काम के एक दिन की रूप-रेखा कैसी होती है।
यह बदलाव इस समय, बिल्कुल इसी पल, भारत के दफ़्तरों, क्लासरूमों, अस्पतालों के गलियारों और सरकारी विभागों में तेज़ रफ़्तार से जारी है; और इससे पहले कि आज के ज़्यादातर छात्र अपनी डिग्रियां पूरी करें, यह बदलाव बड़ी हद तक पूरा हो चुका होगा।
आंकड़े कोई छुपी बात नहीं रहे हैं। सिर्फ़ 2026 की पहली छमाही में दुनिया भर की टेक इंडस्ट्री से 119,000 से ज़्यादा नौकरियां समाप्त हो गईं, और इन नुक़सानों के अनुपात में भारत दुनिया में दूसरे नंबर पर रहा। जो पद सबसे पहले ग़ायब हो रहे हैं वे हैं एंट्री-लेवल प्रोग्रामिंग, टेस्टिंग और डेटा एंट्री—ये वही नौकरियां हैं जिन्हें हासिल करने की सलाह एक पूरी पीढ़ी को दी गई थी। बेंगलुरु, वह शहर जिसे भारतीय माता-पिता की एक पूरी पीढ़ी ने कामयाबी की आख़िरी मंज़िल माना था, आज अपनी निचली सीढ़ियों को अपनी आँखों के सामने टूटते-बिखरते देख रहा है।
वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम की 'फ़्यूचर ऑफ़ जॉब्स रिपोर्ट 2025' वैश्विक स्थिति को दो-टूक शब्दों में बयान करती है: 2030 तक AI और ऑटोमेशन दुनिया भर में 92 मिलियन नौकरियां ख़त्म कर देंगे और 170 मिलियन नए अवसर पैदा करेंगे। कुल मिलाकर यह फ़ायदा है, हाँ, मगर यह कोई अपने-आप होने वाला चमत्कार नहीं है। वे 170 मिलियन नई नौकरियां उन लोगों को हरगिज़ नहीं मिलेंगी जिन्होंने अपनी पुरानी नौकरियां गंवाई हैं। वे उनके हिस्से में आएंगी जिन्होंने इस बदलाव को समय रहते भांप लिया और तूफ़ान के दरवाज़े पर दस्तक देने से पहले ही ज़रूरी हुनर सीख लिए।
इंटरनेट ने ट्रैवल एजेंटों का धंधा चौपट कर दिया है। लेकिन इसी इंटरनेट ने सोशल मीडिया मैनेजर्स, UX डिज़ाइनर्स और क्लाउड आर्किटेक्ट्स को जन्म दिया। ये ऐसे पेशे हैं जिनका 1995 में अस्तित्व तक न था। सवाल कभी यह नहीं था कि नौकरियां बदलेंगी या नहीं; सवाल हमेशा यह था कि जब वे बदलेंगी, तो मैदान में कौन तैयार खड़ा होगा।
इस भारी उथल-पुथल के बीच एक ऐसा विरोधाभास मौजूद है जिसका फ़ायदा उठाने के लिए भारत दुनिया में सबसे बेहतरीन स्थिति में है। नैसकॉम के अनुसार, AI कौशल के विस्तार में भारत दुनिया में पहले पायदान पर है—अमेरिका से आगे, और चीन से भी आगे! 2026 की एक नैसकॉम रिपोर्ट से यह ख़ुलासा हुआ है कि भारत के 90 प्रतिशत से ज़्यादा शुरुआती करियर वाले टेक पेशेवर पहले से ही AI में महारत रखते हैं या AI माहौल के आदी हैं, जो कि वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ा अनुपात है।
2026 के डेलॉइट सर्वे से मालूम हुआ कि भारत के 85 प्रतिशत जेन-ज़ी (Gen Z) युवा पेशेवर माहौल में AI का इस्तेमाल करने में आत्मविश्वास दिखाते हैं, जो वैश्विक औसत से कहीं ज़्यादा है, और उनमें से 93 से 95 प्रतिशत पहले से ही काम की जगह पर AI टूल्स का नियमित इस्तेमाल कर रहे हैं। यह भूख और जुस्तजू बिल्कुल असली और मापने योग्य है।
लेकिन भूख और तैयारी दो अलग-अलग सच्चाई हैं, और उनके बीच जो अंतर है, ठीक उसी जगह ख़तरा और मौक़ा दोनों बसते हैं। 2025 के एक सर्वे में यह बात सामने आई कि 45 प्रतिशत भारतीय जेन-ज़ी कर्मचारी इस चिंता में घिरे हैं कि AI अगले पाँच वर्षों में उनकी नौकरियां निगल जाएगा। यह बेचैनी एक असली ख़तरे का बिल्कुल स्वाभाविक और तर्कसंगत रिएक्शन है। अब यह फ़िक्र क्या रूप लेती है—हाथ-पाँव फुला देने वाला ख़ौफ़ या कमर कसके तैयारी करने का संकल्प—यह एक ऐसा चुनाव है जो सिर्फ़ और सिर्फ़ उन्हें ख़ुद करना है।
इरफ़ान वहीद
रिसर्च स्कॉलर एवं भाषाविद, नई दिल्ली