समाज में फ़ैलती हवस की भूख़ लीलती बच्चियों की ज़िंदगी
कल्पना कीजिए मासूम सी नन्हीं बच्ची जो अपनी सहेली के जन्मदिन का उपहार खरीदने घर से निकली है, मन में ढेरों उमंगे लिए, सहेली के बर्थडे पर जमकर मस्ती करने का अरमान संजोए हुई घर से निकलती है और किसी वहशी दरिंदे की हवस की भेंट चढ़कर घर वापस लौटती है तो उसकी लाश। यह कोई कहानी नहीं बल्कि वास्तविकता है। ऐसी वास्तविक घटना जो हमारे समाज में हर दिन घटती है और हम सब ऐसी घटनाएं देखते देखते उसके इतने आदी हो गए हैं कि यह अब सामान्य लगने लगी है।
8 जुलाई 2026 को पश्चिम बंगाल के बारूईपुर में यह घटना घटित हुई। एक छोटी बच्ची लापता हुई और अगले दिन तालाब से बोरे में बंद उसका शव मिला। सिर पर गंभीर चोट, शरीर पर निशान, फेफड़ों में पानी भरा हुआ था यानी बच्ची ने पानी में तड़प कर दम तोड़ा था। मामला पहले से सुनियोजित बताया गया। पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ्तार किया पर गुस्साई भीड़ ने शक के आधार पर एक युवक को पीट-पीटकर मार डाला, और फिर एक और चौंकाने वाला मोड़ सामने आया, मुख्य आरोपी को पुलिस हिरासत में कथित "मुठभेड़" में मार दिया गया।
इस केस का सबसे पीड़ादायक पक्ष यह रहा कि अपराधी को अदालत तक पहुंचने और पीड़िता को इंसाफ़ मिलने से पहले ही मार दिया गया। तेज़ी से बढ़ती इस प्रकार की मुठभेड़ क्या वास्तव में इंसाफ़ की नई परिभाषा है?
2024 में POCSO Act के तहत कुल 67,809 केस दर्ज हुए, जिनमें 70,000 से ज़्यादा बच्चे पीड़ित बने, इनमें से करीब 64% मामले सीधे यौन शोषण (penetrative assault) से जुड़े थे। सबसे चिंताजनक बात यह है कि 96% से ज़्यादा मामलों में आरोपी बच्चे का जानकार ही निकला, और सबसे ज़्यादा पीड़ित 16-18 साल की किशोरियां रहीं।
आखिर जिम्मेदार कौन?
खोखली रूढ़ियां या धर्म की गलत तशरीह (व्याख्या)। धर्म तो इंसान की सही रहनुमाई करने, एक दूसरे से जोड़ने, उसे मर्यादा और जवाबदेही सिखाने के लिए आया था। मज़हब तो अपने माननेवालों को यही सिखाता है कि औरत की इज्ज़त करना ईमान का हिस्सा है, और जो हक़ ईश्वर ने मर्द को दिए हैं, उनका दुरुपयोग करने वाला उसी के सामने जवाबदेह है।
अज़ीम प्रेमजी स्कूल उत्तराखंड की रिटायर्ड प्रिंसिपल अरुणा मैडम से इस विषय पर बात की, उनका कहना है- "मुश्किल यह है कि कुछ लोग धर्म को उसकी असली रूह से काटकर सिर्फ पुरानी पुरुषवादी रूढ़ियों का हवाला बना लेते हैं। लड़की को "भोग की वस्तु" कह देना, "मर्दानगी" को "दबदबे" में बदल देना, यह धर्म की तालीम नहीं, धर्म का ग़लत इस्तेमाल है। जब इंसान यह भूल जाए कि उसे अपने हर काम का हिसाब देना है, तो उसके दिल से ईश्वर का डर निकल जाता है और अफसोस, सत्ता भी अक्सर ऐसे गुनहगार को सज़ा देने की बजाय उसे माला पहनाती है"।
एसोसिएट प्रोफेसर और एडवोकेट डॉक्टर संध्या शैली मैडम (M.Phil JNU) का इस विषय पर कहना है- "इंसानी समाज में यौन अपराध वैसे तो हर जगह मौजूद रहा है, पर आज इसकी जड़ें सिर्फ अपराधी की मानसिकता में नहीं, बल्कि सिस्टम की मिलीभगत में भी हैं, क़ानून का डर ख़त्म हो चुका है, राजनीतिक और सामाजिक रसूख अपराधियों को बचाता है, और पीड़ित को ही चरित्र और कपड़ों के आधार पर कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। आसिफा, उन्नाव और हाल के मामलों ने दिखाया है कि जब सत्ता अपराधी के साथ खड़ी हो जाए, तो इंसाफ की उम्मीद और मुश्किल हो जाती है। यह लड़ाई सिर्फ अदालतों और थानों तक सीमित रहकर नहीं जीती जा सकती, इसे स्कूलों, घरों, कार्यस्थलों और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाना होगा, तभी पीड़ित को इंसाफ के लिए बहादुरी नहीं, बल्कि हक़ के तौर पर सुनवाई मिलेगी।"
अपराध के कारण: समाज में बढ़ती अश्लीलता
बच्चियों के विरुद्ध बढ़ते अपराध का कोई एक कारण नहीं है, इसे आज के माहौल से अलग करके नहीं देखा जा सकता। अश्लीलता,जो रोज़मर्रा की बातचीत, मज़ाक, ऑनलाइन कंटेंट और मोबाइल की खुली पहुंच से धीरे-धीरे आम होती चली गई है। यह बड़ों की सोच को भी इस हद तक प्रभावित कर देती है कि बीमार मानसिकता वाले लोग मासूम बच्चियों तक को अपनी हवस का निशाना बना बैठते हैं। हर हाथ में मोबाइल, हर मोबाइल में बिना किसी रोक-टोक के ऐसा कंटेंट, जो बच्चों की मासूमियत और उम्र, दोनों के ख़िलाफ़ है। जब समाज से हया उठ जाती है, तो इंसान के अंदर की वो सहज रोक भी ख़त्म हो जाती है जो उसे बच्चों तक हाथ बढ़ाने से पहले थाम लेती थी।
फिल्में, वेब सीरीज और OTT की भूमिका
मनोरंजन जगत भी इसमें बराबर का भागीदार है। जब पर्दे पर बार-बार ज़बरदस्ती को, मना करने के बाद भी पीछे पड़े रहने को, या पावर के असंतुलन को "रोमांस" बनाकर पेश किया जाता है, तो देखने वाले, ख़ासकर नाबालिग दर्शकों के मन में सही-गलत की समझ धुंधली पड़ जाती है, और यही धुंधली लकीर असल ज़िंदगी में भी घुलने लगती है। नाबालिगों में बढ़ते अपराधों में वेब सीरीज़ की भी बड़ी भूमिका है, जो अब VPN के ज़रिए हर पाबंदी को दरकिनार करके, बिना किसी उम्र-प्रतिबंध के सीधे बच्चों-किशोरों तक पहुंच रही हैं। जो कंटेंट बैन या age-restricted होना चाहिए, वो एक क्लिक में उपलब्ध है, और जहां कोई रोक-टोक ही नहीं, वहां असर सीधा दिमाग़ और व्यवहार पर पड़ता है, कल का दर्शक आज का अपराधी बन जाता है।
बाज़ार और उपभोक्तावाद
बाज़ार को इंसान नहीं, बस ग्राहक चाहिए। टीवी, मोबाइल और वेब सीरीज़, हर जगह मासूमियत को बेचा जा रहा है, बच्चियों का यौनिकरण करके TRP और पैसा कमाया जा रहा है और अपराधी यही सब देखकर सीखता है। 2012 के निर्भया कांड के बाद क़ानून तो सख़्त हुए, पर ज़मीन पर लागू करने वाला तंत्र वैसा ही कमज़ोर रहा। जांच में देरी, गवाहों पर दबाव, राजनीतिक हस्तक्षेप, यही वजहें अपराधी के मन से डर निकाल देती हैं, और पीड़ित परिवार के मन से इंसाफ की उम्मीद।
इसे रोकने के लिए बेहतर डिजिटल सुरक्षा, तेज़ रिपोर्टिंग व्यवस्था, और बच्चियों के ख़िलाफ़ ऑनलाइन-ऑफलाइन दोनों तरह के उत्पीड़न पर लगातार जवाबदेही ज़रूरी है। पर अगर कानून-व्यवस्था और न्याय प्रणाली ख़ुद नैतिक रूप से भ्रष्ट हो या ऐसी सोच का समर्थन करती हो जहां रेप को सामान्य मान लिया जाए, तो शायद इस ख़तरनाक बुराई का कोई हल नहीं बचता क्योंकि ख़ून का स्वाद चख चुका मांसाहारी कभी शाकाहारी नहीं बनता, और उसे रोकने वाला भी कोई नहीं होता।
समाधान
- घर में बात हो क्योंकि घर से ही शुरुआत करनी होगी। बेटे को अच्छे संस्कार दिए जाएं और बेटी को इतनी हिम्मत दी जाए कि वह ग़लत के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा सके।
- नंगेपन और अश्लील कंटेंट पर लगाम लगानी होगी, और बच्चों की परवरिश में शर्म-हया और सम्मान को फिर से केंद्र में रखना होगा।
- डिजिटल और OTT कंटेंट पर निगरानी होना चाहिए, VPN के ज़रिए बैन कंटेंट तक पहुंच रोकने के लिए सख़्त नियम बनने चाहिए, साथ ही एक तेज़ रिपोर्टिंग व्यवस्था होनी चाहिए ताकि पीड़ित बदनामी के डर के बगैर आवाज़ उठा सके।
- ज़रूरत सिर्फ सख़्त क़ानून बनाने की नहीं, बल्कि उन्हें बिना किसी भेदभाव के लागू करने की भी है। अपराधी चाहे कितना भी रसूख़दार क्यों न हो, उसे ऐसी सज़ा मिलनी चाहिए जो मिसाल बने और दूसरों के लिए इबरत साबित हो।
- घरों और शिक्षण संस्थानों में बच्चों की परवरिश इस तरह होनी चाहिए कि औरतों की इज़्ज़त, नैतिक मूल्य और बुनियादी मानवाधिकार उनकी सोच का हिस्सा बन जाएं, न कि सिर्फ किताबी बातें।
- जवाबदेही तय हो, हर मामले में यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि प्रशासन ने घटना को पहले क्यों नहीं रोका, और बाद में सिर्फ प्रतिक्रिया देकर क्यों संतुष्ट हो गया।
- कानून-व्यवस्था मज़बूत हो, फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनें, जांच समयबद्ध हो, और पुलिस राजनीति से ऊपर उठकर काम करे।
जब तक हम यह ज़िम्मेदारी नहीं लेंगे, तब तक अगली ख़बर भी किसी की अपनी बच्ची की होगी। हर बच्ची सुरक्षित हो, तभी यह देश सच में सुरक्षित कहलाएगा।
"क़ानून के ऐवानों(कमरों) में कब तक चलेगी बहस...
मासूम की पामाली(बर्बादी) का इंसाफ कहां है?"
रज़िया मसूद
सोशल एक्टिविस्ट, भोपाल