सीरते मुस्तुफा ﷺ (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) और सामाजिक न्याय
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समाज

सीरते मुस्तुफा ﷺ (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) और सामाजिक न्याय


आज का युग उत्तर आधुनिकतावाद (post modernism) का युग है। ज़िंदगी के हर क्षेत्र में नई-नई खोजें हो रही हैं। एआई और animal cloning जैसी खोजो से इंसान मंत्र मुग्ध है। आज देशों के बीच की दूरियां खत्म हो गई हैं। कम्युनिकेशन और ट्रांसपोर्टेशन के ऐसे साधन आ चुके हैं कि सालों और महीनों का काम दिनों, घंटों और मिनटों में मुमकिन हो गया है। पहले के मुकाबले, आज दौलत की कोई कमी नहीं है। असल में, आज धरती सोना उगल रही है। 

परंतु दूसरी ओर इन सारे संसाधन और खोज के बावजूद, आज लोगों को शांति और सुकून नहीं मिल रहा है, एक अनजानी  बेचैनी है, एक झुंझलाहट है जो लगातार लोगो के मस्तिष्क पर अपना प्रभाव जमा रही है। भौतिक दूरियाँ तो कम हो रही है मगर दिलो की दूरियाँ बढ़ती जा रही है। हर जगह अन्याय और अत्याचार का बाज़ार गरम है। दंगे, फसाद, नफरत और घृणा का अतिरेक, भीड़ द्वारा इन्सानो को पीट पीट कर मार डालनामकानो और इबादतगाहों पर बुलडोजर, यहाँ तक कि श्रद्धा के साथ मंदिरो पर चढ़ाये जा रहे चढ़ावे तक डकार लिए जा रहे हैं और किसी को रत्ती बराबार परवाह नहीं होती।

बलात्कारियों का सम्मान किया जा रहा है। नित नए प्रकार के फ़ित्ने जन्म ले रहे हैं। मानव स्वार्थी से स्वार्थी होता जा रहा है, नैतिकता और पवित्रता का अभाव है, सम्मान और विश्वास गायब हो रहे हैं, शांति और सद्भाव और प्रेम कहीं कोने में जा छुपे हैं। ऐसी कौन सी बुराई की कल्पना की जा सकती है जो समाज में मौजूद नहीं है, कन्या भ्रूण हत्या, यहां तक कि नरसंहार एक फैशन बन गया है। इस युग को हम क्या कहें

प्रलोभनों का युग! पापों का युग! अनैतिकता और उच्छृंखलता का युग! स्वार्थ और घृणा का युग! शैतानी समय का युग! याजूज और माजूज का युग! परंतु इन सभी दूषणों अंधविश्वासों, अत्याचार और नफरत को दूर करने के लिए क्या तरीके अपनाए जा रहे हैं। क्या ये तरीके सफल हो रहे हैं

आज ज़रूरत है उन तरीकों और उस नुस्खाए कीमिया की जो अल्लाह के आखरी रसूल हज़रत मुहम्मद ले कर आए थे। और जिन तरीको से उस अंधकारपूर्ण और भटकी हुई मानवता को इंसानियत के प्रकाश में लाया गया था। यह वह नुस्खा था जो दुनिया बनाने वाले ने अपने रसूल के माध्यम से पहुंचाया था। जिसने दुष्टो को संत बना दिया था और मृत प्राय लोगो को जीवन देने वाला बना दिया था। जिसने समाजी न्याय का वह शंख फूंका था जो आज भी कहीं कहीं अपना रंग दिखा रहा है। 

पैगंबर की सीरत सामाजिक न्याय और कानून की बालादस्ती का एक बेहतरीन उदाहरण है। पैगंबर ने मदीना में एक ऐसी व्यवस्था स्थापित की जहाँ अमीर और गरीब, ताकतवर और कमज़ोर सभी एक ही कानून के बंधन में बंधे थे। उन्होंने अपनी निजी ज़िंदगी में भी हमेशा कानून का पालन किया। कानून के राज का मतलब है कि कोई भी इंसान कानून से ऊपर नहीं है। आइए पैगंबर की जीवनी की रोशनी में इसके ज़रूरी सिद्धांतों को समझते हैं: 

1.समानता और संतुलन : हज़रत मुहम्मद की शिक्षा ने समाज में समानता और न्याय की वह आत्मा जगाई थी जिसने उन समस्याओ को जो सदियों से मानवता को घुन की तरह से खा रही थी, उन समस्याओ को समाप्त कर दिया। व्यक्ति और समाज के बीच का संतुलन, पूंजी और मेहनत के बीच का संतुलन और स्त्री और पुरुष के बीच का संतुलन। हज़रत मुहम्मद की सीरत के अध्ययन से पता चलता है कि इन गंभीर समस्याओ का अंत कैसे लाया गया। 

आप ने बताया की वास्तव में व्यक्ति ही अल्लाह के सामने उत्तरदायी है मगर समाज के बिना वह अपनी सार्थकता और अपनी पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि परस्पर सहयोग और परस्परिक अस्तित्व के बिना समाज की गाड़ी नहीं चल सकती। 

मजदूरो और गुलामो के बारे में आपने बताया कि अपने ग़ुलाम को, जो कुछ ख़ुद खाओ, वही उनको खिलाओ और जो ख़ुद पहनो, वही उनको पहनाओ। 

2.सबके लिए एक कानून (समानता): पैगंबर की जीवनी हमें बताती है कि कानून सबके लिए एक जैसा है। इस्लाम में अमीर और गरीब के लिए अलग-अलग नियम नहीं हैं। अरब के उस अंधकारमय युग में आज ही की तरह का अंधकार था। जब किसी छोटे और निम्न कबीले का व्यक्ति कोई गुनाह करता था तो उसे सख्त सजा दी जाती थी जबकि किसी बड़े कबीले या उच्च वंश का कोई व्यक्ति गुनाह करता था तो उसे कोई सज़ा नहीं मिलती थी। आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया की कोई बड़ा नहीं, कोई छोटा नहीं, कोई उच्च नहीं कोई, नीच नहीं, सब एक आदम की संतान है। 

सब समान हैं और सब पर एक ही तरह के कानून की हुक्मरानी है। उनके समय में जब एक उच्च कबीले की स्त्री ने चोरी की और और उसकी सिफ़ारिश के लिए आपके चहेते हज़रत ज़ैद रज़ि० को उनके पास भेजा गया तो हज़रत मुहम्मद बहुत गुस्सा हुए और फरमाया की खुदा की क़सम अगर फातिमा बिंते मुहम्मद (हज़रत मुहम्मद की पुत्री) भी अगर चोरी करती है तो उसके भी हाथ काटे जाएँगे। 

आज देखिये कानून की बाला दस्ती का क्या हाल है। कोई छोटी मछली फँसती है तो सारे गुनाह उस के सर डाल कर उसकी जिंदगी नष्ट कर दी जाती है और कोई मोटा मगर मच्छ फँसता है तो कानून का जाल तोड़ कर दनदनाता फिरता है। हज़रत मुहम्मद का यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि कानून की नज़र में सब बराबर हैं। 

3.शासक भी कानून से बंधे होते हैं: कानून के राज का मतलब है कि ताकतवर भी कानून के आगे झुकते हैं। अपने आखिरी उपदेश (हज्जतुल विदा) में, स्वयं उन्होंने ऐलान किया कि अगर किसी की बेइज्ज़ती हुई तो वह मुझ से बदला ले सकता है। यह शासक द्वारा कानून के पालन का सबसे बड़ा उदाहरण है। उन्होने फरमाया था कि इस्लाम आने से पहले के तमाम ख़ून खत्म कर दिए गए। (अब किसी को किसी से पुराने ख़ून का बदला लेने का हक़ नहीं) और सबसे पहले मैं अपने ख़ानदान का ख़ून–रबीआ इब्ने  हारिस का ख़ून– समाप्त करता हूँ (यानि उनके कातिलों को क्षमा करता हूँ)|

अज्ञानकाल के सभी ब्याज ख़त्म किए जाते हैं और सबसे पहले मैं अपने ख़ानदान में से अब्बास इब्न मुत्तलिब का ब्याज ख़त्म करता हूँ।

4. अल्पसंख्यकों और दूजे धर्मावलंबियो के अधिकारों की सुरक्षा: मदीना राज्य में मुसलमानों और गैर मुस्लिमो (यहूदियों) के बीच एक लिखित समझौता हुआ जिसे "मदीना का समझौता" कहा जाता है। इस समझौते ने यह कानून बना दिया कि हर धर्म के मानने वालों को अपने धार्मिक और सामाजिक फैसले लेने की पूरी आज़ादी और सुरक्षा होगी। इसमें किसी से किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जाएगा। 

5. न्याय और निष्पक्षता का इंतज़ाम: पैगंबर के जीवन में न्याय में देरी या बीच-बचाव की कोई गुंजाइश नहीं थी। अगर फैसला मुस्लिमो या खलीफा के खिलाफ भी होता, तो उसे मान लिया जाता था। एक बार एक व्यक्ति आप की सेवा में उपस्थित हुआ और कहा कि किसी युद्ध के अवसर पर जब हज़रत आप सेना को व्यवस्थित जमा रहे थे तब आपके हाथ में एक तीर था जो मुझे चुभ गया था। मैं चाहता हूँ कि मुझे उसका बदला दिया जाये, उन्होंने तीर उसके हाथ में पकड़ाया और कहा कि ले लो बदला!। 

उस व्यक्ति ने फिर कहा कि उस समय मेरे शरीर पर कोई वस्त्र नहीं था और आप तो कुर्ता पहने हुए हो। हज़रत मुहम्मद ने अपना कुर्ता उतार दिया और कहा कि अब बदला ले लो। उस व्यक्ति ने उनके शरीर को चूम लिया और कहा कि मैं इसी सामाजिक न्याय का उदाहरण लोगो के सामने लाना चाहता था। उनका सबसे आसान सा फ़ॉर्मूला था: न्याय + बराबरी = कानून का राज।

6. स्त्री अधिकार और स्त्रीत्व की रक्षा: हज़रत मुहम्मद ने अपने पूरे जीवन काल में और उनके बाद उनके पुनीत साथियो ने स्त्री अधिकार और स्त्रीत्व की रक्षा को वो उदाहारण प्रस्तुत किए हैं जो आज तक कोई धर्म और संस्कृति नहीं कर पाई है। उन्होंने स्त्री को स्त्री के रूप में समानता और अधिकार दिए  जब कि आज पश्चिम जगत उसे पुरुष के क्षेत्र में लाकर पुरुष के समान बनाने का प्रयत्न कर रहा है और इस तरह उस पर दोहरी ज़िम्मेदारियों का बोझ डाल रहा है। 

अपने अंतिम प्रवचन में हज़रत मुहम्मद   ने फरमाया था कि महिलाओं के मामले में अल्लाह से डरो, तुम्हारा महिलाओं पर और महिलाओं का तुम पर अधिकार है। महिलाओं के मामले में मैं तुम्हें वसीयत करता हूँ कि उनके साथ भलाई का रवैया अपनाओ।

यह तो मात्र कुछ नमूने हैं जो बताते हैं कि सामाजिक न्याय के लिए सीरते नबवी में क्या संदेश और कार्यक्रम छुपा हुआ है। अगर आज इस संदेश को जीवन में चरितार्थ किया जाता है तो हम पुन: मानवता का स्वर्ण युग पा सकेंगे।


डॉ. सलीम पाटीवाला

गुजरात 

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