वे महिला स्वतंत्रता सेनानी जिन्हें ज़माना याद करता नहीं
15 अगस्त 2026 को हम भारतीय देश का 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहे हैं। इस दिन देश के लिए बलिदान देने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को हम याद करते हैं, उनकी वीर गाथाएं स्कूलों में सुनाई जाती हैं लेकिन इस शोर में अकसर हम महिला स्वतंत्रता सेनानियों को भूल जाते हैं। हालांकि देश की आज़ादी में पुरुषों का जितना योगदान रहा है, यदि उस समय के अनुसार अवलोकन किया जाए तो महिलाओं का भी योगदान कम नहीं है लेकिन उनकी कहानियों और संघर्षों को अनदेखा कर दिया जाता है। हर संघर्ष में पुरुषों से कदमताल मिलाकर संघर्ष करते हुए महिलाएं भी हमें मिल जाएंगी। आइए कुछ ऐसी ही महिला स्वतंत्रता सेनानियों के संबंध बात करते हैः-
भीमा बाई होल्कर
1817 में भीमा बाई होल्कर ने लॉर्ड कर्नल मैल्कम के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध की अगुवाई की और जीत हासिल की। वह इंदौर के महाराजा यशवंत राव होल्कर की पुत्री थीं।
कमलादेवी चट्टोपाध्याय
देश की आज़ादी से पहले महिलाओं के भविष्य की चिंता करते हुए उन्होने ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए लुघ एवं कुटीर उद्योंगो को बढ़ावा देने का प्रयास किया। उन्होंने स्वदेशी उद्योंगों में महिलाओं को काम दिलाने के लिए संघर्ष किया।
बेगम हज़रत महल
लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह की दूसरी पत्नी बेगम हज़रत महल ने अपने पति के निर्वासन के बाद रियासत को बरकरार रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1857 की क्रांति में उन्होंने सक्रिय रुप से भाग लिया।
अरुणा आसफ अली
1942 के अंग्रेज़ों भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। इस आंदोलन की शुरुआत में उन्होंने मुंबई के गोवालीया मैदान में बहादुरी दिखाते हुए कांग्रेस का झंडा फहराया था जिसके बाद उनकी बहादुरी के चर्चे देशभर में होने लगे थे।
बेगम महबूब फ़ातिमा
13 अप्रैल 1932 को जलियांवाला बाग हत्याकांड की बरसी मनाने और ब्रिटिश दमन का विरोध करने के लिए दिल्ली के चांदनी चौक पर एक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया। जिसका नेतृत्व बेगम महबूब फ़ातिमा अन्य साथियों के साथ कर रही थीं। ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध नारेबाज़ी करने के कारण पुलिस ने उन्हें गिफ्तार कर लिया। ब्रिटिश राजशाही के विरुद्ध युद्ध छेड़ने और अंशाति फैलाने के जुर्म में उन्हें 6 महीने कठोर कारावास की सज़ा सुनाई गई। इस सज़ा के साथ ही वह दिल्ली की पहली ऐसी मुस्लिम महिला बनीं जिन्हें स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जेल भेजा गया।
दुर्गाबाई देशमुख
एक सामाजिक कार्यकर्ता, वकील और राजनीतिज्ञ, उन्होंने महिला अधिकारों, श्रम अधिकारों और हाशिए पर पड़े लोगों के उत्थान के लिए काम किया। उनके प्रयासों ने स्वतंत्रता के बाद समावेशी सामाजिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया।
उषा मेहता
एक प्रसारक और गांधीवादी कार्यकर्ता, उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भूमिगत कांग्रेस रेडियो का नेतृत्व किया, और जनता को प्रेरित करने और सूचित करने के लिए वायु तरंगों का उपयोग किया।
बीबी अम्तुस सलाम
वह एक सामाजिक कार्यकर्ता और महात्मा गांधी की शिष्या थीं। उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विभाजन के बाद भारत आए शऱणार्थियों के पुनर्वास के लिए भी उन्होंने बहुत प्रयास किए।
रानी गाइदिनल्यू
वह मणिपुर की एक प्रमुख नागा राष्ट्रवादी महिला नेता थीं, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ नागा राष्ट्रवादियों के आंदोलन की कमान संभाली थी।
मैडम भीकाजी कामा
वह दादाभाई नौरोजी से प्रभावित थीं और यूनाइटेड किंगडम में भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बनीं। उन्होंने 1907 में स्टटगार्ट (जर्मनी) में अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में पहला राष्ट्रीय ध्वज फहराया, फ्री इंडिया सोसाइटी की स्थापना की और अपने क्रांतिकारी विचारों के प्रचार के लिए 'वंदे मातरम' पत्रिका शुरू की।
राजकुमारी अमृत कौर
वह 1919 से ही गांधीजी की करीबी अनुयायी थीं। उन्होंने 1930 के नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया। वे स्वतंत्र भारत की पहली स्वास्थ्य मंत्री बनीं।
कल्पना दत्ता
एक प्रसिद्ध भारतीय महिला क्रांतिकारी जिन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों का रास्ता अपनाकर देश को आज़ादी दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वह सूर्यसेन द्वारा स्थापित हिंदुस्तान रिपबल्किन आर्मी की सदस्य थीं।
आबदी बानो बेगम
प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी बंधु मोहम्मद अली और शौकत अली की मां आबदी बानो बेगम जिन्हें लोग बी अम्मा के नाम से जानते थे। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं को एकजुट करने के लिए सक्रिया भूमिका निभाई। वह सार्वजनिक मंच से अंग्रेज़ों के खिलाफ ऐसे भाषण देती थीं कि लोग सुनकर मोहित हो जाते थे।
बेगम अनीस किदवई
1906 में उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में जन्मीं बेगम अनीस किदवई ने महिला कांग्रेस कमेटी के सचिव के रुप में कार्य करते हुए स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी शुरु की। 1947 में देश विभाजन के दौरान उनके पति शफ़ी अहमद किदवई की क्रूरतापूर्वक हत्या कर दी गई। जिसके बाद वह सीधे महात्मा गांधी के पास पहुंची और सांप्रदायिक सौहार्द स्थापित करने के लिए काम शुरु किया। वह 1956 से 1968 तक राज्यसभा सांसद भी रहीं और कई पुस्तकें भी लिखीं। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक “आज़ादी की छांव में” 1974 में प्रकाशित हुई थी।
इन महिलाओं की शौर्यगाथा इस बात का प्रतीक है कि देश की आज़ादी व सामाजिक परिवर्तन में पुरुषों के साथ महिलाओं का भी योगदान रहा है। यह तो कुछ नाम हैं इसके अलावा अनेकों गुमनाम महिलाएं भी मौजूद हैं जिन्होंने समाज में आज़ादी की ज्वाला फूंकने में महत्वपूर्ण किरदार निभाया।
19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी के प्रारंभ में जैसे-जैसे देश का स्वतंत्रता आंदोलन ज़ोर पकड़ता गया, महिलाएँ स्वतंत्रता संग्राम को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रहीं। विभिन्न स्वतंत्रता अभियानों और आंदोलनों में उनकी सक्रिय भागीदारी ने संघर्ष की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
महिलाओं की भागीदारी का एक उल्लेखनीय उदाहरण 1905-1908 का स्वदेशी आंदोलन भी था। इस दौरान, महिलाओं ने स्वदेशी वस्तुओं के प्रचार और ब्रिटिश उत्पादों के बहिष्कार के लिए पूरे जोश के साथ एकजुटता दिखाई। वे स्वतंत्रता और घरेलू वस्तुओं के उपभोग की प्रबल समर्थक बन गईं, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश अर्थव्यवस्था के प्रभुत्व को चुनौती देना था।
यह महिलाएं हमें इस बात की प्रेरणा देती हैं कि समय और परिस्थिति जैसी भी हो लेकिन यदि हम अपने साहस के दम पर अडिग खड़े हो जाएं और संघर्ष का रास्ता अपना लें तो बदलाव आकर ही रहता है। आवश्यकता है हमें इतिहास पढ़ने की, उससे सीख लेने की और सही रास्ता चुनने की।
सहीफ़ा ख़ान
उप संपादक