नफ़्स पर कंट्रोल
नफ़्स क्या है?
हदीस के अनुसार "नफ़्स" से आशय व्यक्ति का वह आंतरिक हिस्सा है जिसमें इच्छा, निर्णय, भावना एवं अधिकार सब शामिल हैं। यही व्यक्ति की आंतरिक शक्ति है, जो उसे नेकी या बुराई की ओर ले जा सकती है। इस्लाम के अनुसार नफ़्स का संबंध केवल शरीर से नहीं, बल्कि दिल और रूह से भी है।
हदीस में है किः
“अपने नफ़्स का हिसाब लो, इससे पहले कि तुमसे तुम्हारे नफ़्स का हिसाब लिया जाए।”- (तिर्मिज़ी)
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
"जन्नत को नापसंद चीज़ों से ढक दिया गया है और जहन्नम को ख़्वाहिशों से।"- (बुख़ारी, मुस्लिम)
यही वह नफ़्स है जिसका आख़िरत में हिसाब लिया जाएगा।
क़ुरआन मजीद में भी अनेक स्थानों पर नफ़्स का उल्लेख हुआ है। अल्लाह तआला फ़रमाता है:
إِنَّ اللَّهَ اشْتَرَىٰ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ أَنفُسَهُمْ وَأَمْوَالَهُم بِأَنَّ لَهُمُ الْجَنَّةَ
"निस्संदेह अल्लाह ने मोमिनों से उनकी जानें (नफ़्स) और उनके माल जन्नत के बदले खरीद लिए हैं।" - (سورة التوبة: 111)
हज़रत अशरफ़ अली थानवी रहमतुल्लाह अलै० अपनी पुस्तक "इस्लाह-ए-नफ़्स" में लिखते हैं:
"नफ़्स व्यक्ति के अंदर मौजूद वह आंतरिक शक्ति है जो ख़्वाहिशों, जज़्बात और रुझानों का केंद्र है। यदि यह शरीअत और अक़्ल के अधीन रहे तो इंसान नेकी, तक़वा और क़ुर्ब-ए-इलाही की ओर बढ़ता है, और यदि यह ख़्वाहिशों के अधीन हो जाए तो गुनाह और नैतिक बुराइयों का कारण बनता है।"
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से नफ़्स (Self / Psyche)
आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार इंसान का व्यक्तित्व उसके चेतन (Conscious), अवचेतन (Unconscious), भावनाओं, इच्छाओं, प्रेरणा और व्यवहार का सम्मिलित रूप है। यही सभी तत्व मिलकर उसके सोचने, महसूस करने और व्यवहार करने के तरीक़े को निर्धारित करते हैं।
इस्लामी और आधुनिक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से नफ़्सः-
इस्लाम कहता है:
इंसान का व्यक्तित्व दिल (क़ल्ब), रूह, अक़्ल और नफ़्स से मिलकर बनता है।
आधुनिक मनोविज्ञान कहता है:
इंसान का व्यक्तित्व Brain (मस्तिष्क), Cognition (संज्ञान), Emotion (भावनाएँ) और Behaviour (व्यवहार) से निर्मित होता है।
इस्लाम के अनुसार नफ़्स इंसान की वह आंतरिक शक्ति है जो भलाई (ख़ैर) और बुराई (शर) दोनों की ओर झुक सकती है।
क़ुरआन के अनुसार नफ़्स की तीन अवस्थाएँ हैं:
- नफ़्स-ए-अम्मारा — बुराई की ओर उकसाने वाला।
- नफ़्स-ए-लव्वामा — गुनाह पर स्वयं को धिक्कारने वाला।
- नफ़्स-ए-मुतमइन्ना — अल्लाह की याद और उसकी आज्ञाकारिता से संतुष्ट रहने वाला।
इस्लाम तज़किया-ए-नफ़्स (नफ़्स की शुद्धि) पर ज़ोर देता है। इसका उद्देश्य केवल मानसिक शांति प्राप्त करना नहीं, बल्कि अल्लाह की रज़ा, ऊँचा चरित्र और आख़िरत की सफलता हासिल करना है।
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
وَنَفْسٍ وَمَا سَوَّاهَا ۞ فَأَلْهَمَهَا فُجُورَهَا وَتَقْوَاهَا ۞
"क़सम है नफ़्स की और उस ज़ात की जिसने उसे संतुलित बनाया, फिर उसे उसकी बुराई और उसकी परहेज़गारी (तक़वा) का ज्ञान दे दिया।"
(سورة الشمس: 7-8)
यह आयत बताती है कि अल्लाह ने इंसान के भीतर अच्छाई और बुराई दोनों को पहचानने की क्षमता रखी है। अब यह इंसान पर निर्भर है कि वह किस रास्ते को अपनाता है।
क़ुरआन की रोशनी में नफ़्स की तीन अवस्थाएँ
तज़किया-ए-नफ़्स (नफ़्स की शुद्धि)
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
قَدْ أَفْلَحَ مَن زَكَّاهَا ۞ وَقَدْ خَابَ مَن دَسَّاهَا ۞
"निश्चय ही सफल हुआ वह जिसने अपने नफ़्स को पाक किया, और असफल हुआ वह जिसने उसे गंदा कर दिया।"
(سورة الشمس: 9-10)
तज़किया-ए-नफ़्स का अर्थ यह नहीं कि इंसान अपनी सभी प्राकृतिक इच्छाओं को समाप्त कर दे, बल्कि उनका सही, संतुलित और शरीअत के अनुसार उपयोग करे।
जिस प्रकार किसान खेत से खरपतवार निकाल देता है ताकि फ़सल अच्छी तरह बढ़ सके, जिस प्रकार माली बगीचे की सफ़ाई करता है, और जिस प्रकार मनुष्य अपने शरीर की गंदगी दूर करता है, उसी प्रकार एक मोमिन अपने नफ़्स को घमंड, ईर्ष्या, लालच, वासना और अन्य नैतिक बुराइयों से पाक करता है, ताकि उसके भीतर की अच्छी प्रवृत्तियाँ विकसित हो सकें।
यदि नफ़्स की परवरिश क़ुरआन और सुन्नत के अनुसार न की जाए तो वही इंसान को गुनाह, तकब्बुर, हसद, बुख़्ल, शहवत और दुनिया की मोहब्बत की ओर ले जाता है।
लेकिन यदि उसका तज़किया किया जाए तो यही नफ़्स इंसान को तक़वा, इख़लास, अच्छे चरित्र और अल्लाह की आज्ञाकारिता की ओर ले जाता है।
तज़किया-ए-नफ़्स के जीवंत उदाहरण
1. हज़रत ख़दीजा रज़ि० की क़ुर्बानी
हज़रत ख़दीजा रज़ि० ने इस्लाम की ख़ातिर अपना समस्त धन अल्लाह के रसूल ﷺ और दीन की सेवा में खर्च कर दिया। उन्होंने शिअब-ए-अबी तालिब की कठिन परिस्थितियों को अत्यंत धैर्य और सब्र के साथ सहन किया। उनका जीवन त्याग, सब्र, ईमान और तज़किया-ए-नफ़्स का एक उत्कृष्ट और प्रेरणादायक उदाहरण है।
2.हज़रत उम्मे सुलैम रज़ि०
हज़रत उम्मे सुलैम रज़ि० का सब्र इसका उज्ज्वल उदाहरण है। जब उनके बेटे का इंतिकाल हुआ और उनके शौहर हज़रत अबू तल्हा रज़ि० घर से बाहर थे, तो उन्होंने अत्यंत सब्र और संयम का परिचय दिया। शौहर के लौटने तक सब्र किया, फिर बड़ी हिकमत और नरमी के साथ उन्हें इस घटना की सूचना दी। इसके बाद वे रसूलुल्लाह ﷺ की ख़िदमत में हाज़िर हुईं। आपने ﷺ उनके लिए दुआ फ़रमाई, जिसके परिणामस्वरूप अल्लाह तआला ने उनके घराने में बरकत अता फ़रमाई। यह घटना सब्र, अल्लाह की रज़ा पर राज़ी रहने और भावनाओं पर नियंत्रण रखने की श्रेष्ठ मिसाल है।
3.हज़रत आयशा सिद्दीक़ा रज़ि०
हज़रत आयशा रज़ि० और वाक़िआ-ए-इफ़्क़ भी तज़किया-ए-नफ़्स की महान मिसाल है। जब उन पर झूठा इल्ज़ाम लगाया गया, तो उन्होंने जल्दबाज़ी में किसी पर आरोप नहीं लगाया, बल्कि सब्र, तवक्कुल और अल्लाह तआला पर पूर्ण भरोसे के साथ इंतज़ार किया। अंततः अल्लाह तआला ने सूरह नूर में उनकी पाकदामनी की घोषणा कर दी, जो क़यामत तक के लिए उनकी बेगुनाही का प्रमाण है।
4.हज़रत फ़ातिमा ज़हरा रज़ि०
उनकी ज़िंदगी क़नाअत और ज़ुह्द का सर्वोत्तम उदाहरण थी। वे घर के सभी काम स्वयं करती थीं, यहाँ तक कि उनके हाथों पर मेहनत के निशान पड़ गए। जब उन्होंने एक ख़ादिम की इच्छा व्यक्त की, तो रसूलुल्लाह ﷺ ने उन्हें सोने से पहले 33 बार سبحان الله, 33 बार الحمد لله और 34 बार الله أكبر पढ़ने की तालीम दी। उन्होंने इस नसीहत को खुशी से स्वीकार किया और दुनियावी सुविधा पर रूहानी दौलत को प्राथमिकता दी।
हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ि० ने ग़ज़वा-ए-तबूक के अवसर पर अपना पूरा माल अल्लाह की राह में पेश कर दिया। जब रसूलुल्लाह ﷺ ने पूछा कि अपने घरवालों के लिए क्या छोड़ा है, तो उन्होंने अर्ज़ किया: "अल्लाह और उसका रसूल हमारे लिए काफ़ी हैं।" यह ईसार, तवक्कुल और दुनिया से बे-रग़बती की महान मिसाल है।
हज़रत अबू दरदा रज़ि० ने अल्लाह की रज़ा के लिए अपना प्रिय बाग़ वक़्फ़ कर दिया। वहीं हज़रत उमर इब्नुल ख़त्ताब रज़ि० की ज़िंदगी इंसाफ़, विनम्रता और तज़किया-ए-नफ़्स का उज्ज्वल नमूना थी। बैतुल मुक़द्दस में प्रवेश करते समय उनका ग़ुलाम ऊँट पर सवार था और वे स्वयं पैदल चल रहे थे। सत्ता के सर्वोच्च पद पर पहुँचने के बाद भी उनके दिल में घमंड नहीं आया, बल्कि विनम्रता और न्याय उनकी पहचान बने रहे।
ये सभी महान हस्तियाँ उस क़ुरआनी तरबियत का परिणाम थीं, जिसका उल्लेख अल्लाह तआला ने कुरआन मजीद में फ़रमाया है:
﴿هُوَ الَّذِي بَعَثَ فِي الْأُمِّيِّينَ رَسُولًا مِّنْهُمْ يَتْلُو عَلَيْهِمْ آيَاتِهِ وَيُزَكِّيهِمْ وَيُعَلِّمُهُمُ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ﴾
(سورۃ الجمعہ: 2)
सहाबा-ए-किराम (रज़ियल्लाहु अन्हुम) के तज़किया-ए-नफ़्स का उद्देश्य केवल नैतिक उत्कृष्टता, अल्लाह की रज़ा और आख़िरत की कामयाबी था। उनकी जैसी तरबियत की मिसाल क़यामत तक नहीं मिल सकती। लेकिन क़ुरआन और सुन्नत आज भी हमारे लिए हिदायत का स्रोत हैं। यदि हम ईमानदारी और इख़लास के साथ इन शिक्षाओं पर अमल करें, तो अपने नफ़्स की इस्लाह, ऊँचे अख़लाक़ और अल्लाह की रज़ा हासिल करने की कोशिश कर सकते हैं।
रसूलुल्लाह ﷺ तज़किया-ए-नफ़्स के लिए यह दुआ फ़रमाया करते थे:
اللَّهُمَّ آتِ نَفْسِي تَقْوَاهَا، وَزَكِّهَا، أَنْتَ خَيْرُ مَنْ زَكَّاهَا، أَنْتَ وَلِيُّهَا وَمَوْلَاهَا
“ऐ अल्लाह! मेरे नफ़्स को उसका तक़वा अता फ़रमा और उसे पाक कर दे। तू ही सबसे बेहतर पाक करने वाला है। तू ही उसका संरक्षक और मालिक है।”
सबीहा ख़ातून सिद्दीक़ी
भोपाल, मध्य प्रदेश