“मैं हमेशा तेरे साथ हूं”
वह साधारण सी दिखने वाली लड़की यूं तो बेहद शांत और संतुष्ट दिखाई देती थी, लेकिन उसके अंदर एक अजीब सी कयामत बरपा थी। अपने चेहरे पर हमेशा मध्यम मुस्कान सजाकर लोगों को अपने आंतरिक युद्ध से अनजान रखने में वह महारथ हासिल कर चुकी थी। अकसर वह लोगों की भीड़ में अपने अंदर के शोर से भागने के लिए जा बैठती, लेकिन उसे निराशा ही हाथ लगती। यूं तो वह ख़ूब ख़िलख़िलाती, बातें करती और मुस्कुराते हुए सबसे मिलती, लेकिन दिल फ़िर भी किसी अनकही तक़लीफ़ में लिप्त रहता। उसके पास अपनी मिल्कियत जताने को एक ही कमरा था और वह था उसके दिल का कमरा। और वह भी सपनों, भय, कश्मकश और सवालों की भरमार से अटा पड़ा। ऐसे सवाल जो उसे लगातार बेचैन रखते थे। रात के अंधेरे में, जब सब अपने सपनों में गुम होते, वही सवाल उसके अस्तित्व को झिंझोड़ देते। जवाब की तलाश में वह घंटो छत को यूं तकती रहती जैसे वहां उसके जवाब लिखे हों। कभी डूबते सूरज की किरणें वह इस आशा से देखती कि शायद वही उसके सवालों का जवाब दे दें। जब थक जाती तो स्वयं से संवाद कर स्वयं को ही दिलासा देती। वह इतनी मज़बूत तो नहीं थी, लेकिन ज़िदगी हर सबक सिखा देती है, और मज़बूती शायद उसने ज़िंदगी से सीख ली थी। वह अंदर से टूट चुकी थी, लेकिन एक अरमान बाकी था कि काश कोई उसकी “सब ठीक है” के पीछे छिपे “कुछ ठीक नहीं” को समझ पाए। लोगों की भीड़ उसे अकसर घेरे रहती, लेकिन अंदर से वह अकेली थी------बिल्कुल अकेली। शायद अकेलापन ही उसका असली साथी था। कहने को तो ख़ामोशी उसकी पसंद थी, लेकिन हमेशा नहीं। उसे पता था कि जो लोग उससे मुहब्बत का दावा करते हैं, अगर वह उसकी ख़ामोशी नहीं समझ सकते, उसकी आंखें नहीं पढ़ सकते, तो उसके शब्द क्या ही समझ लेंगे। कभी दिल करता कि सबकुछ कह डाले, लेकिन शब्द होठों पर आकर ठहर जाते। आंसूओं का सैलाब उमड़ पड़ता और वह ख़ुदा से शिकायत करने लगती कि इतनी बड़ी दुनिया में क्या कोई एक इंसान भी ऐसा नहीं जो उसकी भावनाएं, उसकी अनुभूति और उसकी चुप्पी को शब्दों का जामा पहनाए बिना समझ सके? उसकी आंखें पढ़ सके? उसके आंसू पोंछ सके? जिसके सामने शब्द चुनने ना पड़ें, ख़ुद को साबित करने की ज़रुरत पेश ना आए, और जिसके साये में बला का सुकून मिले। तभी मानो ऐसा लगा जैसे दिल में खुदा की ओर से यह बात उतरी होः “मैं हूं ना, तेरी शह रग़ से भी ज़्यादा करीब, तुझे समझने वाला, तुझे तुझ से ज़्यादा जानने वाला, तेरी नियत देखने वाला, तेरी गलतियों पर परदा डालने वाला, तुझे सत्तर मांओं से बढ़कर चाहने वाला। मैं तुझे कैसे अकेला छोड़ सकता हूं? मैं हमेशा तेरे साथ हूं।” सफ़िया शफ़क़
मेवात, हरियाणा