समझदार परी
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चहकता बचपन

समझदार परी


"रहने दो,मत भेजना...”

“ख्याल किया करो…गुड़िया लेकर यहीं रख लो..”

“परी वापस आकर खेल लेगी..."

“अरे ले जाने दीजिए ना..देखिए उसका कितना मन है?”

“बिल्कुल नहीं! गुड़िया लेकर बाहर नहीं जाना है..”

बाबा ने जब सख़्ती से मना करते हुए मम्मा से कहा तब मम्मा परी को नई गुड़िया लेकर बाहर खेलने जाने के लिए बोल रही थीं। परी खुशी से झूमते हुए अपनी मनपसंद गुड़िया को हवा में लहरा रही थी। वो गुड़िया अभी-अभी उसके बाबा ही लाए थे।

"आप परी को क्यों मना कर देते हैं? मैंने कई बार देखा है, आप कोई चीज़ बाहर नहीं ले जाने देते। कुछ दिनों से तो ज़्यादा ही सख्ती करते हैं..."

परी अब उदास शक्ल और भरे मन के साथ वो गुड़िया घर में रखकर, बाबा को कनखियों से देखते हुए बाहर जाने लगी। तभी बाबा ने आवाज़ दी —

"परी बेटा, मेरे पास आओ।"

परी उदास मुँह बनाए आई। बाबा ने प्यार से कहा —

"बेटा, वापस आकर खेल लेना, ये तुम्हारी ही तो है... जाओ, खुश होकर अपनी सहेलियों के साथ खेलो।"

बाबा के लाड़ करने की वजह से वो झट से मुस्कुराती हुई भाग गई।

---

अँधेरा छाने से पहले मम्मा ने परी को आवाज़ लगाई —

"परी बेटा, आ जाओ, अँधेरा होने को आया।"

बाबा ने देखा वह अपनी अपनी सहेलियों के साथ खेल रही है।

तभी अचानक पीछे से बाबा की आवाज़ आई और उन्होंने थोड़ी सख्त आवाज़ में कहा —


"हटो तुम, मैं बुलाता हूँ।"

मम्मा हैरान हो गईं। फिर बाबा ने ज़ोर से आवाज़ दी —

"परी, अब घर आओ! क्या तुम्हें मालूम नहीं, आने का समय हो गया है!"

मम्मा हैरान-परेशान, बाबा के लहजे की तीखेपन को महसूस करते हुए पूछ बैठीं —

"ऐसा क्या हुआ है कि आपने कुछ दिनों से अपना व्यवहार ही बदल लिया है परी के लिए? क्या आप नाराज़ हैं? क्या उससे कोई गलती हुई है?"

बाबा कुछ सोचते हुए बोले —

"अच्छा, ठहरो। परी को आ जाने दो, एक बहुत ज़रूरी बात बतानी है।"

---

इतने में परी भी भागकर घर में आ गई और बाबा को अचंभे के साथ देख रही थी।

बाबा ने परी के सिर पर हाथ फेरते हुए और मम्मा की तरफ देखकर बताना शुरू किया —

"बेटा, हमने वो गुड़िया तुम्हें बाहर ले जाने से इसलिए मना किया था क्योंकि पिंकी तुम्हारी पक्की सहेली है ना? और उसके बाबा गुड़िया नहीं ला सकते। मैं एक और लाऊँगा, तब तुम उसे भी एक देना और साथ मिलकर खेलना… जो चीज़ सहेली के पास न हो वो उसको नहीं दिखाते बेटा,उसका मन विचलित हो जाएगा।"

फिर बाबा ने गंभीरता से कहा —

"और  गुड्डी की माँ अभी कुछ दिन पहले ही उसे छोड़कर हमेशा के लिए चली गई हैं। हमारे नबी पाक ﷺ का हुक्म है — किसी यतीम के सामने अपने बच्चे को प्यार से मत बुलाओ, क्योंकि उसकी माँ उसको अब ऐसे नहीं पुकारती, वह अपनी माँ को याद करके उदास हो जाएगी।"

अब परी और मम्मा को सारा माजरा समझ आ गया कि क्यों बाबा पिछले कुछ दिनों से ऐसा बर्ताव कर रहे थे। फ़िर बाबा ने गंभीर लहजे में परी को समझाते हुए कहाः- 

"एक बात का हमेशा ख्याल रखना बेटा — कभी तुम्हारी किसी सहेली का तुम्हारी वजह से दिल न दुखे।"

"मेरी बेटी बहुत समझदार है, वो समझ गई होगी न मेरी बात?"

---


परी मुस्कुराते हुए बाबा का हाथ थामकर बोलीः—


"बाबा, परी बहुत समझदार है। वो ख्याल रखेगी अपने दोस्तों का... और अपनी चीज़ें भी उनसे शेयर करेगी!"

मम्मा को भी समझ आ गया। उन्होंने सहमति और विनम्रता के साथ सिर हिलाया। फिर अल्लाह का शुक्र अदा करके वापस काम में लग गईं।


शिफ़ा उस्मानी

कोटा, राजस्थान

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