बुजुर्ग: बोझ नहीं, सम्मान और आशीर्वाद की छांव
किसी भी समाज की असल पहचान इस बात से नहीं होती कि उसने कितनी ऊंची इमारतें बनाई या उसकी अर्थव्यवस्था कितनी मजबूत है, बल्कि इस बात से होती है कि वहां के बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार हो रहा है। आज के दौर में हम प्रगति को अक्सर तकनीक, शिक्षा और बेहतर जीवन स्तर के पैमाने पर मापते हैं, लेकिन एक गहरा और चुभने वाला सवाल हमारे सामने खड़ा है: अगर हमारे घर के सबसे अनुभवी और आदरणीय सदस्य स्वयं को अकेला, उपेक्षित या बोझ महसूस करने लगें, तो हम वास्तव में कैसी तरक्की कर रहे हैं?
चिकित्सा विज्ञान की प्रगति ने इंसान की उम्र तो बढ़ा दी है, लेकिन बढ़ती उम्र के साथ मिलने वाली उस गरिमा और आत्मीयता में कमी आई है। यह मुद्दा अब केवल कुछ परिवारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह पूरे समाज की एक कड़वी हकीकत बन चुका है। हमें खुद से पूछना होगा कि क्या हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहां बूढ़ा होने का मतलब केवल अकेलापन और उपेक्षा है?
आज जब हम अपने बुजुर्गों के मन को टटोलते हैं, तो वहां बीमारी या मौत से भी बड़ा एक डर दिखाई देता है—वह डर है अपनों पर निर्भर होने का या अनचाहा महसूस होने का। बहुत से माता-पिता चुपचाप इस फिक्र में घुलते रहते हैं कि क्या उनके बच्चों के पास उनके लिए समय होगा, क्या वे कभी किसी के लिए बोझ बन जाएंगे, या क्या कोई उनकी बात सुनने वाला बचेगा? यह सोच ही अपने आप में एक त्रासदी है।
जिस परिवार को खड़ा करने में उन्होंने अपनी पूरी उम्र खपा दी, उसी घर में स्वयं को 'फालतू' समझना दिल को तोड़ देने वाला एहसास है। हालांकि, इसके लिए हमें केवल नई पीढ़ी को दोष देकर बात खत्म नहीं करनी चाहिए। आज की जीवनशैली बदल चुकी है; काम का दबाव, छोटे घर और भागदौड़ भरी जिंदगी ने रिश्तों के बीच एक अनजानी दूरी पैदा कर दी है। आज की महिलाएं भी घर, बच्चों की पढ़ाई और करियर के बीच संतुलन बनाने की कोशिश में थकी हुई हैं। इरादे शायद बुरे न हों, लेकिन इस आपाधापी में बुजुर्ग घर के केंद्र से हटकर हाशिए पर चले गए हैं।
पुराने समय में दादा-दादी घर की धड़कन हुआ करते थे, जो न केवल बच्चों को पालते थे बल्कि किस्से-कहानियों के जरिए संस्कार भी देते थे। आज सब 'व्यस्त' हैं। कई बार अच्छे परिवारों में भी माता-पिता एक गिलास पानी मांगने से इसलिए हिचकिचाते हैं कि कहीं वे किसी के काम में खलल न डाल दें। सबसे ज्यादा तकलीफदेह वह पल होता है जब किसी बुजुर्ग को यह सुनना पड़ता है कि 'आप अब बहुत मुश्किल और जिद्दी हो गए हैं।'
यह कहते हुए हम भूल जाते हैं कि ये वही हाथ हैं जिन्होंने हमें उंगली पकड़कर चलना सिखाया था, और ये वही लोग हैं जिन्होंने हमारी खुशियों के लिए अपने सपनों की कुर्बानी दी थी। हमारा व्यवहार हमारे इंसान होने का सबसे बड़ा सबूत है। एक दिन हम सबको उसी उम्र की दहलीज पर खड़ा होना है जहां कदम लड़खड़ाएंगे और आवाज कांपेगी। तब हम कैसे समाज की उम्मीद करेंगे—सहनशीलता वाले या बेरुखी वाले?
बुजुर्ग हमारे लिए पुरानी पड़ चुकी वस्तुएं नहीं हैं, बल्कि वे चलती-फिरती लाइब्रेरी और जीता-जागता इतिहास हैं। रफ्तार से भागती इस दुनिया में वे हमें धैर्य सिखाते हैं, दिखावे की दुनिया में वे हमें गहराई का एहसास कराते हैं और महत्वाकांक्षा की दौड़ में वे हमें रिश्तों की अहमियत याद दिलाते हैं। उनके चेहरे की झुर्रियों में वो अनुभव छिपे हैं जो दुनिया की कोई यूनिवर्सिटी नहीं सिखा सकती। लेकिन आज हम उन्हें 'सामाजिक मृत्यु' की ओर धकेल रहे हैं, जहां इंसान सांस तो लेता है पर अपनों की नजरों में ओझल रहता है।
जब हम बैठकों और डेडलाइन को अपने माता-पिता के साथ बिताए जाने वाले समय से अधिक प्राथमिकता देते हैं, तो धीरे-धीरे साल गुजर जाते हैं और पीछे सिर्फ पछतावा रह जाता है। हर बुजुर्ग के अंदर एक ऐसा इंसान छिपा होता है जो अंदर से आज भी जवान महसूस करता है, जो आज भी मुस्कुराना और बातें करना चाहता है।
समाज की यह मानसिकता बदलनी जरूरी है कि इंसान की कीमत उसकी कार्यक्षमता या उसकी कमाई से है। आज का दौर उपयोगितावाद का है, जहां सम्मान तब तक मिलता है जब तक आप कुछ 'उत्पन्न' कर रहे हैं। जैसे ही उम्र शरीर को धीमा करती है, लोग पूछने लगते हैं कि 'अब इनका क्या काम?' यह एक खतरनाक सोच है। हमारे आध्यात्मिक ग्रंथ हमें याद दिलाते हैं कि जिसे हम 'निर्भर' समझ रहे हैं, वह असल में हमारे घर की बरकत, हमारी दुआओं का जरिया और हमारे संस्कारों की जड़ हो सकता है।
जड़ें कट जाएं तो दरख्त कभी फलता-फूलता नहीं है। रिश्तों का सौदा नहीं किया जा सकता और न ही परिवार किसी बिजनेस कॉन्ट्रैक्ट की तरह चलते हैं। अक्सर बुजुर्गों की उपेक्षा किसी बड़ी क्रूरता से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे इशारों से शुरू होती है—एक गहरी आह भरना, झल्लाकर जवाब देना या उनकी बातों को अनसुना कर देना।
जबकि कुरआन हमें सिखाता है कि अपने माता-पिता के सामने 'उफ़' तक न कहो। यह हमें सिखाता है कि सम्मान केवल आर्थिक मदद करना नहीं है, बल्कि यह अपने व्यवहार में कोमलता और नरमी लाना है। शब्दों से दिए गए घाव पेट की भूख से ज्यादा गहरे होते हैं। किसी कामयाब इंसान का सम्मान तो हर कोई कर लेता है, लेकिन एक कमजोर और बुजुर्ग इंसान को मान देना ही असल इंसानियत और ईमान है।
हमें उस एहसान को नहीं भूलना चाहिए जो हमारे अस्तित्व का आधार है। कुछ युवा आज पूछते हैं कि 'उन्होंने हमारे लिए किया ही क्या है?' यह सवाल ही उनकी नासमझी को दर्शाता है। एक बच्चे को सिर्फ जिंदा रखना ही अपने आप में एक बहुत बड़ा संघर्ष है। एक माँ अपने बच्चे को 'कमजोरी पर कमजोरी' सहते हुए पालती है, रातों की नींद और अपने आराम का त्याग करती है।
यह कर्ज कभी चुकाया नहीं जा सकता, इसे केवल प्यार और सेवा से पहचाना जा सकता है। एक बार एक व्यक्ति ने अपनी बूढ़ी मां को कंधे पर उठाकर हज की यात्रा कराई और पूछा कि क्या उसने मां का हक अदा कर दिया? जवाब मिला कि 'तूने तो अभी जन्म के समय की एक तड़प का हक भी अदा नहीं किया है।' हम कभी उनका कर्ज नहीं उतार सकते, लेकिन हम उन्हें वह सुकून दे सकते हैं जिसके वे हकदार हैं।
बुजुर्गों की देखभाल करना केवल एक सामाजिक जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह एक इबादत की तरह है। जब हम सेवा को फर्ज के बजाय एक पवित्र कार्य मान लेते हैं, तो थकान के बजाय सुकून मिलने लगता है। हालांकि, यह भी जरूरी है कि देखभाल की जिम्मेदारी घर के किसी एक सदस्य पर न डाली जाए, बल्कि पूरा परिवार मिलकर हाथ बंटाए ताकि सेवा करने वाला भी न थके।
जिनके माता-पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि प्यार मौत के साथ खत्म नहीं होता। उनके लिए की गई दुआएं और उनके सिखाए हुए अच्छे मूल्यों पर चलना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि है।
अंत में, हमें खुद से एक सवाल पूछना चाहिए: जब उन्हें हमारी सबसे ज्यादा जरूरत होगी, तो हम क्या बनेंगे? एक सहारा या एक बोझ समझने वाला मन? समय बहुत खामोशी से गुजर रहा है। एक दिन घर की वह कुर्सी खाली होगी, हमें पुकारने वाली वह आवाज खामोश होगी और हम उनकी सलाह को तरसेंगे। तब दुनिया की कोई दौलत या कामयाबी उस कमी को पूरा नहीं कर पाएगी।
आइए, आज हम यह वादा करें कि हम अपने घरों को ऐसा बनाएंगे जहां कोई बुजुर्ग खुद को बेकार महसूस न करे और कोई माता-पिता घर में अनचाहे सामान की तरह न रहें। हमारे बुजुर्ग हमारी धरोहर हैं, उन्हें प्यार और सम्मान के साथ थामना ही हमारे भविष्य को सुरक्षित बनाएगा। आखिर हम आज जो दुनिया अपने बुजुर्गों के लिए बनाएंगे, कल उसी दुनिया में हमें भी रहना है।
सुमैया मरयम
सोशल एक्टिविस्ट, नई दिल्ली