घटती रिश्तों की गर्माहट का यह बड़ा कारण
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परिवार

घटती रिश्तों की गर्माहट का यह बड़ा कारण


हमारा देश हमेशा से परंपराओं, रिश्तों और पारिवारिक व्यवस्था का देश रहा है। एक समय था जब दादा-दादी, चाचा-चाची, चचेरे भाई-बहन और कई पीढ़ियाँ एक साथ रहने वाली संयुक्त परिवार प्रणाली भारतीय समाज की पहचान थी। लेकिन बदलते समय के साथ भारतीय पारिवारिक व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन आया है। आज संयुक्त परिवारों की जगह धीरे-धीरे एकल परिवारों ने ले ली है। पति, पत्नी और उनके बच्चों तक सीमित यह परिवार आज शहरी भारत की नई वास्तविकता बन गया है।

हाल के अध्ययनों के अनुसार भारत में लगभग 50 प्रतिशत परिवार एकल परिवार के रूप में रह रहे हैं। वर्ष 2008 में यह प्रतिशत 34 था, जो 2022 में बढ़कर 50 प्रतिशत तक पहुँच गया। कुछ सामाजिक अनुसंधान संस्थाओं के अध्ययन के अनुसार दक्षिण भारत में एकल परिवारों का प्रतिशत लगभग 69 प्रतिशत है।

इसी प्रकार, 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में 51.7 प्रतिशत परिवार एकल स्वरूप के थे, जबकि 2011 में यह प्रतिशत बढ़कर 52.1 प्रतिशत हो गया। इसी अवधि में संयुक्त परिवारों का प्रतिशत 19.1 से घटकर 16.1 प्रतिशत रह गया। यह आँकड़े भारतीय समाज में हो रहे बड़े सामाजिक परिवर्तन की गवाही देते हैं।

आज लाखों युवा उच्च शिक्षा और बेहतर रोजगार की तलाश में गाँवों से शहरों की ओर जा रहे हैं। मुंबई, पुणे, बेंगलुरु, हैदराबाद और दिल्ली जैसे महानगरों में नौकरी मिलने के बाद वहीं अपना अलग घर बसाना उनकी आवश्यकता बन जाता है। परिणामस्वरूप संयुक्त परिवार के सदस्य भौगोलिक रूप से अलग हो रहे हैं।

महानगरों में मकानों की बढ़ती कीमतें, सीमित स्थान और बढ़ती जीवन-यापन लागत के कारण बड़े परिवारों का एक साथ रहना कठिन हो गया है। इसके अतिरिक्त महिलाओं की शिक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता और करियर के प्रति बढ़ती रुचि भी एकल परिवारों की संख्या बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

आधुनिक पीढ़ी व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निजी जीवन और आत्मनिर्णय को अधिक महत्व देती है। इसलिए अपने निर्णय स्वयं लेने और कम हस्तक्षेप वाला जीवन जीने के लिए अनेक दंपति अलग रहने का विकल्प चुनते हैं।

एकल परिवार संस्कृति का सबसे अधिक प्रभाव बच्चों और बुजुर्गों पर दिखाई देता है। आधुनिक जीवनशैली, बढ़ता शहरीकरण और रोजगार के लिए होने वाला पलायन परिवारों की संरचना को बदल रहा है। इस बदलाव के कुछ सकारात्मक पहलू अवश्य हैं, लेकिन इसके सामाजिक और भावनात्मक प्रभाव विशेष रूप से बच्चों और बुजुर्गों पर अधिक गहराई से महसूस किए जाते हैं।

आज अनेक परिवारों में माता-पिता दोनों नौकरी करते हैं, जिसके कारण बच्चों की देखभाल के लिए डे-केयर केंद्रों, क्रेच या घरेलू सहायकों पर निर्भर रहना पड़ता है। बच्चों की मूलभूत आवश्यकताएँ पूरी हो जाती हैं, लेकिन उन्हें दादा-दादी का प्यार, स्नेह, अनुभव और संस्कार प्रत्यक्ष रूप से कम मिल पाते हैं।

संयुक्त परिवार में बच्चों को विभिन्न आयु वर्ग के लोगों के साथ संवाद करने का अवसर मिलता था, जिससे उनमें सहयोग, सम्मान, धैर्य और सामाजिक चेतना जैसे गुण विकसित होते थे। जबकि एकल परिवार में बच्चों का सामाजिक दायरा सीमित रहने की संभावना होती है।

दादा-दादी केवल परिवार के बुजुर्ग सदस्य नहीं होते, बल्कि वे अनुभव और संस्कारों के जीवंत विश्वविद्यालय होते हैं। उनकी कहानियाँ, जीवन अनुभव और मार्गदर्शन बच्चों के व्यक्तित्व पर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं। किंतु एकल पारिवारिक व्यवस्था के कारण अनेक बच्चे इस अमूल्य संगति से वंचित रह जाते हैं। परिणामस्वरूप पीढ़ियों के बीच संवाद कम हो रहा है और सांस्कृतिक तथा पारिवारिक मूल्यों की विरासत कमजोर पड़ने की चिंता व्यक्त की जा रही है।

एकल परिवार में संकट के समय सहायता के लिए उपलब्ध लोगों की संख्या कम होती है। बीमारी, आर्थिक कठिनाई या मानसिक तनाव की स्थिति में परिवारजनों का साथ न होने से दबाव बढ़ सकता है। संयुक्त परिवार में जिम्मेदारियाँ कई लोगों के बीच बँटी होती थीं, जिससे कठिन परिस्थितियों का सामना अपेक्षाकृत आसान होता था। लेकिन एकल परिवार में सारी जिम्मेदारियाँ कुछ लोगों पर आ जाती हैं, जिससे मानसिक और भावनात्मक तनाव बढ़ने की संभावना रहती है।

बुजुर्गों के दृष्टिकोण से भी यह स्थिति चिंताजनक है। रोजगार, शिक्षा और व्यवसाय के कारण अनेक युवा अपने माता-पिता और मूल निवास स्थान से दूर रहते हैं। परिणामस्वरूप अनेक वृद्ध माता-पिता अकेले रहने को विवश हो जाते हैं। बढ़ती आयु के साथ उन्हें शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक सहारे की अधिक आवश्यकता होती है, लेकिन बच्चों के दूर रहने के कारण यह सहारा अक्सर पर्याप्त नहीं मिल पाता। विभिन्न सामाजिक अध्ययनों में यह पाया गया है कि बुजुर्गों में अकेलापन, अवसाद और असुरक्षा की भावना बढ़ रही है।

वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या भी बदलती पारिवारिक व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण और चिंताजनक वास्तविकता है। यद्यपि सभी वृद्धाश्रम नकारात्मक कारणों से नहीं भरे हैं, फिर भी अनेक स्थानों पर बुजुर्गों को अपने परिवार से दूर रहना पड़ रहा है। यह स्थिति केवल सामाजिक परिवर्तन ही नहीं, बल्कि मानवीय रिश्तों में बढ़ती दूरी का भी प्रतीक है।

तकनीक और डिजिटल माध्यमों ने आज दुनिया को पहले से अधिक निकट ला दिया है। मोबाइल फोन, वीडियो कॉल और सोशल मीडिया के माध्यम से परिवारजन एक-दूसरे के संपर्क में रह सकते हैं। लेकिन डिजिटल संपर्क कभी भी प्रत्यक्ष साथ का पूर्ण विकल्प नहीं बन सकता। साथ बैठकर बातचीत करना, त्योहार मनाना, पारिवारिक कार्यक्रमों में भाग लेना और एक-दूसरे के सुख-दुख में उपस्थित रहना अपने आप में अनमोल है।

आज अनेक घरों में त्योहार और पारिवारिक आयोजन पहले की तरह सामूहिक रूप से नहीं मनाए जाते। रिश्तेदारों से मुलाकातें कम होने के कारण बच्चों में भी रिश्तों की पहचान और अपनापन कम होता दिखाई देता है। परिणामस्वरूप परिवार के सदस्य रक्त संबंधों से जुड़े होने के बावजूद भावनात्मक रूप से दूर होने लगते हैं।

इसलिए एकल परिवार संस्कृति को अपनाते समय उसके सामाजिक प्रभावों पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक है। आधुनिकता के साथ-साथ पारिवारिक मूल्य, पीढ़ियों के बीच संवाद और बुजुर्गों का सम्मान बनाए रखना समय की आवश्यकता है। परिवार का आकार छोटा हो सकता है, लेकिन रिश्तों की गर्माहट, प्रेम, जिम्मेदारी और परस्पर सहयोग बने रहना ही एक स्वस्थ समाज की पहचान है।

इस्लाम में परिवार को समाज की बुनियादी इकाई माना गया है। इस्लाम संयुक्त परिवार को अनिवार्य नहीं ठहराता, लेकिन रिश्तों को बनाए रखने, माता-पिता का सम्मान करने और संबंधियों के साथ अच्छे संबंध रखने पर विशेष बल देता है।

पवित्र कुरआन में अल्लाह तआला फरमाता है:

"अल्लाह की इबादत करो और उसके साथ किसी को साझी न ठहराओ, और माता-पिता, रिश्तेदारों, अनाथों और जरूरतमंदों के साथ अच्छा व्यवहार करो।"

(सूरह अन-निसा 4:36)

पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:

"जो व्यक्ति अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान रखता है, उसे चाहिए कि वह अपने रिश्तों को जोड़े रखे।"

(सहीह बुखारी)

ये शिक्षाएँ स्पष्ट करती हैं कि घर का आकार महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि रिश्तों की मजबूती, पारस्परिक सम्मान, जिम्मेदारी और प्रेम महत्वपूर्ण हैं। एकल परिवार में रहते हुए भी नियमित मुलाकातों, फोन कॉल, वीडियो कॉल, त्योहारों में सहभागिता और परस्पर सहयोग के माध्यम से रिश्तों को जीवित रखा जा सकता है।

भारत में एकल परिवार संस्कृति का बढ़ता हुआ चलन आधुनिक भारत के बदलते सामाजिक यथार्थ का प्रतीक है। शिक्षा, रोजगार, शहरीकरण और स्वतंत्रता की आकांक्षा ने इस परिवर्तन को लगभग अपरिहार्य बना दिया है। लेकिन इस बदलाव के साथ परिवार में प्रेम, अपनापन, संस्कार और जिम्मेदारी का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।

इस्लाम का संदेश भी यही है कि घर छोटा हो या बड़ा, रिश्ते टूटने नहीं चाहिए। माता-पिता का सम्मान, बुजुर्गों की देखभाल, बच्चों का उचित पालन-पोषण और रिश्तेदारों के साथ संबंध बनाए रखना ही समाज की स्थिरता की वास्तविक कुंजी है।

घर अलग हो सकते हैं, लेकिन दिल अलग नहीं होने चाहिए; क्योंकि आधुनिक भारत को केवल प्रगतिशील नागरिकों की नहीं, बल्कि मजबूत रिश्तों की भी आवश्यकता है।


परवीन खान

पुसद महाराष्ट्र 

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