सपनों की दौड़ या असफलताओं का बोझ?
"युवा किसी भी राष्ट्र का भविष्य होते हैं।" यह वाक्य हम बचपन से सुनते आए हैं। लेकिन आज प्रश्न यह है कि क्या हमारा भविष्य स्वयं अपने भविष्य को लेकर आश्वस्त है? क्या हमारे युवाओं को शिक्षा वह आत्मविश्वास दे रही है जिसकी उन्हें आवश्यकता है, या फिर वह उन्हें असफलताओं के अंतहीन बोझ तले दबा रही है?
हर वर्ष लगभग 22 से 23 लाख विद्यार्थी नीट परीक्षा देते हैं, जबकि एमबीबीएस की सीटें केवल लगभग 1.1 लाख हैं। अर्थात् केवल लगभग 5 प्रतिशत विद्यार्थियों को ही सफलता मिल पाती है। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा में 5.5 से 6 लाख अभ्यर्थी बैठते हैं, लेकिन चयन केवल लगभग एक हजार का होता है। आईआईटी-जेईई में भी चयन दर एक प्रतिशत से भी कम है। अर्थात लाखों युवा वर्षों की मेहनत के बाद केवल एक परिणाम सुनते हैं—"आप चयनित नहीं हुए।"
हाल ही में राजस्थान के कोटा में आयोजित "छात्र गूंज" अभियान के दौरान राहुल गांधी ने कहा कि "भारत की शिक्षा व्यवस्था चयन (Selection) नहीं, बल्कि अस्वीकृति (Rejection) की व्यवस्था बन गई है।" यह कथन केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि उस मानसिक पीड़ा की ओर संकेत करता है जिससे आज का विद्यार्थी गुजर रहा है।
शिक्षा कभी ज्ञान, व्यक्तित्व निर्माण और चरित्र विकास का माध्यम मानी जाती थी। आज वह एक विशाल बाज़ार का रूप ले चुकी है। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं होता कि वे विद्यार्थियों को कितना अच्छा शिक्षित करते हैं या उनके शिक्षक कितने सक्षम हैं, बल्कि इस आधार पर होता है कि उनके छात्रों को कितने लाख का प्लेसमेंट पैकेज मिला। ज्ञान की खोज, जिज्ञासा और सीखने का आनंद धीरे-धीरे वेतन और नौकरी की दौड़ में कहीं खो गया है।
आज के युवा को यह सिखाया जा रहा है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल अधिक कमाना है। निस्संदेह शिक्षा आजीविका का साधन है, लेकिन क्या उसका उद्देश्य केवल इतना ही है? ज्ञान के प्रति प्रेम, नए विचारों को समझने की उत्सुकता और समाज के लिए कुछ नया करने का साहस—ये गुण धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं। विद्यार्थी उत्तरों को समझने के बजाय उन्हें याद करना सीख रहे हैं। वे दुनिया को बदलने के बजाय केवल किसी प्रतिष्ठित परीक्षा को पास करने का सपना देखते हैं।
सबसे अधिक पीड़ा उन 95 से 99 प्रतिशत युवाओं की है, जिन्हें बार-बार यह एहसास कराया जाता है कि वे "सफल" नहीं हैं। असफलता के इस पहले अनुभव से समझौते की एक लंबी यात्रा शुरू होती है। वे अपने पसंदीदा विषय छोड़ देते हैं, अपनी रुचियों से समझौता कर लेते हैं, ऐसे कौशल सीखते हैं जिनमें उनका मन नहीं लगता और अंततः ऐसी नौकरियों में पहुँच जाते हैं जिनकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। परिणामस्वरूप समाज को ऐसे लाखों लोग मिलते हैं जो अपने काम से प्रेम नहीं करते और अपनी क्षमता का पूरा उपयोग नहीं कर पाते।
दूसरी ओर, बदलते रोजगार बाज़ार की आवश्यकताएँ भी शिक्षा व्यवस्था से मेल नहीं खातीं। आज उद्योगों को तकनीकी दक्षता, नवाचार और व्यावहारिक कौशल वाले युवाओं की आवश्यकता है, जबकि अनेक संस्थानों में अब भी दशकों पुराने पाठ्यक्रम पढ़ाए जा रहे हैं। केवल डिग्री प्राप्त कर लेना अब रोजगार की गारंटी नहीं रह गया है। एक साधारण विश्वविद्यालय का साधारण छात्र अक्सर स्वयं को इस प्रतिस्पर्धा में असहाय पाता है।
समग्र और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने वाले संस्थान अधिकांश मध्यमवर्गीय और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की पहुँच से बाहर हैं। परिणामस्वरूप अच्छे संस्थान कुछ लोगों तक सीमित रह जाते हैं और गुणवत्तापूर्ण अवसर भी उसी अनुपात में सिमट जाते हैं। अधिकांश युवा अनिश्चितता, असुरक्षा, चिंता, अवसाद और "मैं पर्याप्त नहीं हूँ" जैसी भावनाओं के साथ जीवन जीने को विवश हो जाते हैं।
यदि किसी राष्ट्र का युवा स्वयं को असफल मानने लगे, तो यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चिंता का विषय है। हमें ऐसी शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता है जो केवल कुछ विजेताओं का चयन न करे, बल्कि प्रत्येक विद्यार्थी की क्षमता को पहचानकर उसे विकसित करे; जो डिग्री नहीं, व्यक्तित्व दे; जो नौकरी के लिए नहीं, जीवन के लिए तैयार करे।
क्योंकि किसी देश का भविष्य केवल उन पाँच प्रतिशत युवाओं से नहीं बनता जिन्हें सफलता मिल जाती है, बल्कि उन 95 प्रतिशत युवाओं से भी बनता है जिनके सपनों, प्रतिभाओं और आत्मविश्वास को बचाए रखना हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
यह देश के युवाओं का नहीं, इस देश की व्यवस्था का संकट है। और जब तक इसे स्वीकार नहीं किया जाएगा — भविष्य अंधेरे में ही रहेगा।
मोहसिना सचोरा
स्वतंत्र लेखक, गुजरात