भारत में महिलाओं की घटती संख्या : समस्या और समाधान
किसी भी समाज का स्वस्थ विकास तब होता है जब वहां पुरुष और महिलाओं की संख्या में संतुलन बना रहे। इसी संतुलन को लिंगानुपात अथवा पुरुष एवं महिला अनुपात (Gender Ratio or Male and Female Ratio) कहा जाता है। सामान्यतः प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या को लिंगानुपात के रूप में व्यक्त किया जाता है। भारत में लंबे समय से लिंगानुपात असंतुलित रहा है, जिसके कारण अनेक सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं।
भारतीय समाज में प्राचीन काल से लेकर अब तक पुत्र मोह हावी रहा है। परिवार की वंश परंपरा, धार्मिक कर्मकांड, संपत्ति के उत्तराधिकार और वृद्धावस्था में सहारे की भावना ने पुत्र-प्राथमिकता को बढ़ावा दिया है। इसके विपरीत, बेटियों को लंबे समय तक आर्थिक बोझ के रूप में देखा गया। दहेज प्रथा, शिक्षा में भेदभाव और सामाजिक असुरक्षा जैसे कारणों ने महिलाओं की स्थिति को और अधिक दयनीय बना दिया। परिणामस्वरूप कन्या भ्रूण हत्या, बालिकाओं की उपेक्षा तथा स्वास्थ्य सुविधाओं में असमानता जैसी समस्याएं आज भी विराजमान है।
भारत की प्रत्येक जनगणना पर नज़र डालें तो ज्ञात होता है कि महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में हमेशा से कम रही है। अनेक राज्यों और क्षेत्रों में बाल लिंगानुपात चिंताजनक स्थिति में है; विशेषकर आर्थिक रूप से विकसित माने जाने वाले कुछ राज्यों में कन्या जन्म दर अपेक्षाकृत कम रही है।
उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार भारत में राष्ट्रीय स्तर पर 1000 पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या 943 है। हरियाणा राज्य में यह संख्या सबसे कम 879 है, जबकि केरल में यह संख्या 1084 है जो देश में सर्वाधिक है।
राज्यों के आंकड़े इस प्रकार हैः-
धार्मिक समुदायों की स्थिति इस प्रकार हैः-
प्रभावः-
महिलाओं की घटती जनसंख्या का प्रभाव केवल परिवारों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज को प्रभावित करता है। जब किसी समाज में महिलाओं की संख्या घट जाती है तो विवाह योग्य आयु वाले पुरुषों के लिए जीवनसाथी की कमी उत्पन्न हो जाती है। इससे मानव तस्करी, जबरन विवाह और महिलाओं के प्रति हिंसा जैसी समस्याएँ बढ़ सकती हैं। कई क्षेत्रों में विवाह के लिए दूसरे राज्यों से महिलाओं को लाने की घटनाएँ भी सामने आई हैं। यह स्थिति सामाजिक असंतुलन को और अधिक बढ़ाती है।
लिंगानुपात में असंतुलन का आर्थिक प्रभाव भी पड़ता है। महिलाएँ किसी भी देश की कार्यशक्ति का महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं। यदि उनकी संख्या कम होगी या उन्हें पर्याप्त अवसर नहीं मिलेंगे, तो देश अपनी आधी आबादी की क्षमता का पूर्ण उपयोग नहीं कर पाएगा। आज शिक्षा, विज्ञान, प्रशासन, राजनीति, खेल और उद्योग के क्षेत्र में महिलाओं ने उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। इसलिए महिलाओं की संख्या और उनकी भागीदारी दोनों का बढ़ना राष्ट्रीय विकास के लिए आवश्यक है।
कारण:-
महिलाओं की घटती जनसंख्या का एक महत्वपूर्ण कारण स्वास्थ्य संबंधी असमानता भी है। कई ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में लड़कियों को पोषण, टीकाकरण और स्वास्थ्य सुविधाएँ लड़कों की तुलना में कम प्राप्त होती हैं। मातृ मृत्यु दर तथा किशोरियों में कुपोषण भी गंभीर समस्याएँ हैं। यदि महिलाओं को जन्म से लेकर वयस्कता तक समान स्वास्थ्य सुविधाएँ मिलें, तो उनकी जीवन गुणवत्ता और जीवन प्रत्याशा दोनों में सुधार हो सकता है।
समाधान:-
इस समस्या से निपटने के लिए सबसे पहला क़दम सामाजिक मानसिकता में परिवर्तन है। समाज को यह समझना होगा कि बेटी और बेटा दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। परिवार, विद्यालय, धार्मिक संस्थाएँ और मीडिया इस सोच को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। जब तक पुत्र और पुत्री के बीच भेदभाव समाप्त नहीं होगा, तब तक लिंगानुपात में स्थायी सुधार संभव नहीं है।
दूसरा महत्वपूर्ण उपाय महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा देना है। शिक्षा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाती है और समाज में उनकी स्थिति को मजबूत करती है। अनेक शोध से यह साबित हुआ है कि शिक्षित महिलाओं के परिवार अधिक स्वस्थ और आर्थिक रूप से सशक्त होते हैं। इसलिए बालिका शिक्षा पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।
तीसरा उपाय कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन है। भ्रूण लिंग परीक्षण और कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए बनाए गए कानूनों का कठोरता से पालन होना चाहिए। दोषियों के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई और सामाजिक जागरूकता अभियान दोनों समान रूप से आवश्यक हैं। इसके साथ ही दहेज प्रथा जैसी कुरीतियों के विरुद्ध भी सख्ती बरती जानी चाहिए।
चौथा उपाय महिलाओं की सुरक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण है। जब परिवारों को यह विश्वास होगा कि बेटियाँ सुरक्षित हैं और अपने जीवन में सफल हो सकती हैं, तब पुत्र-प्राथमिकता एवं पुत्र मोह की मानसिकता कमजोर पड़ेगी। महिलाओं के लिए रोजगार, स्वरोजगार, संपत्ति के अधिकार और वित्तीय समावेशन की योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू किया जाना चाहिए।
सरकार द्वारा चलाए जा रहे विभिन्न अभियान, जैसे “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ”, ने समाज में जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया है। हालांकि केवल सरकारी योजनाएँ पर्याप्त नहीं हैं। समाज के प्रत्येक नागरिक को इस दिशा में अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। परिवारों को बेटियों को समान अवसर देने होंगे और समुदायों को लैंगिक समानता को सामाजिक मूल्य के रूप में स्वीकार करना होगा।
इस्लामी शिक्षाएं:
इस्लामी अवधारणा के अनुसार ईश्वरीय विधान द्वारा संतुलित संख्या में स्त्री पुरुष पैदा होते हैं। बाहरी एवं मानवीय हस्तक्षेप के करण संख्या में असंतुलन उत्पन्न होता है। इस्लाम, कन्या-विरोधी मानसिकता और स्त्रियों के प्रति भेदभाव को ग़लत मानता है और इस समस्या का समाधान नैतिक, सामाजिक तथा क़ानूनी स्तरों पर प्रस्तुत करता है।
अरब के अज्ञानताकाल में कन्या के जन्म को अपमान माना जाता था और नवजात बालिकाओं को जीवित दफ़ना देने की प्रथा प्रचलित थी। इस्लाम ने इस प्रथा की कठोर निंदा की और स्त्री को सम्मानजनक सामाजिक स्थान प्रदान किया।
1. कन्या हत्या का स्पष्ट निषेध
क़ुरआन में कन्या हत्या को गंभीर अपराध बताया गया है:
"और जब जीवित दफ़न की गई लड़की से पूछा जाएगा कि उसे किस अपराध में मारा गया था।"
(क़ुरआन 81:8-9)
इसी प्रकार क़ुरआन में कहा गया है:
"अपनी संतान की निर्धनता के भय से हत्या मत करो। हम उन्हें भी रोज़ी देते हैं और तुम्हें भी।"
(क़ुरआन 17:31)
यह निर्देश गर्भपात या कन्या-भ्रूण हत्या जैसी प्रवृत्तियों के विरुद्ध एक नैतिक आधार प्रदान करता है।
2. पुत्र और पुत्री के बीच समान व्यवहार
इस्लाम के अनुसार संतान ईश्वर का असीम उपहार है, चाहे वह पुत्र हो या पुत्री।
क़ुरआन में कहा गया है:
"आकाशों और धरती का राज्य अल्लाह ही का है। वह जो चाहता है पैदा करता है। जिसे चाहता है बेटियाँ देता है और जिसे चाहता है बेटे देता है।" (क़ुरआन 42:49)
यह आयत बेटियों को भी ईश्वर की विशेष देन के रूप में प्रस्तुत करती है।
3. बेटियों के पालन-पोषण का विशेष महत्व
पैगंबर मुहम्मद(सल्ल०) ने बेटियों के पालन-पोषण को अत्यंत पुण्य का कार्य बताया। एक प्रसिद्ध हदीस में है:
"जिस व्यक्ति की तीन बेटियां हों और वह उनका पालन-पोषण करे, उन्हें अच्छी शिक्षा दे और उनके साथ अच्छा व्यवहार करे, उसके लिए जन्नत है।" (सुनन अबू दाऊद)
एक अन्य हदीस में दो बेटियों के पालन-पोषण पर भी जन्नत की ख़ुशख़बरी दी गई है।
4. महिलाओं के अधिकारों की रक्षा
इस्लाम ने महिलाओं को कई ऐसे अधिकार दिए जो उस समय बहुत सारे समाज में उपलब्ध ही नहीं थे, जैसे:
* संपत्ति रखने का अधिकार
* विरासत में हिस्सा
* शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार
* विवाह में सहमति का अधिकार
* विवाह-धन (महर) प्राप्त करने का अधिकार
इन अधिकारों का उद्देश्य महिलाओं की सामाजिक स्थिति को मज़बूत बनाना है।
5. परिवार और समाज में सम्मान
पैगंबर मुहम्मद(सल्ल०) ने कहा:
"तुममें सबसे अच्छा वह है जो अपने परिवार, विशेषरुप से अपनी स्त्रियों के साथ सबसे अच्छा व्यवहार करता है।" (तिर्मिज़ी)
माँ के सम्मान के बारे में उन्होंने कहा:
"जन्नत माँ के पैरों के नीचे है।"
इस प्रकार इस्लाम ने स्त्री को केवल पत्नी या बेटी के रूप में नहीं, बल्कि माँ, बहन और समाज की सम्मानित सदस्य के रूप में प्रतिष्ठित किया। यदि इस्लाम की इन शिक्षाओं—कन्या भ्रूण हत्या का निषेध, बेटियों के सम्मान, शिक्षा, सुरक्षा और समान मानव गरिमा को ईमानदारी से अपनाया जाए, तो लिंगानुपात में असंतुलन जैसी समस्याओं को कम करने में सहायता मिल सकती है। इस प्रकार इस्लाम का मूल संदेश यह है कि बेटी और बेटा दोनों अल्लाह की नेमत हैं, और उनके बीच भेदभाव करना न केवल सामाजिक रूप से हानिकारक बल्कि धार्मिक दृष्टिकोण से भी अनुचित है।
अंत में
वास्तविकता यह है कि, महिलाओं की घटती जनसंख्या सामाजिक संतुलन, आर्थिक विकास और मानवीय मूल्यों के लिए गंभीर चुनौती है। यदि हम एक समतामूलक और विकसित भारत का निर्माण करना चाहते हैं, तो महिलाओं को समान सम्मान, अवसर और सुरक्षा प्रदान करनी होगी। संतुलित लिंगानुपात केवल महिलाओं के हित में नहीं, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य के लिए अनिवार्य है।
डॉ फ़रहत हुसैन
रिटायर्ड प्रोफ़ेसर, रामनगर, उत्तराखंड