ईश्वर द्वारा प्रदत्त इन तीन उपहार का महत्व
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दिव्य ज्योति

ईश्वर द्वारा प्रदत्त इन तीन उपहार का महत्व


الرَّحْمٰنُ ۝ عَلَّمَ الْقُرْآنَ ۝ خَلَقَ الْإِنسَانَ ۝ عَلَّمَهُ الْبَيَانَ

अर्थ:

परम कृपालु ईश्वर ने कुरआन का ज्ञान प्रदान किया, मनुष्य की रचना की और उसे अपनी बात स्पष्ट रूप से कहने तथा समझने की क्षमता दी।(सूरह अर-रहमान : 1-4)

सूरह अर-रहमान कुरआन की अत्यन्त सुंदर और प्रभावशाली सूरहों में से एक है। इसकी शुरुआत ईश्वर की महान कृपा और उपकारों के उल्लेख से होती है। इन प्रारंभिक चार आयतों में मानव जीवन के तीन महान उपहारों का वर्णन है—कुरआन, मानव का सृजन और वाणी की शक्ति।

सर्वप्रथम ईश्वर ने स्वयं को "रहमान" कहा है। यह नाम ईश्वर की असीम करुणा, दया और कृपा को प्रकट करता है। संसार की प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक जीव और प्रत्येक उपहार उसी की दया का परिणाम है। मनुष्य का जीवन, स्वास्थ्य, परिवार, ज्ञान और आजीविका—सब उसी की कृपा से प्राप्त हैं।

इसके उपरांत ईश्वर ने कुरआन की शिक्षा का उल्लेख किया। जो इस बात का संकेत है कि मनुष्य के लिए सबसे बड़ी नेमत केवल जीवन नहीं, बल्कि सही मार्गदर्शन है। यदि मानव जीवन में मार्गदर्शन ना हो तो जीवन व्यर्थ हो जाता है। कुरआन मानव को अज्ञानता के अंधकार से निकालकर सत्य, न्याय, सदाचार और ईश्वर-भक्ति के प्रकाश की ओर ले जाता है। जो व्यक्ति कुरआन को समझता और उसके अनुसार जीवन व्यतीत करता है, वह संसार और परलोक दोनों में सफलता प्राप्त करता है।

फिर अल्लाह ने मनुष्य की रचना का उल्लेख किया। मनुष्य को बुद्धि, विवेक, चेतना और निर्णय लेने की क्षमता प्रदान की गई है। यह सम्मान दूसरे अनेक प्राणियों को प्राप्त नहीं है। इसलिए मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अपने सृष्टिकर्ता को पहचाने, उसकी आज्ञाओं का पालन करे और अपने जीवन को उद्देश्यपूर्ण बनाए।

चौथी आयत में ईश्वर ने बताया कि उसने मनुष्य को बयान अर्थात् बोलने, समझने, अपने विचार व्यक्त करने और ज्ञान का आदान-प्रदान करने की शक्ति प्रदान की। भाषा और वाणी मनुष्य के लिए अत्यन्त मूल्यवान उपहार हैं। इन्हीं के माध्यम से शिक्षा, संवाद, उपदेश और समाज का निर्माण संभव होता है। अतः हमें अपनी वाणी का प्रयोग सत्य, नम्रता, सद्भावना और भलाई के लिए करना चाहिए।

इन आयतों से हमें यह शिक्षा मिलती है कि ईश्वर के उपकारों को पहचानें, कुरआन से अपना संबंध मज़बूत करें, उसकी दी हुई नेमतों के प्रति कृतज्ञ रहें और अपनी वाणी का उपयोग सदैव सत्य, न्याय और भलाई के प्रचार में करें। यही इन आयतों का मूल संदेश है और यही मानव जीवन की सफलता का मार्ग है।


सालेहा रईस फ़लाही

लख़नऊ, उत्तर प्रदेश

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