वर्तमान शिक्षा प्रणाली में ख़त्म होती विद्यार्थियों की जीवन कौशल क्षमता
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संपादकीय

वर्तमान शिक्षा प्रणाली में ख़त्म होती विद्यार्थियों की जीवन कौशल क्षमता



वर्तमान शैक्षणिक परिवेश में जीवन कौशल हर विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास के लिए महत्वपूर्ण है। छात्र को शिक्षा स्वरूप, जीवन कौशल, जीवन उद्देश्य और समाज के लिए उपयोगी बनाना चर्चा का विषय होना चाहिए। लेकिन वर्तमान समय में स्कूल हो या उच्च शिक्षण संस्थान, हर संस्था अपने छात्रों को दूसरे से ज़्यादा आगे बढ़ाने की दौड़ में भाग रहे है।

हम यह बात भलीभांति जानते है कि शिक्षा सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावपूर्ण घटक है। निश्चित रूप से छात्र जीवन में ही ये सीखा जा सकता है कि व्यक्ति घर परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए कैसे एक अच्छे व्यक्ति का दायित्व निभा सकता है।

वह उम्र जब बच्चा एक छोटा सा पौधा होता है जिसे शिक्षक सही और सीधी दिशा दिखाकर एक परिपक्व वृक्ष की भांति खड़ा करता है जिसकी शाखाएं चारों ओर फैलती है तो यह अत्यंत आवश्यक है कि वह वृक्ष मीठे फल और घनी छांव देने वाला बने। 

वास्तव में शिक्षा का अर्थ ज्ञान, अनुभव का अधिग्रहण, जीवन कौशल, आदतों और दृष्टिकोण का विकास, जीवन का एक निश्चित लक्ष्य या उद्देश्य प्राप्त कर लेना है जो व्यक्ति को संपूर्ण जीवन जीने में सहायता प्रदान करते है। 

सही अर्थों में शिक्षा व्यक्ति को परिवार, समुदाय और समाज में अच्छे व्यक्ति के रूप में तैयार करती है, लेकिन वर्तमान शिक्षण संस्थाएं इस मूल उद्देश्य को भूलती जा रही हैं कि शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य श्रेष्ठ व्यक्तित्व का निर्माण करना है।

आज शिक्षकों द्वारा भी विद्यार्थी के दिमाग़ में ये बात रचा बसा दी जाती है कि केवल अंकों की दौड़ में आगे रहना ही शिक्षा प्राप्त करने का उद्देश्य है और अधिकतर शिक्षण संस्थान बोध विहीन स्मरण पद्धति का प्रयोग करते हुए एक दूसरे से आगे निकलने की दौड़ में भाग रहे है। आज शिक्षण संस्थाएं केवल रोज़गार सेंटर्स और व्यापार के साधन बने हुए है जहां विद्यार्थी मूल्य आधारित शिक्षा और अपने सर्वांगीण विकास से दूर रह जाता है।

आधुनिक शिक्षण संस्थाओं का कड़वा सच यह है कि यहां योग्यता के स्थान पर भारी भरकम फ़ीस को प्राथमिकता दी जाती है, कोचिंग सेंटर्स के डोनेशन जाल में न जाने कितने ग़रीब फंसे हुए है। हर तरफ़ नंबरों की होड़ मची है।

यह कहना अनुचित न होगा कि अच्छे अंक लाना सफलता का एक पक्ष है, लेकिन योगात्मक आंकलन को अत्यधिक महत्व देने की प्रवृति को कम किया जाना चाहिए क्योंकि एक पढ़ा लिखा व्यक्ति नैतिकता से ख़ाली हो यह क़तई स्वीकार नहीं किया जा सकता।

आज के बदलते दौर में माता पिता भी योगात्मक आंकलन में विश्वास रखते हैं क्योंकि उनकी रुचि यह जानने में होती है कि उनका बच्चा दूसरे छात्रों की तुलना में कैसा शैक्षिक प्रदर्शन कर रहा है। वे मानते हैं कि बच्चों के अच्छे प्रदर्शन का पता लगाने का यही सटीक तरीक़ा है कि ग्रेडिंग देखी जाए, इसलिए वे ग्रेडिंग प्रणाली का पूर्ण समर्थन करते हैं।

लेकिन होना ये चाहिए कि कक्षा में विद्यार्थी के लिए ऐसा सीखने का माहौल हो कि बच्चे को अपने मूल्यांकन का भय न हो और आत्मविश्वास के साथ ग़लतियों को सीखने के अवसरों में बदला जाए और ज़्यादा ध्यान छात्रों के जीवन कौशल और सर्वांगीण विकास पर केंद्रित होना चाहिए।

ब्लैक और विलियम, 1998 सीखने के लिए आंकलन को इस प्रकार परिभाषित करते है कि :-"यह एक ऐसी निरंतर प्रक्रिया है जिसमें शिक्षक और छात्र दोनों शामिल होते हैं। इसके तहत वे सभी गतिविधियाँ आती हैं जो शिक्षण और सीखने की प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने के लिए प्रतिक्रिया (feedback) के रूप में जानकारी प्रदान करती हैं” जिसमें छात्र और शिक्षक दोनों सक्रिय रूप से शामिल होते है।

वर्तमान राष्ट्रीय नीति 2020 में भी इस कौशल के विकास पर विशेष रूप से बल दिया गया है, जिसमें सीखने की प्रक्रिया को सरल एवं रचनात्मक क्रियाकलापों पर महत्व दिया गया है और शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन का आह्वान करते हुए जीवन कौशल शिक्षा और आत्मविकास पर बल दिया है ताकि विद्यार्थी व्यवहारिक जीवन को समझने के साथ साथ उचित निर्णय लेने, जीवन के उद्देश्य को समझने और जीवन में आने वाली चुनौतियों को समझकर कार्य करने में सक्षम हो सके और भविष्य में समाजोपयोगी नागरिक बनकर राष्ट्रनिर्माण में अपनी अहम भूमिका निभा सके।

शिक्षा और ज्ञान की ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जो केवल सूचना मात्र न दे बल्कि समझ, विवेक और जीवन दृष्टि भी विकसित करे और विद्यार्थी के चहुमुखी विकास पर केंद्रित हो तथा केवल अंकतालिका से किसी विद्यार्थी का स्तर न मापा जाए बल्कि एक मूल्यपरक दृष्टिकोण प्रस्तुत करे, जो शिक्षा को चरित्र निर्माण, बौद्धिक, आध्यात्मिक, मानसिक, नैतिक, सामाजिक उत्तरदायित्व, जीवन उद्देश्य और आत्मविकास से जोड़े।

शिक्षण संस्थानों में ऐसी सामाजिक संस्थाएं बनाई जाए जो हर विद्यार्थी परिवार, समुदाय, समाज और राष्ट्र के अच्छे व्यक्ति के रूप में तैयार करती हो। कक्षा में एक पीरियड ऐसा भी हों जिसमे पाठ्यक्रम के अलावा बच्चों को दूसरी चीजें सिखाई जाए, क्रिएटिव एक्टिविटी, खेलकूद, बच्चों को प्रभावी ढंग से बोलने और लिखने की क्षमता का विकास और अन्य व्यक्तित्व के विकास पर कार्य किया जाए।

आधुनिक युग में पहले से कहीं ज़्यादा नए विचारों की खोज और उभरती हुई चुनौतियों को चिन्हित कर उनका हल पेश करने की आवश्यकता है इसलिए केवल पाठ्यक्रम ही नहीं बल्कि बहुत सी ऐसी किताबें छात्र जीवन में पढ़ने की आवश्यकता है जो छात्र को जीवन का सीधा रास्ता दिखाए जिससे व्यक्ति की एक स्पष्ट विचारधारा बने और स्पष्ट उद्देश्य के साथ समाज और राष्ट्रनिर्माण में अपना सकारात्मक सहयोग दे और संपूर्ण मानवता के लिए उपयोगी बने।


ख़ान शाहीन जाटू

संपादक

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