बच्चे का ज़िद्दी स्वभाव माता-पिता के लिए अलार्म
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परिवार

बच्चे का ज़िद्दी स्वभाव माता-पिता के लिए अलार्म


अधिकांश माता-पिता बच्चों की ज़िद और नाफ़रमानी की शिकायतें करते रहते हैं। बच्चे की ज़िद दरअसल बड़ों के अनुसार ज़िद है, लेकिन बच्चे के नज़दीक वह उसकी ज़रुरी डिमांड होती है और इस डिमांड को वह कभी कभी बहुत शिद्दत से महसूस करते हैं, इसलिए वे ज़िद मनवाने का प्रयास करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों की ज़िद के पीछे कुछ कारण छिपे होते हैं जो निम्नलिखित हैः-

  1. जिज्ञासा (curiosity)

  2. किसी चीज़ के छीन लेने या ना मिलने का रिएक्शन (complexity)

  3. किसी की आदत या जुनून (obsession)

  4. असुरक्षा की भावना (Feeling of insecurity)

  5. प्रतिस्पर्धा (competition)

  6. दूसरों की नकल (coping behaviour)

  7. माता-पिता का ध्यान आकर्षित करने के लिए (Attension seeking)

जिज्ञासा (curiosity)

बच्चा जब किसी चीज़ के लिए ज़िद कर रहा हो, जैसे कोई ख़िलौने के लिए, बाहर जाने के लिए या किसी खाने की चीज़ के लिए। यह सारी चीज़ों की डिमांड उसकी जिज्ञासा के कारण होती है। उसके दिमाग में होता है कि उसे वह हासिल करे, जबकि माता-पिता उस बच्चे की जिज्ञासा समझ नहीं पाते हैं। माता-पिता को चाहिए कि अपने बच्चे की जिज्ञासा को समझें। 

कुछ बच्चों को खाने की चीज़ों के विभिन्न स्वाद की जिज्ञासा होती है, चिप्स की ज़िद कर रहा है तो मतलब भूख लगी है और चिप्स उसे आसान हल नज़र आ रहा है। टेस्ट बड्स प्रभावित हुए हैं। माता-पिता को चाहिए की बच्चे की जिज्ञासा को फॉलो करें। खिलौने की ज़िद है तो मतलब इंजीनियरिंग की जिज्ञासा बढ़ रही है। बाहर जाने की ज़िद है तो इसका मतलब बच्चा घर में घुटन महसूस कर रहा है। उसको ज़ुकाम हो रहा है या नाक बंद है तो बाहर के माहौल को देखने से उसे सुकून मिलेगा।

किसी चीज़ के छीन लेने या ना मिलने का रिएक्शन (complexity)

अधिकांश माता-पिता ध्यान नहीं दे पाते हैं कि छोटे बहन भाई से घर के बड़े बच्चे उसकी पसंदीदा चीज़ छीन रहे हैं और वह इस बात को बता नहीं पा रहा है, इसलिए वह ज़िद के द्वारा आपसे अपनी भावना ज़ाहिर करने का प्रयास कर रहा है कि उसे अभी इसी समय यह चाहिए। बच्चे का व्यवहार माता-पिता से बात करता है, इसलिए उनके स्वभाव को पढ़ना चाहिए। जैसे बच्चा चुंबक को समझना चाहता था, लेकिन उसकी जिज्ञासा शांत होने से पहले ही उसके हाथ से किसी दूसरे बच्चे ने छीन लिया, जिस कारण उसके हाथ में मौजूद हर चीज़ से उसने ज़िद को जोड़ लिया कि वह चीज़ उस बच्चे के हाथ में होगी, वह उसे अभी और इसी समय चाहिए। हालांकि दोनों उस चीज़ से खेल सकते हैं, लेकिन चूंकि अधूरी भावना के साथ छीन लिया गया था, इसलिए ज़िद में बच्चा बदल गया।

किसी की आदत या जुनून (obsession)

कभी कभी बच्चे किसी चीज़ के आदी हो जाते हैं, जैसे घर में माता-पिता के बीच झगड़े का माहौल हो तो वह घर के किसी बड़े के साथ बाहर निकलना पसंद करते हैं। वहां उन्हें नई चीज़ देखना और बच्चों को देखना अच्छा लगता है। अब बाहर जाने की यह आदत उन्हें ज़िद्दी बना देती है, क्योंकि वह आदी बन जाते हैं और सुकून के लिए खुले वातावरण में जाने को ज़िद बना लेते हैं। चूंकि पहली बार ज़िद करने पर उनकी डिमांड पूरी कर दी गई थी और बच्चे ने सीख लिया कि ज़िद के बाद घर के बुज़ुर्ग इंकार नहीं करते और मांग पूरी हो जाती है। 

क्लासिक्ल कंडीशन में बच्चा किसी भी हरकत को उस बात से जोड़ लेता है कि जब मेहमान हो तो मम्मा हर बात मान लेती है, इसलिए मुझको मां से डिमांड या ज़िद के लिए ऐसा मौका ढूंढना चाहिए जब मां इंकार ना कर सके, इसे कहते हैं क्लासिकल कंडीशनिंग।

असुरक्षा की भावना (Feeling of Insecurity)

जब बड़ी बहन या भाई छोटे बच्चे को अपने खेल में शामिल ना करे और वह अकेला हो जाए, जब मां अपने छोटे नवजात शिशु की देखभाल में ही व्यस्त हो जाए और बच्चे पर ध्यान कम दे तो वह असुरक्षा महसूस करता है और वह सबका ध्यान आकर्षित करने के लिए ज़िद करने लगता है। या नया नया स्कूल जाना शुरु किया हो तो वहां दूसरे बच्चों से घुलने मिलने में असहजता, अर्थात सोशल एंग्ज़ायटी है तो वह स्कूल के माहौल से घबरा रहा होता है, इसलिए उसमें असुरक्षा की भावना पैदा होती है जिस कारण स्कूल जाने के समय वह रोने लगता है।

वह समझ नहीं पाता है कि कैसा महसूस कर रहा हूं, इसलिए बस रोता रहता है और माता-पिता उसको ज़िद समझ रहे होते हैं। जबकि उसका स्वभाव स्वयं कह रहा होता है कि उसके साथ कोई समस्या , उसको समझने की ज़रुरत है।

प्रतिस्पर्धा (Competition) 

माता-पिता कभी-कभी बच्चों में प्रतिस्पर्धा करते हैं। देखो इस बच्चे को कैसे खाना खा रहा है देखो यह मम्मा की बात मान रहा है वहां बच्चा दूसरे बच्चे से जलन महसूस करता है कि मेरे माता-पिता की नज़र में यह ज़्यादा महत्वपूर्ण है और इसी झुंझलाहट में बच्चा माता-पिता को परेशान करने के लिए ज़िद करने लगता है। बिना किसी कारण ज़िद पूरी करवाने के लिए चीखता रहता है, किसी चीज़ को ज़िद करके हासिल करेगा, जब वह मिल जाए तो दूसरी चीज़ के लिए फिर ज़िद शुरु हो जाती है। वह अपनी झुंझलाहट को निकालने के लिए ज़िद का इस्तेमाल करता है, इसलिए कभी बच्चों की किसी दूसरे बच्चे से प्रतिस्पर्धा नहीं करनी चाहिए।

नकल (Copying behaviour) 

बच्चों को जब हम भरोसा नहीं दिलाते, एक दूसरे से उनका कम्पटीशन करते हैं तो वह भी अपने साथियों या बहन भाईयों की नकल में चीज़ें मांगने की ज़िद करते हैं। कभी कभी उनकी ज़िद उन चीज़ों की भी होती है, जिसकी उन्हें ज़रुरत नहीं होती और चीखते चिल्लाते रोते हुए वह सारा घर सिर पर उठा लेते हैं। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं होता है कि जिस चीज़ की मांग है वह किसी काम भी आएगी या नहीं। 

बस दूसरे के पास है तो हमें भी चाहिए। ऐसा वही बच्चे करते हैं जो बहन भाईयों या दूसरे बच्चों के बीच तालमेल बनाने की कला नहीं जानते। इस में लापरवाही माता-पिता की ओर से ही होती है। बच्चे के इस व्यवहार को समझने की ज़रुरत है कि आखिर बच्चा किस बात से जूझ रहा है।

माता-पिता का ध्यान आकर्षित करने के लिए (Attension seeking)

यदि माता-पिता मेहमान में बिज़ी हों तो बच्चा पैसे मांगेगा या जो काम के लिए मना किया जाए वही करेगा। जब मां व्यस्त हो, विशेषरुप से मां का बिज़ी रहना बच्चे से बर्दाश्त नहीं होता है। वह मां का ध्यान आकर्षित करने के लिए अजीब अजीब हरकतें करेगा, ज़िद करेगा, मांग रखेगा या दूसरे के हाथ से छीनने के लिए रोएगा, सारे घर में तमाशा मचाएगा। 

माता-पिता बच्चों की ज़िद और नाफरमानी को कम करने के लिए कुछ Neuro-Linguistic Programming  की तकनाक इस्तेमाल कर सकते हैं। इनका उद्देश्य बच्चे के दिमाग को समझना, उसके व्यवहार को बदलना और सकरात्मक रवैया लाने का प्रयास करना होता है। नीचे कुछ टिप्स दिए गए हैः

  1. संपर्क और तालमेल स्थापित करना (Rapport)

सबसे पहले तो यह कि बच्चे के साथ भावनात्मक तालमेल बिठाया जाए। यदि बच्चा गुस्से में है तो तुरंत डांटने के बजाय उसकी परिस्थिति को समझें। उसके करीब हों, आंखों में झांकें और ज़िद का कारण पूछें, मुस्कुराएं इस तरह की यह मांग उसकी उचित है, अभी देते हैं। जैसेः मुझे मालूम है कि तुम अभी खेलना चाहते हो, लेकिन हमें खाना भी खाना है। इस प्रकार बच्चा यह महसूस करता है कि माता-पिता उसे समझ रहे हैं।

  1. नया दृष्टिकोण देना (Reframing)

ज़िद को बुरा स्वभाव समझ कर केवल रोकने के बजाय उसको नए अंदाज़ में पेश करें। उसको महसूस करवाएं कि आपकी बात महत्वपूर्ण और ध्यान देने योग्य है। जैसेः बच्चा कहे कि मैं अभी होमवर्क नहीं करूंगा तो कहें कि कोई बात नहीं, लेकिन यदि हम अभी कर लें तो बाद में आराम से खेल सकते हैं। चलें पहले आप खेल लीजिए, हम बाद में होमवर्क करवा देंगे। इस प्रकार बच्चा ज़िद में आए बिना खेलेगा और होमवर्क की बात आकर याद दिला देगा। इस प्रकार उसका दिमाग समस्या के बजाए फायदे की ओर जाता है।

  1. चयन की आज़ादी (Choice Technique)

बच्चों को आदेश देने के बजाय दो सकारात्मक विकल्प देना प्रभावी होता है। जैसेः ओके मर्ज़ी आपकी चाहें तो पहले यह कर लें या यह। होमवर्क पहले करना चाहते हैं या खाने के बाद? ऐसे में बच्चा महसूस करता है कि फैसला उसका है, इसलिए ज़िद कम हो जाती है।

  1. सकारात्मक माहौल बनाना (Anchoring)

जब बच्चा खुश और शांति से हो तो उस समय उसकी तारीफ़ करें या कोई सकारात्मक शब्द का प्रयोग करें। फिर जब मुश्किल समय में हो तो वही शब्द या अंदाज़ का प्रयोग करें। जैसेः तुम बहुत समझदार हो, तुम हमेशा मसले हल कर लेते हो। या आपकी यह आदत है कि आप समझाने से समझ लेते हैं। या स्कूल ना जाने की ज़िद करे तो कहें कोई बात नहीं मत जाइए। फिर उससे पूछें कि वहां कौन दोस्त है? कौन बात करता है और कौन नहीं करता? यह शब्द बच्चे में सकारात्मक एहसास पैदा करते हैं।

  1. आदर्श बनना (Modeling)

बच्चे बड़ों को देखकर सीखते हैं। बड़े जितना लॉजिकल बातचीत करने वाले और सीधे सादे होंगे, उनके बच्चे भी उन्हीं रवैयो को आत्मसात करेंगे। विशेषज्ञों के अनुसार बच्चे रवैया देखकर सीखते हैं। यदि माता-पिता स्वयं सहनशीलता और अनुशासन दिखाएं तो बच्चा भी वही स्वभाव अपनाता है।

  1. सहज भाषा का प्रयोग (Positive Language)

नकारात्मक शब्द अकसर ज़िद बढ़ाते हैं। तुम हमेशा शरारत करते हो, यह बच्चा बहुत ज़िद्दी है, मुझको यह बहुत परेशान करता है, यह पढ़ता नहीं है। इस प्रकार के शब्द का बच्चे पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। इसके विपरीत बच्चे से सकारात्मक शब्दों के साथ बातचीत की जाए, जैसेः यदि तुम सुकून से बैठोगे तो हम जल्दी काम समाप्त कर लेंगे। इस प्रकार सकारात्मक भाषा दिमाग को सहयोग की ओर ले जाती है और बात को समझने की प्रतिभा उत्पन्न करती है।

  1. परिस्थिति बदलना (Situation change)

कभी कभी बच्चा थकन या बोरियत के कारण ज़िद करता है। ऐसे समय माहौल या गतिविधि बदल देनी चाहिए। जैसेः थोड़ी देर वॉक, पानी पीना, हल्के फुल्के खेलकूद इत्यादि। इससे मानसिक स्थिति बदल जाती है। 

बच्चे की ज़िद दरअसल ज़िद नहीं होती, बल्कि यह उसके स्वभाव के द्वारा माता-पिता से की जाने वाली संदेशपूर्ण बातचीत होती है। इसलिए ज़िद को समझने और दूर करने के लिए ज़रुरी है कि माता-पिता उसकी बात को सुनें और उसके पीछे छिपे संदेश को पहचानें।


डॉक्टर ख़ान मुबश्शरा फिरदौस

संपादक, हादिया ई मैग्ज़ीन


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